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________________ चतुःपञ्चाशः सर्गः ६११ विस्रब्धा मयमुज्झित्वा स्थित्वा साश्रुविलोचना । विविहार निराहारा पत्युः पन्थानमीक्षते ॥२८॥ अदृश्यायामकस्मात्तु तस्यां पाण्डवपञ्चकम् । किंकर्तव्यतया मूढमभूद्स्यन्तमाकुलम् ॥२९॥ निरुपायास्ततो गत्वा चक्रिणे ते न्यवेदयन् । दुःखी सयादवः सोऽत्र क्षेत्रेष्त्रश्रावयत्तदा ॥ ३० ॥ क्षेत्रान्तरहृतां मत्वा केनचित्क्षुद्रवृत्तिना । तत्प्रवृत्तिपरिप्राप्तौ यादवास्ते सतत्पराः ॥ ३१ ॥ आस्थानस्थितमागस्य कदाचिन्नारदो हरिम् । पूजितो यदुलोकस्य जगादेति प्रियोदितः ||३२|| ईक्षिता धातकीखण्डे कृष्णा कृष्णकृशाङ्गिका । पुर्याममरकङ्कायां पद्मनामस्य सद्मनि ||३३|| अनारतगलद्वाष्पधाराविलविलोचना । सा तस्यान्तः पुरस्त्रीभिः सादरामिरुपास्यते || ३४॥ शीलमात्रमहाश्वासा दीर्घनिश्वासमोचिनी । सत्सु बन्धुषु युष्मासु कथमास्ते रिपोर्गृहे ||३५|| लब्ध्वेति द्रौपदीवार्तां हरिप्रभृतयस्तदा । शशंसुर्नारदं हृष्टाः सापकारोपकारिणम् ॥ ३६ ॥ द्रौपदीहरणं कृत्वा क प्रयाति स दुष्टधीः । प्रेषयामि दुराचारं मृत्यवे मृत्युकाङ्क्षिणम् ||३७|| इति द्विष्ट द्विषे कृष्णः कृष्णामानेतुमुद्यमी । दक्षिणो दक्षिणाम्भोधेस्तटं सशकटो गतः || ३८ ॥ लवणाब्धिपतिं देवं सुस्थितं नियमस्थितम् । आराध्य पाण्डवैः सार्धं धातकीखण्डमीप्सयां ॥ ३९॥ देवेन नीयमानः सन् रथैः षड्भिः सपाण्डवः । द्रागुलस्याब्धिमापतद्धतिकीखण्डभारतम् ||४०|| और सैकड़ों प्रिय पदार्थोंसे लुभाता हुआ रहने लगा ||२७|| द्रौपदी भय छोड़कर विश्वस्त हो गयी और निरन्तर अश्रु छोड़ती तथा आहार-विहार बन्द कर पतिका मार्ग देखने लगी ॥२८॥ इधर जब द्रौपदी अकस्मात् अदृश्य हो गयी तब पांचों पाण्डव किंकर्तव्यविमूढ़ हो अत्यन्त व्याकुल हो गये ॥ २९ ॥ तदनन्तर जब वे निरुपाय हो गये तब उन्होंने श्रीकृष्णके पास जाकर सब समाचार कहा । उसे सुनकर यादवों सहित श्रीकृष्ण बहुत दुःखी हुए और उसी समय उन्होंने समस्त भरत क्षेत्रमें यह समाचार श्रवण कराया ||३०|| जब भरत क्षेत्रमें कंहीं पता नहीं चला तब उन्होंने समझ लिया कि कोई क्षुद्र वृत्तिवाला मनुष्य इसे हरकर दूसरे क्षेत्रमें ले गया है। इस तरह समस्त यादव उसका समाचार प्राप्त करने में तत्पर हो गये ||३१| किसी दिन श्रीकृष्ण सभामण्डपमें बैठे हुए थे कि उसी समय नारदजी वहाँ आ पहुँचे । समस्त यादवोंने उनका सम्मान किया । तदनन्तर प्रिय समाचार सुनाते हुए उन्होंने कहा कि मैंने द्रौपदीको धातकीखण्ड द्वीपकी अमरकंकापुरीमें राजा पद्मनाभके घर देखा है । उसका शरीर अत्यन्त काला तथा दुर्बल हो गया है, उसके नेत्र निरन्तर पड़ती हुई अश्रुधारासे व्याप्त रहते हैं और राजा पद्मनाभके अन्तःपुरकी स्त्रियां बड़े आदर के साथ उसकी सेवा करती रहती हैं || ३२-३४ ।। उसे इस समय अपने शीलव्रतका ही सबसे बड़ा भरोसा है तथा वह लम्बी-लम्बी श्वास छोड़ती रहती है । आप जैसे भाइयोंके रहते हुए वह शत्रुके घरमें क्यों रह रही है ? ||३५|| इस प्रकार द्रौपदीका समाचार पाकर उस समय कृष्ण आदि बहुत हर्षित हुए और अपकारके साथ-साथ उपकार करनेवाले नारदकी प्रशंसा करने लगे ||३६|| 'वह दुष्ट द्रोपदीका हरणकर कहाँ जावेगा ? मृत्युके इच्छुक उस दुराचारीको अभी यमराजके घर भेजता हूँ' ||३७|| इस प्रकार शत्रुके प्रति द्वेष प्रकट करते हुए श्रीकृष्ण द्रोपदीको लानेके लिए उद्यत हुए और रथपर बैठकर दक्षिण समुद्रके तटपर जा पहुँचे ||३८|| वहाँ जाकर उन्होंने धातकीखण्ड द्वीपको प्राप्त करने की इच्छासे पाण्डवों के साथ नियममें स्थित लवणसमुद्र के अधिष्ठाता देवकी अच्छी तरह आराधना की ||३९|| तदनन्तर लवणसमुद्रका अधिष्ठाता देव पांच पाण्डवों सहित कृष्णको छह रथोंमें ले १. विनिहारा म । २. द्रौपदी । ३ - कारिणाम् म । ४. -काङ्क्षिणाम् म. । ५. सशकटः सरथः इत्यर्थः । ६. वीप्सया क., खण्डेप्सया ख. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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