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________________ अष्टपञ्चाशः सर्गः पञ्चधा ज्ञानावरणं नवधा दर्शनावृतिः । द्विधा तु वेदनीयं स्यान्मोहोऽष्टाविंशतिस्थितिः ॥२२१॥ आयुश्चतुर्विधं नाम द्विचत्वारिंशदीरितम् । द्विविधं गोत्रमुद्गीतमन्तरायस्तु पञ्चधा ॥२२२॥ मतिश्रुतावधिज्ञानमनःपर्ययकेवलैः। आवृत्यैरावृतीः पञ्च झुत्तरप्रकृतीर्विदुः ॥२२३॥ द्रव्यार्थादेशतः 'शक्तर्मनापर्ययकेवली। अभव्योऽप्यस्ति यत्तत्स्थं ज्ञानावरणपञ्चकम् ॥२२४॥ व्यक्तियोग्यत्वसद्भावापेक्षा भव्यस्य मव्यता । कैवल्यव्यक्त्य योग्यत्वादमव्यस्य रामव्यता ॥२२५॥ चक्षुषोऽचक्षुषो दृष्टेरवधेः केवलस्य च । चत्वार्यावरणान्येवं निद्राद्यैः पञ्चमिव ॥२२६॥ मदखेदविनोदार्थः स्वापो निद्राधिकस्वतः । उपयुपरि तदवृत्तिनिद्रानिद्रामिधीयते ॥२२७॥ प्रकारका मूल प्रकृतिबन्ध कहा गया है, अब इसके आगे उत्तर प्रकृतियोंके भेद कहे जाते हैं ।।२२०।। ज्ञानावरण पाँच प्रकारका है, दर्शनावरण नौ प्रकारका है, वेदनीय दो प्रकारका है, मोहनीय अट्ठाईस प्रकारका है, आयु चार प्रकारका है, नाम बयालीस प्रकारका है, गोत्र दो प्रकारका कहा गया है और अन्तराय पाँच प्रकारका है ।।२२१-२२२।। मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये पांच आवरण करने योग्य गुण हैं। इन्हें आवरण करनेवाले मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण, मनःपर्ययज्ञानावरण और केवलज्ञानावरण ये पाँच ज्ञानावरण कर्मको उत्तर प्रकृतियाँ हैं ॥२२३।। द्रव्याथिकनयकी अपेक्षा शक्तिरूपसे अभव्य जीव भी मनःपर्यय और केवलज्ञानसे युक्त है, अतः उसके भी ज्ञानावरणके पांचों भेद स्थित हैं ॥२२४॥ भव्य जीवकी भव्यता उक्त गुणोंके प्रकट होनेकी योग्यताके सद्भावकी अपेक्षा रखती है और अभव्य जीवकी अभव्यता केवलज्ञान तथा मनःपर्ययज्ञानके प्रकट होनेकी योग्यता न होनेकी अपेक्षासे है। भावार्थ-किसीने प्रश्न किया था कि जब भव्य और अभव्य दोनोंके ही मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञानकी शक्ति विद्यमान है तब इनमें भव्यता और अभव्यताका भेद कैसे हुआ? इसका उत्तर ग्रन्थकर्ताने दिया है कि भव्य जीवके उन शक्तियोंकी प्रकटता हो जाती है और अभध्य जीवके उनकी प्रकटता नहीं होती ||२२५।। चक्षुर्दशनावरण, अचक्षुदर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण और केवलदर्शनावरण ये चार आवरण तथा निद्रा आदिक पाँच अर्थात् निद्रा, निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचलाप्रचला और स्त्यानगृद्धि ये पांच निद्राएं सब मिलाकर दर्शनावरण कर्मकी नौ उत्तर प्रकृतियां हैं। जो जीवके चक्षुर्दशनचक्षुइन्द्रियसे होनेवाले सामान्य अवलोकनको प्रकट न होने दे वह चक्षुर्दर्शनावरण है । जो अचक्षुर्दर्शन-चक्षुको छोड़कर अन्य इन्द्रियों तथा मनसे होनेवाले सामान्य अवलोकनको प्रकट न होने दे वह अचक्षुर्दर्शनावरण है । जो अवधिदर्शन-अवधिज्ञानके पहले प्रकट होनेवाले सामान्य अवलोकनको न होने दे यह अवधिदर्शनावरण है और जो केवलदर्शन-केवलज्ञानके साथ होनेवाले सामान्यावलोकनको न होने दे वह केवलदर्शनावरण है ॥२२६।। मद तथा खेदको दूर करनेके लिए सोना निद्रा कहलाती है । ऊपर-ऊपर अधिक रूपसे निद्राका आना निद्रानिद्रा कही जाती १. शक्तिर्मन: म., ख., ङ. । २. अभव्याप्यस्ति क., ङ। अत्र चोद्यते-अभव्यस्य मनःपर्ययज्ञानशक्तिः केवलज्ञानशक्तिश्च स्याद्वा न वा ? यदि स्यात् तस्याभव्यत्वाभावः । अथ नास्ति तत्रावरणद्वयकल्पना व्यर्थति ? उच्यते-आदेशवचनान्न दोषः । द्रव्यार्थादेशान्मनःपर्ययकेवलज्ञानशक्तिसंभवः। पर्यायार्थादेशात्तच्छक्त्यभावः। यद्येवं भव्याभव्यविकल्पो नोपपद्यते; उभयत्र तच्छक्तिसद्भावात् । न शक्तिभावाभावापेक्षया भव्याभव्यविकल्प इत्युच्यते । कुतस्तहि ? व्यक्तिसद्भावासद्भावापेक्षया । स. सि. अ. ८ सूत्र ६ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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