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________________ त्रिचत्वारिंशः सर्गः सत्यभामागृहाभ्यर्णमाकीर्ण व्यसंपदा । धिष्ण्यं विष्णुर्ददौ दिव्यं रुक्मिण्यै परिवारवत् ॥१॥ महत्तरप्रतीहारीभृत्यादिपरिवारिता । यानाश्वरथयुग्यादि पत्या गौरविताऽतुषत् ॥२॥ ज्ञात्वा भामा हरीष्टां तां भामा मासातिशायिनीम् । सा सेाऽपि हरि धीरा रहः क्रीडास्वरीरमत् ॥३॥ एकदा मुखताम्बूलं निष्टयतं भीप्सजन्मना । सोऽशुकान्तेन संगोप्य सत्यभामागृहं गतः॥४॥ स्वभावमुखसौगन्ध्यबद्धभ्रान्तालिमण्डलम् । अहरत्सत्यमामा तद् भ्रान्त्या सद्गन्धवस्त्विति ॥५॥ वर्णगन्धाढयमापिष्य समालमत चादरात् । हसिता हरिचन्द्रण सा चुक्रोश तमीय॑या ॥६॥ सौभाग्यातिशयं सत्या सपन्या हरिचेष्टितैः । विदित्वा रूपलावण्यं द्रष्टुमभ्युत्सुकाऽमवत् ॥७॥ अवदच्च पति नाथ ! रुक्मिणी मम दशय । श्रोत्रयोरिव संहृष्टिं नेत्रयोरपि मे कुरु ॥८॥ प्रतिपद्य स तदवाक्यमन्तगूढो विनिर्गतः । मणिवाप्यास्तटे कान्ता संस्थाप्य पुनरागतः ॥९॥ आनयामि तवाभीष्टां विशोद्यानमिति प्रियाम् । संप्रेष्यानुगतस्तस्थौ गुल्मसंगूढविग्रहः ।।१०।। तावच्च मणिवाप्यन्ते मणिभूषणधारिणीम् । पादाग्रेण स्थितां चूतलतामालम्ब्य पाणिना ॥३१॥ प्रोल्लमत्स्थूलधम्मिल्ला वामहस्तेन बिभ्रतीम् । स्तनमारनतामूलफलन्यस्तायतेक्षणाम् ॥१२॥ श्रीकृष्णने सत्यभामाके महलके पास, नाना प्रकारको सम्पदाओंसे व्याप्त एवं योग्य परिजनोंसे सहित एक सुन्दर महल रुक्मिणीके लिए दिया ॥१॥ उसे महत्तरिका, द्वारपालिनी तथा सेवक आदि परिजनोंसे युक्त किया। नाना प्रकारके वाहन घोड़े, रथ, बैल आदि दिये तथा पट्टरानी पदसे उसका गौरव बढ़ाया जिससे वह बहुत ही सन्तुष्ट हुई ॥२॥ इधर सत्यभामाको जब पता चला कि श्रीकृष्ण समस्त स्त्रियोंको अतिक्रान्त करनेवाली एक स्त्री लाये हैं और वह उन्हें अत्यधिक प्रिय है तब वह ईर्ष्यासे सहित होनेपर भी बड़ी धीरतासे उन्हें नाना प्रकारकी क्रीड़ाओंमें रमण कराने लगी ॥३॥ एक दिन कृष्ण रुक्मिणीके द्वारा उगले हुए मुखके पानको वस्त्रके छोरमें छिपाकर सत्यभामाके घर गये। वह पान स्वभावसे ही सुगन्धित था और उसपर रुक्मिणीके मुखको सुगन्धिने चार चाँद लगा दिये थे इसलिए उसपर भ्रमरोंका समूह आ बैठा था। 'यह कोई सुगन्धित पदार्थ है' इस भ्रान्तिसे सत्यभामाने उसे ले लिया और उत्तम वर्ण तथा गन्धसे युक्त उस पानके उगालको अच्छी तरह पीसकर अपने शरीरपर लगा लिया। यह देख श्रीकृष्णने उसकी खूब हंसी उड़ायी जिससे वह ईर्ष्यावश उनके प्रति आगबबूला हो गयी ॥४-६।। ___ कृष्णकी चेष्टाओंसे सौतके सौभाग्यका अतिशय जानकर सत्यभामा उसका रूप-लावण्य देखने के लिए उत्सुक हो गयी ।।७।। और एक दिन पतिसे बोली कि 'हे नाथ ! मुझे रुक्मिणी दिखलाइए, कानोंकी तरह मेरे नेत्रोंको भी हर्ष उपजाइए' |८|| सत्यभामाकी बात स्वीकृत कर वे हृदयमें कुछ रहस्य छुपाये हुए गये और मणिमय वापिकाके तटपर रुक्मिणीको खड़ा कर पुनः सत्यभामाके पास आ गये ।।९।। तदनन्तर 'तुम उद्यानमें प्रवेश करो, मैं तुम्हारी इष्ट रुक्मिणीको अभी लाता हूँ' यह कहकर उन्होंने सत्यभामाको तो आगे भेज दिया और आप स्वयं पीछेसे जाकर किसी झाड़ीके ओटमें शरीर छिपाकर खड़े हो गये ।।१०।। मणिमय आभूषणोंको धारण करनेवालो रुक्मिणी मणिमय वापिकाके समीप एक हाथसे आम्रकी लता पकड़कर पंजोंके बल १. परिचारवत् घ.। २. परिवारताः मः। ३. सत्यभामा। ४. रुक्मिण्या। ५. सोऽशुकान्त्येन म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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