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________________ एकोनषष्टितमः सर्गः भूवधूः सर्वसम्पन्न सस्यरोमाञ्चकञ्चुका । करोत्यनुजहस्तेन मर्तुः पादग्रहं मुदा ||३९|| जिनार्कपादसंपर्क प्रोत्फुल्ल कमलावलीम् । प्रथयत्युद्वहन्ती यौरस्थायिसरसीश्रियम् ॥८०॥ सर्वेत्युक्ताः समात्मानः समदृष्टेश्वरेक्षिताः । ऋतवः सममंत्रन्ते निर्विकल्पा हि सेशिता ।। ८१ ।। निधानानि निधीरन्नान्याकराण्यमृतानि च । सूयते तेन विख्याता रत्नसूरिति मेदिनी ।। ४२ ।। 'अन्तकोऽन्तकजिद्वीर्यपराजितपराक्रमः । चर्मचक्रोजिते लोके नाकाले करमिच्छति ॥८३॥ काल: काळ हरस्याचामनुकूल भयादिव । प्रविहाय स्ववैषम्यं पूज्येच्छामनुवर्तते ||२४|| 'सस्थाकाः सर्वे सुखं विन्दन्ति देहिनः । सैषा विश्वजनीना हि विभुता भुवि वर्तते ॥ ८५|| जन्मानुबन्धवैशे यः सर्वोऽहिनकुलादिकः । तस्यापि जायतेऽजयं संगतं सुगताज्ञया ॥25॥ गन्धवाहो वहद्गन्धं भर्तुस्तं कथमाप्नुयात् । अचण्डः सेवते' सेवा शिक्षयन्ननुजीविनः ||२७|| रजस्तिगिरिकापायवैमल्यामरणस्विषः | दिक्कन्याः पुष्पजापैस्तं पूजयन्ति दिशां पतिम् ||८|| 6 थे । सब ओर शुभ ही शुभ कार्योंकी वृद्धि होती थी || ७८ || उस समय सर्व प्रकारकी फली फूली धान्यरूपी रोमांचको धारण करनेवाली पृथिवीरूपी स्त्री कमलरूपी हाथोंके द्वारा बड़े हर्षसे भगवानरूपी भर्तारके पादमर्दन कर रही थी || ७९ || जिनेन्द्ररूपी सूर्यके पादरूपी किरणोंके सम्पर्कसे फूली हुई कमलावलीको धारण करनेवाला आकाश उस समय चलते-फिरते तालाबकी शोभाको विस्तृत कर रहा था ||८०|| उस समय बिना कहे ही समस्त ऋतुएँ एक साथ वृद्धिको प्राप्त हो रही थीं, सो ऐसी जान पड़ती थीं मानो समदृष्टि भगवान्‌ के द्वारा अवलोकित होनेपर वे समरूपी ही हो गयी थीं । यथार्थ में स्वामीपना तो वही है जिसमें किसीके प्रति विकल्प - भेदभाव न हो ||८१|| उस समय पृथिवी जगह-जगह अनेक खजाने, निधियाँ, अन्न, खानें और अमृत उत्पन्न करती थीं इसलिए 'रत्नसू' इस नामसे प्रसिद्ध हो गयी थी || ८२ ॥ अन्तकजित् - यमराजको जीतनेवाले भगवान् के वीर्यसे जिसका पराक्रम पराजित हो गया था ऐसा यमराज, धर्मचक्रसे सबल संसारमें असमय में करग्रहण करनेकी इच्छा नहीं करता था । भावार्थ - जहाँ भगवान्‌का धर्मचक्र चलता था वहाँ किसीका असमय में मरण नहीं होता था || ८३ ॥ काल ( यम ) को हरनेवाले हैं। ( पक्षमें समयको हरनेवाले ) भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध आचरण न हो जाये, इस भयसे काल ( समय ) अपनी विषमताको छोड़कर सदा भगवान्की इच्छानुसार ही प्रवृत्ति करता था । भावार्थ --काल, सर्दी- गरमी, दिन-रात आदिको विषमता छोड़ सदा एक समान प्रवृत्ति कर रहा धा ||८४|| भगवान् विहार क्षेत्र में स्थित समस्त त्रस, स्थावर जीव सुखको प्राप्त हो रहे थे सो ठीक ही है क्योंकि संसारमें विभुता वही है जो सबका हित करनेवाली हो ॥८५॥ जो सांप, नेत्रा आदि समस्त जीव जन्मसे ही वैर रखते थे उन सभी में भगवान्की आज्ञासे अखण्ड मित्रता हो गयी थी || ८६ ॥ भगवान्‌की बहती हुई गन्धको, पवन किस प्रकार प्राप्त कर सकता है इस प्रकार अनुजीवी जनों को सेवाकी शिक्षा देता हुआ वह शान्त होकर भगवान्की सेवा कर रहा : था । भावार्थ - उस समय शीतल, मन्द सुगन्धित पवन भगवान्‌ की सेवा कर रहा था सो ऐसा जान पड़ता था मानो वह सेवकजनों को सेवा करनेकी शिक्षा ही दे रहा था || ८७|| धूलिरूपी अन्धकारके नष्ट हो जाने से प्रकट हुई निर्मलतारूपी आभरणोंकी कान्तिसे युक्त दिशारूपी कन्याएँ ७०१ १. कमलावली म. । २. प्रथयन्त्युद्वहन्ती म., क., ङ. । ३. स्वर्वेत्युक्ताः म । सर्वे अत्युक्ताः इति पदच्छेदः, उक्त अतिक्रान्ता इति अत्युक्ताः अकथिता एवेत्यर्थः । ४. निर्विकम्पा म., क, ख, ङ. ५. सूयन्ते म., क., ख., ङ., । ६. अन्ते कौन्तकजिद् म । ७. तत्र स्थावरकाः म । ८. तत्कथाप्नुयात् म. । तत्कथयाप्नुयात् क. । ९. सेव्यते क. । सेहते ख. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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