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________________ त्रिशः सगः त्वयि सकलधरित्रीं शासति ध्वस्तनाथा कथमहमुपयाता तात वैधव्यदुःखम् । इदमपि खलु सोठं वैरनिर्यातनार्थं मदमुदितयदूनां रक्तपक्कैः शिरोभिः ॥ ६६ ॥ दुहितुरिति विलापप्रायमाकर्ण्य वाक्यं नरपतिरुदवोचन्मुञ्च बालेऽतिशोकम् । जगति हि भवितव्यं माविनो दैवयोगादगणितपरवीर्यं दैवमत्र प्रधानम् ॥ ६७ ॥ पशुरपि निरपायं निर्गमोपायमार्ग विस्मृशति वधशङ्कः क्षेत्रमादौ विविक्षुः । स्फुटमिदमपि वृत्तं विस्मृतं मर्तुकामैस्तव पतिमतिमत्तैर्यादवैर्मारयद्भिः ॥ ६८ ॥ तव पदशरणास्तेऽकष्टका यद्यपि स्युः सहबलकुलशाखास्ते तथाप्याशु वरसे । श्रुतिपथमनिवृत्ताः सन्ति मैक्रोधवर्षदेवदहन शिखाभिर्भस्मिता ध्वस्तसंज्ञाः ॥ ६९ ॥ प्रियवचनपयोभिर्देहजाक्रोधवह्निप्रततिमुपशमय्य क्षुब्धकोपानलः सः । यवननिधनकालं कालकल्पं तनूजं यदुजनिधन हेतोरादिदेशांशु राजा ॥ ७० ॥ चलजलधिसमानेनाभ्यमित्रं बलेन द्विपचतुरतुरङ्गस्यन्दनाथेन गत्वा । स लघु दश च सप्तायुप्रयुद्धानि युद्ध वा यदुभिरतुलमालावर्त शैले ननाश ॥ ७१ ॥ पुनरपि जितजेयं भ्रातरं मागधी द्रागजितमपरपूर्व प्राहिणोत्प्राणतुल्यम् । प्रलयशिखिशिखालीघस्मरः स स्वयोगात्स्वबल पवननुन्नो 'द्विट्जगद्मासलोलः ||१२|| समुद्रको क्षुभित कर देती है उसी प्रकार उसने राजा जरासन्धको क्षुभित कर दिया || ६५ ॥ वह कह रही थी कि हे तात! जब आप समस्त पृथिवोका शासन कर रहे हैं तब में पतिरहित हो वैधव्य के दुःखको कैसे प्राप्त हो गयी ? हे पिताजी ! अब तक मैंने जो यह वैधव्यका दुःख सहा है वह गर्वसे फूले यादवोंके रक्तरूप पंकसे युक्त शिरोंसे वैरका बदला चुकाने के लिए ही सहा है || ६६ || इस प्रकार प्रायः विलापसे युक्त पुत्रीके वचन सुनकर राजा जरासन्धने कहा कि बेटी ! अत्यधिक शोक छोड़ । इस संसारमें जो होता है वह होनहार देवके योगसे ही होता है । दूसरोंकी शक्तिका तिरस्कार करनेवाला देव ही इस संसार में प्रधान है ||६७|| खेतमें घुसनेका इच्छुक पशु भी वधकी शंका कर सबसे पहले निकलनेके लिए निरुपद्रव मार्गका विचार कर लेता है परन्तु तेरे पतिको मारते हुए इन अत्यन्त मत्त यादवोंने इस स्पष्ट बातको भो भुला दिया इससे सिद्ध है कि ये मरना चाहते हैं ||६८ || हे वत्से ! ये भले अब तक तेरे चरणको शरण प्राप्त कर निष्कण्टक रहे हों और भले ही ये बल तथा कुलकी शाखाओंसे युक्त हों परन्तु यह निश्चित है कि ये शीघ्र ही मेरे क्रोधसे बरसनेवाली दावानलकी ज्वालाओंसे भस्म होनेवाले हैं, इनका नाम भी नष्ट हो जानेवाला है और ये श्रवण मागंको अतिक्रान्त कर चुके हैं- अब इनका नाम भी नहीं सुनाई देगा ॥ ६९ ॥ ४६९ इस प्रकार प्रिय वचनरूपी जलके द्वारा पुत्रीकी क्रोधाग्निके समूहको शान्त कर क्षोभको प्राप्त हुए क्रोधानलसे युक्त राजा जरासन्धने यादवोंको मारनेके लिए यमराजके तुल्य अपने कालयवन नामक पुत्रको शीघ्र ही आदेश दिया || ७०॥ कालयवन, चंचल समुद्र के समान दिखनेवाली हाथी, घोड़ा और रथ आदिसे युक्त सेनाके साथ शीघ्र ही शत्रुके सम्मुख चला और यादवोंके साथ सत्रह बार भयंकर युद्ध कर अतुलमालावतं नामक पर्वतपर नष्ट हो गया - मर गया ॥ ७१ ॥ तदनन्तर राजा जरासन्धने शीघ्र ही अपने भाई अपराजितको भेजा जो कि शत्रुओंको जीतनेवाला था, प्राणोंके तुल्य था, अपने संयोगसे प्रलय कालको अग्निकी शिखाओंके समूहको नष्ट करनेवाला था, अपनी सेनारूपी प्रबल पवनसे प्रेरित था, और शत्रुरूपी जगत्के ग्रसनेके लिए सतृष्ण १. शरणाशा कण्टका म. क., ग, ड. । २. मतिमत्ताः क, ख, ग, ड, म. । ३. न क्रोध - क. । ४. व्युग्रयुद्धानि म । ५ द्विट्गजग्रास - ग. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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