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________________ ५६६ हरिवंशपुराणे विकृत्य क्षौल्लकं वेषं मातृमोदकभक्षिणा । 'मामादेशकरस्तेन नापितश्च तिरस्कृतः ॥११॥ संकर्षणस्य हवेच्छां पादाकर्षणकारिणः । आरराम चिरं स्वेच्छं लोकविस्मयकृस्कृती ॥११२॥ प्रद्युम्नागमचिह्नानि पूर्वोक्तानि तदा परम् । प्रस्तुतस्तनकुम्भाया मातुरध्यक्षतां ययुः ॥१३॥ साऽतोऽचिन्तयदत्यन्तविस्मिता मे सुतो न्वयम् । कृतरूपपरावृत्तिरागतः षोडशाब्दके ॥११॥ तां प्रद्युम्नकुमारोऽपि तत्क्षणं प्रकृतिस्थितः । सुतस्नेहमितीरित्वा मातरं प्रणनाम सः ॥११५॥ "सानन्दा साकुलाक्षी तं रुक्मिणो तनयं नतम् । परिष्वज्य जहौ दुःखमश्रुभिः सहसा चितम् ॥१६॥ दर्शनामृत सिक्काया पुलकन्यपदेशतः । प्रत्यङ्गरोमकूपेभ्यः सुतस्नेह इवोद्ययौ ॥११७॥ तयोः कुशलसंप्रश्ने संवृत्ते मातृपुत्रयोः । माता पुत्रमवोचत्तं चित्तनिर्वृत्तिदायिनम् ॥११८॥ धन्या कनकमालासौ पुत्र ! पुत्रफलं यया । बालक्रीडावलोकाख्यमनुभूतं शिशोस्तव ॥११९॥ इत्युक्त प्रणिपत्यासी जगाद नयनोत्सवः । बालभावमहं मातर्दर्शयामीह दृश्यताम् ॥१२॥ ततः स तत्क्षणं जातस्तदहर्जातदारकः । आस्वादितकराङ्गुष्ठः प्रोत्फुल्लनयनोत्पलः ॥१२॥ तत्पश्चात् उस विप्रभोजमें जितना भोजन बना था वह सब प्रद्युम्नने खा लिया। जब कुछ भी न बचा तो सत्यभामाको कृपण बता खाये हुए भोजनको वमन द्वारा वहीं उगल वह वहाँसे बाहर चला गया ॥११०।। अब वह क्षुल्लकका वेष रख माता रुक्मिणीके महलमें गया, वहां उसने माता रुक्मिणीके द्वारा दिये हए लड्डू खाये। उसी समय सत्यभामाका आज्ञाकारी नाई रुक्मिणीके शिरके बाल लेनेके लिए उसके घर आया सो प्रद्युम्नने सब समाचार जान उसका खूब तिरस्कार किया ।।१११।। सत्यभामाकी शिकायत सुन बलदेव रुक्मिणीके महलपर आनेको उद्यत हुए तो प्रद्युम्न एक ब्राह्मणका रूप रख द्वारपर पैर फैलाकर पड़ रहा । बलदेवने उसे दूर हटनेके लिए कहा पर वह टससे मस नहीं हआ और कहने लगा कि आज सत्यभामाके घर बहत भोजन कर आया हूँ हमसे उठते नहीं बनता। कुपित हो बलदेवने उसको टांग पकड़कर खींचना चाहा पर उसने विद्याबलसे टांगको इतना मजबूत कर लिया कि वे खींचते-खींचते तंग आ गये। इस प्रकार नाना विद्याओंमें कुशल प्रद्युम्न अपनी इच्छानुसार लोगोंको आश्चर्य उत्पन्न करता हुआ चिरकाल तक क्रीड़ा करता रहा ।।११२॥ उसी समय, प्रद्युम्नके आनेके जो चिह्न पहले नारदने कहे थे वे माता रुक्मिणीको प्रत्यक्ष दिखने लगे और उसके स्तनरूपी कलशोंसे अत्यधिक दूध झरने लगा ॥११३॥ अस्यन्त आश्चर्यमें पड़कर वह विचार करने लगी कि कहीं सोलह वर्ष व्यतीत होनेके बाद मेरा पुत्र ही तो रूप बदलकर नहीं आ गया है ? ||११४॥ उसी क्षण प्रद्यम्नने भी अपने असली रूपमें प्रकट हो पूत्रका स्नेह प्रकट कर माताको प्रणाम किया ॥११५॥ पुत्रको देखते ही रुक्मिणी आनन्दसे भर गयी, उसके नेत्र हर्षके आँसुओंसे व्याप्त हो गये और वह नभ्रीभूत पुत्रका आलिंगन कर चिरसंचित दुःखको आँसुओंके द्वारा तत्काल छोड़ने लगी ॥११६।। पुत्रके दर्शनरूपी अमृतसे सींची हुई रुक्मिणीके शरीरमें प्रत्येक रोम-कूपसे रोमांच निकल आये थे उनसे ऐसा जान पड़ता था मानो पुत्रका स्नेह ही फूट-फूटकर प्रकट हो रहा हो ॥११७।। तदनन्तर जब माता और पुत्र परस्पर कुशल समाचार पूछ चुके तब माताने चित्तके लिए अत्यधिक सन्तोष प्रदान करनेवाले पुत्रसे कहा कि हे पूत्र ! वह कनकमाला धन्य है जिसने तेरी बाल्य अवस्थाकी बाल-क्रीडाओंके देखने रूप पूत्र जन्मके फलका उपभोग किया ॥११८-११९।। माताके इतना कहते ही नेत्रोंको आनन्द प्रदान करनेवाले प्रद्युम्नने नमस्कार कर कहा कि हे मातः ! मैं यहां ही अपनी बाल-चेष्टाएँ दिखलाता हूँ, देख । ।।१२०।। तदनन्तर वह उसी क्षण एक दिनका बालक बन गया और नेत्ररूपी नील कमलको १. नामादेश-म.। २. परे म., ग. । ३. सुतो नु + अयम् इतिच्छेदः । ४. सानन्दसाकुलाक्षी म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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