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________________ ६२४ हरिवंशपुराणे मुखरशङ्खरवेण दिशां मुखान्यखिलमम्बरमम्बुनिधिश्व भूः । निखिल मेतदतीव विपूरितस्फुटदिवस्फुटमाविरभूत्तदा ॥ ६६ ॥ पटुमदाः करिणः क्षुभिता निजानभिबमन्जुरितस्तत आश्रयान् । त्रुटितबन्ध तुरङ्गगमकोटयः पुरि सहेषित का स्त्वरितोऽभ्रमन् ॥ ६७ ॥ भवनकूटतटान्यपतन् हरिः स्वकमकर्षदसिं क्षुभिता समा । पुरजनः प्रलयागमशङ्कया मयमगात् परमाकुलितस्तदा ॥ ६८ ॥ हरिरवेत्य निजाम्बुजनिस्वनं त्वरितमेत्य कुमारमवज्ञया । स्फुरदहीशमहाशयने स्थितं परिनिरीक्ष्य नृपैः सुविसिस्मिये ॥ ६९ ॥ परुषजाम्बवतीवचसो रुषा स्फुटमवेस्य कुमारकृतं हरिः । परितुतोष सबन्धुरधीशितुर्वि कृतिरप्यतितोषकरी तदा ॥७०॥ कृतपरिष्वजनः स्वजनैः स तं समभिपूज्य युवानमगाद्गृहम् । स्वयुवतिं प्रति दीपितमन्मथं समवबुध्य हरिर्मुमुदेऽधिकम् ॥७१॥ सविधियाचितभोजसुता करग्रहण हेतु विबोधित बान्धवः । नरपतीन् सकलान् सकलत्रकानकृत सन्निहितान् कृतगौरवः ॥७२॥ विहिततरसमयोचितमज्जनौ परमरूपधरौ घृतमण्डनौ । पुरि यथास्वमगारमधिष्ठितौ जनमनोऽहरतां सुवधूवरौ ॥७३॥ कर दिया और उनके पांचजन्य शंखको जोरसे फूँक दिया || ६५ || शंखके उस भयंकर शब्दसे दिशाओंके मुख, समस्त आकाश, समुद्र, पृथिवी आदि सभी चीजें व्याप्त हो गयीं और उससे ऐसी जान पड़ने लगीं मानो शंखके शब्दसे व्याप्त होनेके कारण फट ही गयी हों || ६६ || अत्यधिक मदको धारण करनेवाले हाथियोंने क्षुभित होकर जहाँ-तहाँ अपने बन्धनके खम्भे तोड़ दिये । घोड़े भी बन्धन तुड़ाकर हिनहिनाते हुए नगर में इधर-उधर दौड़ने लगे ||६७|| महलोंके शिखर और किनारे टूट-टूटकर गिरने लगे । श्रीकृष्णने अपनी तलवार खींच ली । समस्त सभा क्षुभित हो उठी, और नगरवासी जन प्रलयकालके आनेकी शंकासे अत्यन्त आकुलित होते हुए भयको प्राप्त हो गये ||६८|| जब कृष्णको विदित हुआ कि यह तो हमारे ही शंखका शब्द है तब वे शीघ्र ही आयुधशाला में गये और नेमिकुमारको देदीप्यमान नागशय्यापर अनादरपूर्वक खड़ा देख अन्य राजाओं के साथ आश्चर्य करने लगे || ६९ || ज्यों ही कृष्णको यह स्पष्ट मालूम हुआ कि कुमारने यह कार्य जाम्बवतीके कठोर वचनोंसे कुपित होकर क्रिया है त्यों ही बन्धुजनोंके साथ उन्होंने अत्यधिक सन्तोषका अनुभव किया। उस समय कुमारकी वह क्रोधरूप विकृति भी कृष्णके लिए अत्यन्त सन्तोषका कारण हुई थी ||७०|| अपने स्वजनोंके साथ कृष्णने युवा नेमिकुमारका आलिंगन कर उनका अत्यधिक सत्कार किया और उसके बाद वे अपने घर गये । घर जानेपर जब उन्हें विदित हुआ कि अपनी स्त्रीके निमित्त से उन्हें कामोद्दीपन हुआ है तब वे अधिक हर्षित हुए ॥७१॥ श्रीकृष्णने नेमिनाथके लिए विधिपूर्वक भोजवंशियोंकी कुमारी राजीमतीकी याचना की, उसके पाणिग्रहण संस्कारके लिए बन्धुजनोंके पास खबर भेजी और स्त्रियोंसहित समस्त राजाओं को बड़े सम्मान के साथ बुलाकर अपने निकट किया ॥ ७२ ॥ उस समयके योग्य जिनका स्नपन किया गया था, जो परम रूपको धारण कर रहे थे, जिन्होंने उत्तमोत्तम आभूषण धारण किये थे और जो अपने-अपने नगरमें अपने-अपने घर स्थित थे ऐसे उत्तम वधू और वर मनुष्योंका मन हरण कर रहे थे ||७३|| Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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