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________________ ७०३ एकोनषष्टितमः सर्गः परितो भामिसत्सर्पद्धनो मर्तुमहोदयः । मासिगम्यूतिविस्तारो युक्तोच्छायस्तनूद्धवः ॥१०॥ दृश्यते दृष्टिहारीव सुखदृश्यः सुखावहः । पुण्यमूर्तिस्तदन्तस्थः पूज्यते पुरुषाकृतिः ।।१०१॥ काधियोऽपुण्यजन्मानः स्वापुण्यजरुषान्विताः । न पश्यन्ते च तद्भासं मानुभासमुलूकवत् ॥१०२।। तिश्यन्ती रवेस्तेजः पूरयन्ती दिशोऽखिलाः । तत्प्रमा भानवीयेव पूर्व व्याप्नोति भूतलम् ॥१०॥ तस्याश्चानुपदं याति लोकेशो लोकशान्तये । लोकानुदासयन् सर्वानतिदीधितिमत्प्रभः ।।१०४॥ आसंवत्सरमारमाङ्गः प्रथयन्प्रामवीं गतिम् । मासते रनवृष्टयाध्वामरोत्यैरावतो यथा ।।१०५।। अनुबन्धावनिप्रख्यं दिवि मार्गादि दृश्यते । त्रिलोकातिशयोद्भूतं तद्धि प्रामवमद्भुतम् ॥१०६॥ पटुभवन्ति मन्दाश्च सर्वे 'हिंस्रास्त्वपर्धयः । खेदस्वेदार्तिचिन्तादि न तेषामस्ति तरक्षणे ॥१०॥ विहारानुगृहीतायां भूमौ न डमरादयः । दशाभ्यस्तयुगं(?)भर्तुरहोऽत्र महिमा महान् ॥१०॥ विभूत्योद्धतया भूत्यै जगतां जगतां विभुः । निजहार भुवं मव्यान् बोधयन् बोधदः क्रमात् ।।१०९।। हजार सूर्यके समान कान्तिका धारक था, जिससे बढ़कर और दूसरी आकृति नहीं थी, जो चारों ओर फैलनेवाली कान्तिसे घनरूप था, भगवान्के महान् अभ्युदयके समान था, जिसकी कान्तिका विस्तार एक कोस तक फैल रहा था, जो भगवान्की ऊंचाईके बराबर ऊंचा था, दृष्टिको हरण करनेवाला था, सुखपूर्वक देखा जा सकता था, सुखको उत्पन्न करनेवाला था, पुण्यकी मूर्तिस्वरूप था और सबके द्वारा पूजा जाता था ।।९९-१०१।। जिस प्रकार उल्लू सूर्यको प्रभाको नहीं देख पाते है उसी प्रकार दुर्बुद्धि, पापी एवं अपने पापसे उत्पन्न क्रोधसे युक्त पुरुष उस कान्ति-समूहको नहीं देख पाते हैं ।।१०२।। उस कान्ति-समूहमें से एक विशेष प्रकारको प्रभा निकलती थी जो सूर्यके तेजको आच्छादित कर रही थी, समस्त दिशाओंको पूर्ण कर रही थी और सूर्यको प्रभाके समान पृथिवीतलको पहलेसे व्याप्त कर रही थी ॥१०३।। उस प्रभाके पीछे, जो समस्त लोकोंको प्रकाशित कर रहे थे तथा जिनको प्रभा अत्यधिक किरणोंसे युक्त थी ऐसे भगवान् नेमि जिनेन्द्र, लोकशान्तिके लिए-संसारमें शान्तिका प्रसार करनेके लिए विहार कर रहे थे ॥१०४॥ जिस मार्गमें भगवान्का विहार होता था वह मार्ग, अपने चिह्नोंसे एक वर्ष तक यह प्रकट करता रहता था कि यहां भगवान्का विहार हुआ है तथा रत्नवृष्टिसे वह मार्ग ऐसा सुशोभित होता था जैसा नक्षत्रोंके समूहसे ऐरावत हाथी सुशोभित होता है ॥१०५।। जिस प्रकार विहारसे सम्बन्ध रखनेवाली पृथिवीमें मार्ग आदि दिखलाई देते हैं उसी प्रकार आकाशमें मार्ग आदि दिखाई देते हैं सो ठोक ही है क्योंकि तीन लोकके अतिशयसे उत्पन्न भगवान्का वह अतिशय ही आश्चर्यकारी था ॥१०६।। उस समय मन्द बुद्धि मनुष्य तीक्ष्ण बुद्धिके धारक हो गये थे। समस्त हिंसक जीव प्रभावहीन हो गये थे और भगवान्के समीप रहनेवाले लोगोंको खेद, पसीना, पीड़ा तथा चिन्ता आदि कुछ भी उपद्रव नहीं होता था ।।१०७।। भगवान्के विहारसे अनुगृहीत भूमिमें दो सौ योजन तक विप्लव आदि नहीं होते थे। अथवा दशसे गुणित युग अर्थात् पचास वर्ष तक उस भूमिमें कोई उपद्रव आदि नहीं होते थे। भावार्थ--जिस भूमि में भगवान्का विहार होता था वहाँ ५० वर्ष तक कोई उपद्रव दुर्भिक्ष आदि नहीं होता था। यह भगवान्की बहुत भारी महिमा ही समझनी चाहिए ॥१०८।। इस प्रकार उत्कृष्ट विभूतिसे युक्त, बोधको देनेवाले जगत्के स्वामी भगवान् नेमिनाथने भव्य जीवोंको सम्बोधित करते हुए, जगत्के वैभवके लिए क्रमसे पृथिवीपर विहार किया ॥१०९।। १. भाति तूत्सर्पद्धनो ख,, म., ङ. । २. राशिगव्यूत-क., ख., म. । ३. युक्तोच्छायतनूद्भवः म.। ४. रत्नवृष्ट्या वा परीत्यरावतो म., ख.। रत्नवृष्ट्या वा भरतरावतो यथा क.। ५ प्रभोरिदं प्राभवम् प्रभुसंबन्धीत्यर्थः । ६. हिंस्रास्रपर्धय: म., ख., ड., क.। ७. खेदः स्वेदार्ति- म.। ८. न चैषामस्ति म. । 2. देशाम्यस्तयुगं ङ. । द्विशतयोजन ( म. टि. ) अत्र 'शताम्यस्तयुगं' इति पाठः सम्यक् प्रतिभाति । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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