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________________ पञ्चचत्वारिंशः सर्गः भाचा गुणप्रमा तासु सुप्रभा हीश्रियौ रतिः । पद्मा चेन्दीवरा विश्वाचर्या चाशोकया सह ॥१८॥ युधिष्ठिराय ताः सर्वाः पूर्वमेव निवेदिताः । लब्ध्वा तस्यान्यथा वार्तामणुव्रतधराः स्थिताः ॥१९॥ इभ्योऽपि प्रियमित्राख्यस्तत्र पुर्या सपर्यया । अन्ववर्तत कौन्तेयान पुरुषान्तरविद्धनी ।।१०।। सोमिनी मामिनी तस्य कन्या नयनसुन्दरी । सौन्दर्येण स्वरूपेण नयनानन्ददायिनी ॥१०॥ युधिष्टिराय वीराय प्रागेव प्रतिपादिता । राजपुध्यो यथा पूर्वास्तथा सा तद्गता स्थितां ॥१०॥ राजा सभार्य इभ्यश्च महापुरुषवेदिनौ । कुन्तीपुत्राय ताः कन्या ज्यायसे दातुमिच्छतः ॥१०३।। तास्तु निश्चिन्तचित्तत्वादन्यलोकगतोऽपि हि । स एष पतिरस्माकमिति नेच्छन्ति तं द्विजम् ।।१०४॥ ततोऽपि नगराधाता नगराजस्थिरात्मकाः । प्राप्ताश्चम्पापुरी तेऽमी कर्णो यत्र महानृपः ॥१०५॥ तत्र मीमो महानागं पुरमध्ये मदोत्कटम् । प्रकोढ्य निर्मदीचक्रे कर्णसंक्षोमकृत्कृती ॥१०॥ ततोऽपि वैदिश याता पुरं सुरपुरोपमम् । राजा वृषध्वजो यत्र युवराजो दृढायुधः ॥१०॥ दिशावली प्रिया राज्ञो दिशानन्दा तु नन्दना । दिशासु विदिताकारा दिशामिव विशुद्धता ॥१०॥ मीमो राजगृहे राज्ञा गम्मीरस्वरदर्शनः। अदृश्यत दृशां कान्तो भिक्षार्थी किल रूपवान् ।।१०९।। कलाओंमें पारंगत थीं ॥९७॥ उनके नाम थे-१ गुणप्रभा, २ सुप्रभा, ३ ह्री, ४ श्री, ५ रति, ६ पद्मा, ७ इन्दीवरा, ८ विश्वा, ९ आचर्या और १० अशोका। इनमें गुणप्रभा ज्येष्ठ थी॥९८॥ ये सभी कन्याएं पहले युधिष्ठिरके लिए प्रदान की गयी थीं परन्तु बादमें उनका अन्यथा समाचार प्राप्त कर वे अणुव्रतोको धारण करनेवाली श्राविकाएं बन गयी थी ।।९९|| उसी त्रिशृंगपुरमें एक प्रियमित्र नामका सेठ रहता था जो बहुत भारी धनी तथा पुरुषोंके अन्तरको समझनेवाला था। पाण्डवोंको विशिष्ट पुरुष समझ उसने उनका बहत सत्कार किया ॥१०॥ उसकी सोमिनी नामकी स्त्रो थी और उससे उसके स्वरूप तथा सौन्दर्यसे नेत्रोंको आनन्द देनेवाली नयनसुन्दरी नामकी कन्या हुई थी॥१०१।। यह कन्या वीर युधिष्ठिरके लिए पहले ही दे दी गयी थी इसलिए वह भी पूर्वोक्त राजपुत्रियोंके समान अणुव्रत धारण कर रहती थी॥१०२॥ राजा प्रचण्डवाहन और अपनी स्त्रीसहित सेठ प्रियमित्र, ब्राह्मणवेषधारी पाण्डवोंको महापुरुष समझते थे इसलिए ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठिरके लिए वे सब कन्याएं देना चाहते थे ॥१०३।। परन्तु कन्याओंने अपने मनमें यह दृढ़ निश्चय कर लिया था कि 'युधिष्ठिर भले ही परलोक चले गये हों पर इस भवमें वे ही मेरे पति हैं अन्य नहीं।' इस निश्चयसे उन्होंने ब्राह्मणवेषधारी युधिष्ठिरको अन्य पुरुष समझ स्वीकृत नहीं किया ॥१०४॥ तदनन्तर सुमेरुके समान स्थिरचित्तके धारक वे सब पाण्डव उस नगरसे भी चल दिये और चलते-चलते चम्पापुरीमें पहुँचे जहाँ महाराजा कर्ण राज्य करते थे ॥१०५।। वहाँ एक मदोन्मत्त बड़ा हाथी नगरमें उपद्रव मचा रहा था सो कुशल भीमने क्रीड़ा कर उसे मदरहित कर दिया । भीमकी यह वीरता देख कर्णको क्षोभ उत्पन्न हुआ ॥१०६॥ वहांसे चलकर वे इन्द्रपुरके समान सुन्दर वैदिशपुर पहुंचे। उस समय वहाँका राजा वृषध्वज था और युवराज दृढायुध था ॥१०७॥ राजा वृषध्वजको रानीका नाम दिशावली था और उसके दिशानन्दा नामकी पुत्री थी। दिशाओंकी विशुद्धताके समान दिशानन्दाको सुन्दरता समस्त दिशाओंमें प्रसिद्ध थी॥१०८॥ एक दिन गम्भीर स्वर और गम्भीर दृष्टिको धारण करनेवाले, नेत्रप्रिय रूपवान् भीम भिक्षाकी १. विश्वाचार्या म. । २. युधिष्ठिरस्य । ३. कौन्तेया म. । ४. स्थिताः म.। ५. निश्चित म.। ६. नगराज इव सुमेरुरिव स्थिर आत्मा येषां ते । ७. प्रक्रीडन् क.। ८. वर्ण-म.। ९. जाताः क., ग., घ.. म.। १०. दृशा कान्ता म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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