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________________ तृतीयः सर्गः यथास्थित्या तथा त्या प्रभावेन सुखेन ते । विशुद्ध्यापि च लेश्यानामिन्द्रियावधिगोचरैः ॥१६८॥ उपर्युपरि सौधर्मात् पूर्वतः पूर्वतोऽधिकाः । अल्पा गतितनुत्सेधैरभिमानपरिग्रहैः ॥ १६९॥ मुक्तिमूल महान रत्नस्यायत्नसाधनम् । ध्यानस्वाधीन सर्वार्थं भुक्त्वा ते वैबुधं सुखम् ॥ १७० ॥ दिवश्च्युता विदेहेषु भरतैरावतेषु वा । कर्मभूमिविभागेषु भवन्ति पुरुषोत्तमाः ॥ १७१ ॥ षट्खण्डप्रभवः केचिन्निधिरत्नोपलक्षिताः । सिद्धिसौख्यानुसंधानसमर्थचरमक्रियाः ॥१७२॥ केचिद्वित्रिभवाश्चान्ये वलाः स्वर्गापवर्गिणः । निदानिनस्तु तत्रान्ये केशवप्रतिशत्रवः ॥ १७३ ॥ केचित् पूर्वभवाभ्यस्त शुभषोडशकारणाः । कीत्र्यास्तीर्थकृतो भूत्वा प्रभवन्ति जगत्त्रये ॥१७४॥ सम्यक्त्व स्थिरमूलस्य ज्ञानकाण्डधृतात्मनः । चारित्रस्कन्धबन्धस्य नयशाखोपशाखिनः ॥ १७५ ॥ नृसुरश्रीप्रसूनस्य जिनशासनशाखिनः । सेवितस्य लभन्तेऽग्रे ते निर्वाणमहाफलम् ॥ १७६॥ [ युग्मम् ] परमानन्दरूपं ते निर्वाणफैलसंभवम् । सारमौख्यरसं प्राप्ताः सिद्धाः तिष्ठन्ति निर्वृताः ॥ १७७॥ इत्थमाकर्ण्य सा धर्म भुवनत्रयपद्मिनी । मोक्षमार्गार्कसंपर्कात् चकासेति प्रमोदिनी ॥ १७८ ॥ प्राक् प्रशस्तानुरागाच्या धर्मश्रवणतो दधुः । लोकाखयोऽग्निशुद्धाच्छरत्नजातिचयश्रियम् ॥ १७९ ॥ सद्धर्मदेशना जैनी जगत्त्रयतन्भृताम् । भ्रान्तिशेष रजः शेषमं भ्रौलीवाभ्यशीशम ॥१८०॥ ३९ होते हैं ||१६७|| सोधर्मं स्वर्गसे लेकर ऊपर-ऊपर के देव, पूर्व- पूर्वको अपेक्षा स्थिति, द्युति, प्रभाव, सुख, लेश्याओंकी विशुद्धता, इन्द्रिय तथा अवधिज्ञानके विषयकी अपेक्षा अधिक अधिक हैं तथा गति, शरीरकी ऊंचाई, अभिमान और परिग्रहकी अपेक्षा होन-हीन हैं ।। १६८ - १६९ ॥ मुक्ति के कारणभूत महा अमूल्य रत्नत्रयके प्रभावसे जिसकी सिद्धि अयत्न साध्य होती है तथा जहाँ इच्छा करते ही समस्त पदार्थोंकी सिद्धि हो जाती है ऐसे देवों सम्बन्धी सुख भोगकर वे देव स्वर्गसे च्युत हो विदेह, भरत और ऐरावत इन कर्मभूमियोंमें उत्तम पुरुष अथवा नारायण उत्पन्न होते हैं ॥ १७० - १७१ ॥ कितने ही देव, नौ निधियों और चौदह रत्नोंसे सहित छह खण्डोंके प्रभु होते हैं अर्थात् चक्रवर्ती होते हैं। इनकी अन्तिम क्रियाएँ मोक्षसुख प्राप्त करने में समर्थ होती हैं || १७२ || कितने ही दो-तीन भव धारण कर मोक्ष चले जाते हैं, कोई बलभद्र होते हैं, और वे स्वर्गं अथवा मोक्ष जाते हैं तथा पूर्वं भवमें निदान बाँधनेवाले कितने ही लोग नारायण एवं प्रतिनारायण होते हैं || १७३ || जिन्होंने पूर्वं भव में शुभ सोलह कारण भावनाओंका अभ्यास किया है ऐसे कितने ही लोग कीर्तिके धारक तीर्थंकर होते हैं और वे तीनों जगत्‌का प्रभुत्व प्राप्त करते हैं || १७४।। सम्यग्दर्शन ही जिसकी स्थिर जड़ है, जो ज्ञानरूप पिण्डपर टिका हुआ है, चारित्ररूपी स्कन्धको धारण करनेवाला है, नयरूपी शाखाओं और उपशाखाओंसे सहित है तथा मनुष्य और देवों की लक्ष्मीरूप जिसमें फूल लग रहे हैं ऐसे जिनशासनरूपी वृक्षकी जो सेवा करते हैं वे उसके अग्रभागपर स्थित निर्वाणरूपी महाफलको प्राप्त होते हैं ।। १७५ - १७६ ।। निर्वाणरूपी फलमें उत्पन्न होनेवाले परमानन्दस्वरूप श्रेष्ठ सुखरूपी रसको प्राप्त हुए सिद्ध परमेष्ठी निर्वाणको प्राप्त हो सिद्धालय में सदा विद्यमान रहते हैं || १७ || इस प्रकारका धर्मोपदेश सुनकर वह लोकत्रयरूपी कमलिनी, मोक्षमार्गरूपी सूर्यं संसगं प्रमुदित हो सुशोभित हो उठो || १७८ || जो पहले से ही प्रशस्त अनुरागले सहित थे ऐसे तीनों लोकोंके जीव धर्मं श्रवण कर अग्निसे शुद्ध हुए निर्मल जाति के रत्नसमूहकी शोभा धारण कर रहे थे || १७९ || जिस प्रकार मेघमाला अवशिष्ट धूलिके समूहको शान्त कर देती है उसी १. स्थितिप्रभावसुखद्युतिलेश्या विशुद्धीन्द्रियावधिविषयतोऽधिकाः त. सू. च. अ. । २. गतिशरीरपरिग्रहाभिमानतो हीनाः त. सू. च. अ. । ३. कीर्तनीयाः प्रशस्ता इत्यर्थः । ४. बल- म. । ५ मेघमालेव | ६. शमयामास । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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