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________________ द्वापश्चाशः सर्गः जरासन्धसुतास्तत्र यादवैः सह कोपिनः । यथायथं स्थादिस्था रणक्रीडा प्रचक्रिरे ॥२८॥ स कालयवनः काल इव स्वयमुपागतः । गजं सलयनामानमारूडो युयुधेऽधिकम् ॥२९॥ सहदेव इति ख्यातो द्रुमसेनो दुमस्तथा । जलचित्रादिको केतू धनुर्धरमहीजयौ ॥१०॥ स मानुः काञ्चनरथो दुर्धरो गन्धमादनः । सिंहाङ्कश्चित्र माली च महीपालबृहद्ध्वजौ ॥३१॥ सुवीरादित्यनागाख्यो सत्यसत्त्वसुदर्शनी । धनपालशतानीको महाशुक्रमहावसू ॥३२॥ वीराख्यो गङ्गदत्तश्च प्रवरः पार्थिवाभिधः । चित्राङ्गदो वसुगिरिः श्रीमान् सिंहकटिः स्फुटः ॥३३॥ मेघनादमहानादौ सिंहनादवसुध्वजौ । वज्रनाममहाबाहू जितशत्रुपुरंदरौ ॥३४॥ अजिताजितशत्रू च देवानन्दशतद्रुतौ । मन्दरो हिसवान्नाम्ना तौ विद्युत् केतुमालिनौ ॥३५॥ कर्कोटकदृषीकेशौ देवदत्तधनंजयो । सगरस्वर्णबाहू च मद्यवानच्युतोऽपि च ॥३६॥ दुर्जयो दुर्मुखश्चापि तथा वासुकिकम्बलौ । त्रिशिरा धारणामिख्यो माल्यवान् संभवामिधः ॥३७॥ महापद्मो महानागो महासेनो महाजयः । वासदो वरुणाभिख्यः शतानीकोऽपि भास्करः ॥३८॥ गरुत्मान् वेणुदारी च वासुवेगशशिप्रभो। वरुणादित्यधर्माणी विष्णुस्वामी सहस्रदिक ॥३९॥ केतुमाली महामाली चन्द्रदेवो बृहद्वलिः । सहस्ररश्मिरर्चिष्मान् जघ्नुर्मागधसूनवः ॥४०॥ 'पतन् मनुजमातङ्गतुरङ्गरथसंकटे । स कालयवनो युद्धे निरुद्धो वसुदेवजैः ॥४१॥ तेषां तस्य च संग्रामो यशःसंग्रहकारिणाम् । अन्योन्याक्षेपिवाक्याला प्रवृत्तो वार्तसंकथम् ॥४२॥ छन्ना तेन कुमाराणां शिरोमी रुधिरारुणः । चक्रनाराचनिभिन्नैः पङ्कजैरिव भूरभात् ॥४३॥ सारणेन कुमारेण स कालयवनो रुषा । नीतः खड्गप्रहारेण कालस्य सदनं चिरात् ॥४४॥ नोपर स्थित बाणोंको वर्षासे समस्त यादवोंको आच्छादित करने लगा ॥२७॥ रथ आदि वाहनों क्रोधसे भरे जरासन्धके पुत्र भी यादवोंके साथ यथायोग्य रणक्रीड़ा करने लगे॥२८॥ राजा जरासन्धका सबसे बड़ा पुत्र कालयवन जो आये हुए साक्षात् यमराजके समान जान पड़ता था, मलय नायक हाथीपर सवार हो अधिक युद्ध करने लगा ॥२९|| इसके सिवाय सहदेव, द्रुमसेन, द्रुम, जलकेतु, चित्रकेतु, धनुर्धर, महीजय, भानु, कांचनरथ, दुर्धर, गन्धमादन, सिंहांक, चित्रमाली, महीपाल, बृहद्ध्वज, सुवीर, आदित्यनाग, सत्यसत्त्व, सुदर्शन, धनपाल, शतानीक, महाशुक्र, महावसु, वीराख्य, गंगदत्त, प्रवर, पार्थिव, चित्रांगद, वसुगिरि, श्रीमान्, सिंहकटि, स्फुट, मेघनाद, महानाद, सिंहनाद, वसुध्वज, वज्रनाभ, महाबाहु, जितशत्रु, पुरन्दर, अजित, अजितशत्रु, देवानन्द, शतद्रुत, मन्दर, हिमवान्, विद्युत्केतु, माली, कर्कोटक, हृषीकेश, देवदत्त, धनंजय, सगर, स्वर्णबाहु, मद्यवान, अच्युत, दुर्जय, दुर्मख, वासुकि, कम्बल, त्रिशिरस, धारण, माल्यवान, सम्भव. महापद्म. महानाग, महासेन, महाजय, वासव, वरुण, शतानीक, भास्कर, गरुत्मान्, वेणुदारी, वासुवेग, शशिप्रभ, वरुण, आदित्यधर्मा, विष्णुस्वामी, सहस्रदिक्, केतुमाली, महामाली, चन्द्रदेव, बृहद्वलि, सहस्ररश्मि और अचिष्मान् आदि जरासन्धके पुत्र प्रहार करने लगे ॥३०-४०॥ गिरते हुए मनुष्य, हाथी, घोड़े और रथोंसे व्याप्त युद्ध में कालयवनको वसुदेवके पुत्रोंने घेर लिया ।।४१।। तदनन्तर यशका संग्रह करनेवाले एवं एक-दूसरेके प्रति निन्दात्मक वाक्योंका प्रयोग करनेवाले उन कुमारों और कालयवनका भयंकर संग्राम हुआ। संग्रामके समय वे अहंकारवश व्यर्थको डींगे भी हांक रहे थे ॥४२॥ कालयवनने चक्र, नाराच आदि शस्त्रोंसे कितने ही कुमारोंके शिर छेद डाले जिससे खूनके लथ-पथ उन कटे हुए शिरोंसे पृथ्वो ऐसी सुशोभित होने लगी मानो कमलोंसे ही सुशोभित हो रही हो ।।४३।। यह देख कुमार सारणने क्रोधमें आकर एक ही तलवारके प्रहारसे कालयवनको १. महीधरौ म. । २. विष्णु-म. । ३. जघ्नो म. । ४. तपन म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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