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________________ अष्टपश्चाशः सर्गः ६६७ कायवाङ्मनसां कर्म योगः स पुनराम्रवः । शुभः पुण्यस्य गण्यस्य पापस्याशुभलक्षणः ॥५॥ 'सकपायाकषायौ द्वौ स्वामिनावात्रवस्य सः । मि उपशान्तकषायादेरकषायस्य योगिनः । आस्रवः स्वामिनोऽन्त्यस्य स्यादोर्यापथकर्मणः ॥५॥ इन्द्रियाणि कषायाश्च हिंसादीन्यव्रतान्यपि । साम्परायिककर्मद्वाः स्याक्रियापञ्चविंशतिः ॥६॥ चैत्यप्रवचनार्हत्सदगुरुपूजादिलक्षणा । सा सम्यक्स्वक्रिया ख्याता सम्यक्त्वपरिवर्धिनी ॥६॥ प्रवृत्तिरकृतादन्यदेवतास्तवनादिका । सा मिथ्यात्वक्रिया ज्ञेया मिथ्यात्वपरिवर्धिनी ॥६२॥ कायाज्ञादिसरन्येषां गमनादिप्रवर्तनम् । सा प्रयोगक्रिया वेद्या प्रायोऽसंयमवधिनी ॥६३॥ आभिमुख्यं प्रति प्रायः संयतस्याप्यसंयमे । समादानक्रिया प्रोक्ता प्रमादपरिवर्धिनी ॥६॥ ईर्यापथनिमित्ता या सा प्रोक्तर्यापथक्रिया । एताः पञ्चक्रिया हेतुरानवे साम्परायिके ॥६५॥ क्रोधावेशवशात्प्रादुर्भता प्रादोषिकी क्रिया । योऽभ्युद्यमः प्रदुष्टस्य सतस्सा कायिकी क्रिया ॥६६॥ क्रियाधिकारिणीत्युक्ता हिंसोपकरणहात् । दुःखोत्पत्तिः स्वतन्त्रत्वाक्रियान्या पारितापिकी ॥६७॥ इन्द्रियायुर्बलप्राणवियोगकरणारिक्रया। प्राणातिपातिकी नाम्ना पञ्चवाध्यात्मिकाः क्रियाः ॥६॥ रागादींकृतचित्तत्वात्प्रशस्तस्य प्रमादिनः । रम्यरूपावलोकान्याभिप्रायो दर्शनक्रिया ॥६॥ काय, वचन और मनको क्रियाको योग कहते हैं। वह योग ही आस्रव कहलाता है। उसके शुभ और अशुभके भेदसे दो भेद हैं। उनमें शुभयोग शुभास्रवका और अशुभयोग अशुभास्रवका कारण है ।।५७।। आस्रवके स्वामी दो हैं-सकषाय ( कषायसहित ) और अकषाय ( कषायरहित )। इसी प्रकार आस्रवके दो भेद हैं-साम्परायिक आस्रव और ईर्यापथ आस्रव । मिथ्यादृष्टिको आदि लेकर सूक्ष्मकषाय गुणस्थान तकके जोव सकषाय हैं और वे प्रथम साम्परायिक आस्रवके स्वामी हैं तथा उपशान्तकषायको आदि लेकर सयोगकेवली तकके जीव अकषाय हैं और ये अन्तिम ईर्यापथ आस्रवके स्वामी हैं। [ चौदहवें गुणस्थानवर्ती अयोगकेवली भी अकषाय हैं परन्तु उनके योगका अभाव हो जानेसे आस्रव नहीं होता ] ॥५८-५९|| पाँच इन्द्रियां, चार कषाय, हिंसा आदि पाँच अव्रत और पचोस क्रियाएँ ये साम्परायिक आस्रवके द्वार हैं॥६०|| इनमें पांच इन्द्रियाँ, चार कषाय और पाँच अव्रत प्रसिद्ध हैं, अतः इन्हें छोड़कर पचीस क्रियाओंका स्वरूप कहते हैं। प्रतिमा, शास्त्र, अर्हन्त देव तथा सच्चे गुरु आदिकी पूजा, भक्ति आदि करना सम्यक्त्वको बढ़ानेवाली सम्यक्त्वक्रिया है ॥६१॥ पापके उदयसे अन्य देवताओंकी स्तुति आदिमें प्रवृत्ति करना मिथ्यात्वको बढ़ानेवाली मिथ्यात्व क्रिया है ॥६२|| गमनागमनादिमें प्रवृत्ति करना सो प्रायः असंयमको बढ़ानेवालो प्रयोग क्रिया है ।।६३।। संयमी पूरुषका प्रायः असंयमकी ओर सम्मख होना प्रमादको बढ़ानेवाली समादान क्रिया है ॥६४।। जो क्रिया ईर्यापथमें निमित्त है वह ईर्यापथ क्रिया है । ये पाँच क्रियाएं साम्परायिक आस्रवकी हेतु हैं ॥६५।। क्रोधके आवेशसे जो क्रिया होती है वह प्रादोषिकी क्रिया है । दोषसे भरा मनुष्य जो उद्यम करता है वह कायिकी क्रिया है ।।६६|| हिंसाके उपकरण-शस्त्र आदिके ग्रहणसे जो क्रिया होती है वह क्रियाधिकरिणी क्रिया है। स्व-परको दुःख उत्पन्न करनेवाली पारितापिकी क्रिया है ॥६७।। इन्द्रिय, आयु और बल प्राणका वियोग करनेवाली क्रिया प्राणातिपातिकी है। ये पांच आध्यात्मिक क्रियाएँ हैं ॥६८|| चित्तके रागसे आद्रं हो जानेके कारण जब उत्तम पुरुष प्रभादो बन, किसी सुन्दर रूपके देखनेको अभिलाषा करता है १. 'कायवाङ्मनःकर्म योगः' ॥१॥ २. 'स आस्रवः' ।।२।। ३. 'शुभः पुण्यस्याशुभः पापस्य' ॥३॥ ४. 'सकषायाकषाययोः साम्परायिकर्यापथयोः' ॥४॥ त. सू. अ. ६ ५ इन्द्रियकषायावतक्रियाः पञ्चचतुःपञ्चपञ्चविंशतिसंख्याः पूर्वस्य भेदाः ॥५॥ त सू. अ. ६ । ६. प्रशक्तस्य म., ङ. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org |
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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