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________________ ६९६ हरिवंशपुराणे "विलम्बित सहस्त्रार्कयुगपत्पतनोदयैः । नमतानन्दितालोकनामोन्नामैः पदे पदे ॥२४॥ सुराणां भूतल स्पर्शिम कुटैर्बहुकोटिभिः । भूः पुरःसोपहारेव शोमतेऽम्बुजकोटिभिः ॥१५॥ कान्तिकः पुरो यान्ति लोकान्तम्यापितेजसः । लोकेशस्य यथालोकाः पुरोगा मूर्तिसंभवाः ॥ १६ ॥ पद्मा सरस्वतीयुक्ता परिवारात्तमङ्गका । पद्महस्ता पुरो याति परोत्य परमेश्वरम् ॥२०॥ "प्रसीदेत इतो देवेश्यानम्य प्रकृताञ्जलिः । तद्भूमिपतिभिः सार्धं पुरो याति पुरन्दरः ॥ २८ ॥ एवमीशस्त्रिलोकेशपरिवारपरिष्कृतः । लोकानां भूतये भूतिमुद्वहन् सार्वलौकिकीम् ॥ २९ ॥ पद्मकेतुः पवित्रात्मा परमं पद्मयानकम् । भव्यपद्मकसद्बन्धुर्यं दारोहति तरक्षणात् ॥३०॥ जय नाथ जय ज्येष्ठ जय लोकपितामह । जयात्मभूर्जयात्मेश जय देव जयाच्युत ॥३१॥ जय सर्वजगद्बन्धो नय सद्धर्मनायक । जय सर्वशरण्य श्रीर्जय पुण्यजयोत्तम ॥ ५२ ॥ ७ ● इत्युदीर्णसुकृद्घोषो रुन्धानां रोदसी स्फुटः । 'जयत्युच्चोऽतिगम्भीरो घनाघनघनध्वनिः ॥३३॥ मानो भगवान् के लिए नमस्कार ही कर रहा था || २३ || उस समय डग-डगपर भगवान्‌को नमस्कार करनेवाले देवोंके करोड़ों देदीप्यमान मुकुटोंका बहुत भारी प्रकाश बार-बार नीचेको झुकता और बार-बार ऊपरको उठता था । उससे ऐसा पड़ता था मानो हजारों सूर्योका एक साथ पतन तथा उदय हो रहा हो। उन्हीं देवोंके जब करोड़ों मुकुट पृथिवीतलका स्पर्श करते थे तब भगवान् के आगेकी भूमि ऐसी सुशोभित होने लगती थी मानो उसपर करोड़ों कमलोंकी भेंट ही चढ़ायी गयी हो || २४ - २५ || जिनका तेज लोकके अन्त तक व्याप्त था, ऐसे लोकान्तिक देव भगवान् के आगे-आगे चल रहे थे और वे ऐसे जान पड़ते थे मानो लोक स्वामी भगवान् जिनेन्द्रका प्रकाश ही मूर्तिधारी हो आगे-आगे गमन कर रहा था ||२६|| जिनके परिवारकी देवियोंने मंगल द्रव्य धारण कर रखे थे, तथा जिनके हाथोंमें स्वयं कमल विद्यमान थे, ऐसी पद्या और सरस्वती देवी, भगवान्को प्रदक्षिणा देकर उनके आगे-आगे चल रही थीं ||२७|| 'हे देव ! इधर प्रसन्न होइए, इधर प्रसन्न होइए ।' इस प्रकार नमस्कार कर जिसने अंजलि बांध रखी थी ऐसा इन्द्र तद्-तद् भूमिपतियोंके साथ भगवान्‌के आगे-आगे चल रहा था ||२८|| इस प्रकार जो तीनों लोकोंके इन्द्र तथा उनके परिवारसे घिरे हुए थे, लोगोंकी विभूतिके लिए जो समस्त लोकको विभूतिको धारण कर रहे थे, जो कमलकी पताकासे सहित थे, जिनकी आमा अत्यन्त पवित्र थी, और जो भव्य जीवरूपी कमलोंको विकसित करने के लिए उत्तम सूर्यके समान थे, ऐसे भगवान् नेमि जिनेन्द्र जिस समय उस पद्मयानपर आरूढ़ हुए उसी समय देवोंने मेघ गर्जनाके समान यह शब्द करना शुरू कर दिया कि हे नाथ! आपकी जय हो, हे ज्येष्ठ ! आपकी जय हो, हे लोकपितामह ! आपकी जय हो, हे आत्मभू ! आपकी जय हो, हे आत्मेश ! आपकी जय हो, हे देव ! आपकी जय हो, हे अच्युत ! आपकी जय हो । हे समस्त जगत्के बन्धु ! आपकी जय हो, है समीचीन धर्मके स्वामी ! आपकी जय हो, हे सबके शरणभूत लक्ष्मीके धारक ! आपकी जय हो, हे पुण्यरूप ! आपकी जय हो, हे उत्तम ! आपकी जय हो । इस प्रकार उठा हुआ पुण्यात्माजनोंका जोरदार, अत्यन्त गम्भीर एवं मेघ गर्जनाको तुलना करनेवाला वह शब्द आकाश और पृथिवीके अन्तरालको व्याप्त करता हुआ अत्यधिक सुशोभित हो रहा था ।। २९-३३|| १. डलयोरभेदात् विलम्बितपदेन विडम्बितस्य ग्रहणम् । २ पतनोदयोः म । ३. नन्दितस्य समृद्धस्य आलोकस्य नामोन्नामैः । ४. शूराणाम् म. । ५. लोकान्तस्थापित - म । ६. प्रसीदेति द्रुतो देवे क. । ७. इत्युदीर्णासकृद्घोषः म । ८. जयत्युच्चेति-म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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