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________________ पत्रचत्वारिंशः सर्गः उदाररूपलावण्या दुकूलपटसाटिका । जटिला वटशाखेव स्निग्धच्छाया म्यराजत ॥७३॥ आकर्णायतनेत्राभ्यां स्वधरेण मुखेन्दुना । जघनस्तनमारेण मनो हरति तापसी ॥७॥ पूज्या तापसलोकस्य सकलस्य तपोवनम् । अकरोत्पावनं तन्वी चन्द्रलेखेव निर्मला ॥७५॥ कौन्तेयानां कृतातिथ्या तापसोचितवृत्तिमिः । जहार हारिवाक्यासौ क्षुत्पिपासापथश्रमम् ॥७६॥ कुन्ती पप्रच्छ तां प्रीत्या बाले ! कमलकोमले। नवे वयसि वैराग्यं कुतो जातेमतिव्रते ॥७॥ इति सानुनयं प्रष्टा राजपुत्री जगौ गिरा । मनो मधुरया तेषां हरन्ती हरिणेक्षणा ॥७॥ साधु पृष्टं त्वया पूज्ये ! श्रूयतामत्र कारणम् । सज्जनो हि मनोदुःखं निवेदितमुदस्यति ॥७९॥ कौरवाय पुरैवाहं कौन्तेयायाग्रजाय हि । स्वभावोदारचेष्टाय गुरुभिर्विनिवेदिता ॥४०॥ समातृभ्रातृकस्यास्य मदपुण्यप्रभावतः । श्रुत्वा वार्ता जनेभ्यो या न स्मर्तुमपि शक्यते ॥४१॥ दाहदुःखमृतं कान्तं युक्तं तेनैव वर्मना । अनुमत तु तापस्ये शक्तिहीनतया स्थिता ॥८॥ निशम्येति वचः सौम्या सा जगौ माविनी स्नुषाम् । कृतं भद्रं स्वया मद्रे कुर्वन्त्या प्राणरक्षणम् ॥४३॥ अन्यथा चिन्तयत्येष मित्रे मित्रजनो जने । अन्यथा विधिरप्यस्मादयंते दीर्घदर्शिता ॥४४॥ कल्याणहेतवः प्राणाः कल्याणि! मम वाक्यतः । तपस्यस्यापि धार्यन्तां जीवन्नी मद्रमाप्स्यसि ॥८५॥ वह अतिशय रूप और लावण्यकी धारक थी. सन्दर स्वच्छ साडीसे सशोभित थी. शिरपर जटाएं रखाये हुई थी और स्निग्ध कान्तिसे सहित थी इसलिए पायोंको धारण करनेवाली स्निग्ध छायासे सहित वटवृक्षको शाखाके समान सुशोभित हो रही थी ॥७३|| वह तापसी कानों तक लम्बे नेत्र, सुन्दर ओठ, मुखरूपी चन्द्रमा एवं नितम्ब और स्तनोंके भारसे सबका मन हरती थी ॥७४|| वह समस्त तापसोंके द्वारा पूज्य थी, चन्द्रमाकी कलाके समान कृश तथा निर्मल थी और अपने आवाससे उस तपोवनको पवित्र करती थी ॥७५।। मधुर वचन बोलनेवाली उस तापसीने तापसोंके योग्य वृत्तिसे पाण्डवोंका अतिथि-सत्कार किया तथा उनकी भूख-प्यास और मार्गको थकावटको दूर किया ॥७६।। एक दिन कुन्तीने बड़े प्रेमसे उससे पूछा कि हे कमलके समान कोमलांगो बेटी ! तुझे नयी अवस्थामें ही वैराग्य किस कारणसे हो गया है जिससे तूने यह कठिन व्रत धारण कर रखा है ? ||७७|| इस प्रकार स्नेहके साथ पूछी जानेपर मृगनेत्री राजपुत्री मनोहर वाणीसे उनका मन हरती हुई बोली कि हे पूज्ये ! आपने ठीक पूछा है, मेरे वैराग्यका कारण सुनिए क्योंकि सज्जन पुरुष बताये हुए मनके दुःखको दूर कर देते हैं ॥७८-७९॥ मेरे गुरुजनोंने मुझे स्वभावसे उत्तम चेष्टाके धारक पाण्डवोंके बड़े भाई युधिष्ठिरके लिए पहले ही दे रखा था ॥८०॥ परन्तु मेरे पापके प्रभावसे माता और भाइयोंके साथ उनके विषयका जो समाचार लोगोंसे सुना है उसका स्मरण भी नहीं किया जा सकता ॥८१॥ 'मेरा पति दाहके दुःखसे मरा है इसलिए मुझे भी उसी मार्गसे मरना युक्त था परन्तु मैं शक्तिहीन होनेके कारण उस मार्गसे मर नहीं सकी इसलिए तपस्या करने लगी हूँ' ॥८२॥ ___ तापसीके वचन सुन उसे होनहार पुत्रवधू जान सौम्य स्वभावकी धारक कुन्तीने कहा कि हे भद्रे ! तूने बहुत उत्तम किया जो प्राणोंकी रक्षा की ॥८३॥ मित्रजन, मित्रजनके विषयमें कुछ अन्य विचार करते हैं और भाग्य उससे विपरीत कुछ अन्य ही कार्य कर देता है इसलिए दीर्घदर्शिताकी आकांक्षा की जाती है ।।८४॥ हे कल्याणि ! प्राण कल्याणके कारण हैं इसलिए मेरे १. सुष्ठ अधरः स्वधरः तेन । २. जातमितिव्रते म.। ३. दूरीकरोति । ४. चिन्तयत्येषा म., प., ग., ङ। ५. दयते म., घ., ग., ङ: Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org |
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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