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________________ ४४६ हरिवंशपुराणे अर्हत्सु योऽनुरागो यश्चाचार्ये बहुश्रुते यच्च । प्रवचन विनयश्चासौ चातुर्विध्यं भजति 'भक्तेः ॥ १४१ ॥ आवश्यक क्रियाणां षण्णां काले प्रवर्तन नियते । तासां सापरिहाणिज्ञेया सामायिकादीनाम् ॥ १४२ ॥ सावद्ययोगविरहं सामायिकमेकभावगं चित्तम् । गुणकीर्तिस्तीर्थं कृतां चतुरादे विंशतेः स्तवकः ॥ १४३॥ द्वयासना यासु शुद्धा द्वादशवर्ताः प्रवृत्तिषु प्राज्ञैः । सशिरश्चतुरानतिकाः प्रकीर्तिता वन्दना वन्द्याः ॥१४४॥ द्रव्ये क्षेत्रे काले मावे च कृतप्रमादनिर्हरणम् । वाक्काय मनः शुद्धया प्रणीयते तु प्रतिक्रमणम् ॥ १४५ ॥ आगन्तुकदोषाणां प्रत्याख्यानं तु वर्ण्यतेऽपोहः । कायोत्सर्गः "काये मितकालं निर्ममत्वं तु ॥ १४६ ॥ परमतभेदसमर्थज्ञानतपो जिनमहाम हैजंगति । मार्गप्रभावना स्यात्प्रकाशनं मोक्षमार्गस्य ॥ १४७॥ धेनोरिव निजवत्से सौत्सुक्यधियः सधर्मणि स्नेहः । प्रवचनवत्सलता स्यात्सस्नेहः प्रवचने यस्मात् ॥ ४८ ॥ तीर्थकर नामकर्मणि पोटश तत्कारणान्यमून्यनिशम् । व्यस्तानि समस्तानि च भवन्ति सद्भाव्यमानानि ॥ १४९ ॥ 4 आदिसे उत्पन्न दुःखको प्रासुक द्रव्योंके द्वारा दूर करनेका प्रत्यक्ष करना सो वैयावृत्य भावना है || १४०|| अर्हन्त में जो अनुराग है, आचार्यमें जो अनुराग है, बहुश्रुत - अनेक शास्त्रोंके ज्ञाता उपाध्याय परमेष्ठी में जो अनुराग है और प्रवचनमें जो विनय है वह क्रमसे अर्हद् भक्ति, आचार्य भक्ति, बहुश्रुत भक्ति और प्रवचन भक्ति नामक चार भावनाएं हैं ||१४१ || सामायिक आदि छह आवश्यक क्रियाओं की नियत समय में प्रवृत्ति करना सो आवश्यकापरिहाणि नामक भावना ।। १४२ ।। समस्त सावद्य योगों का त्याग कर चित्तको एक पदार्थ में स्थिर करना सो सामायिक है। चौबीस तीर्थंकरोंके गुणोंका कथन करना सो स्तुति है || १४३ || जिन प्रवृत्तियों में दो आसन, निर्दोष बारह आवर्त और चार शिरोनतियां की जाती हैं उन्हें विद्वज्जन वन्दनीय वन्दना कहते हैं ॥ १४४॥ द्रव्य-क्षेत्र काल और भाव के विषय में किये हुए प्रमादका मन, वचन, कायकी शुद्धिसे निराकरण करना सो प्रतिक्रमण है || १४५ || आगन्तुक - आगामी दोषोंका निराकरण करना प्रत्याख्यान कहलाता है । और निश्चित समय तक शरीर में ममताका त्याग करना कायोत्सगं है ॥१४६॥ अन्य मतोंके खण्डन करने में समर्थ ज्ञान, तपश्चरण एवं जिनेन्द्र भगवान्‌की महामह-पूजाओंसे संसार में मोक्षमार्गका प्रकाश करना मार्ग प्रभावना है || १४७|| जिस प्रकार गायका अपने बछड़ेमें स्नेह होता है उसी प्रकार उत्सुकतासे युक्त बुद्धिवाले मनुष्यका सहधर्मी भाईमें जो स्नेह है उसे प्रवचन वात्सल्य कहते हैं क्योंकि सहधर्मी से जो स्नेह है वह प्रवचन से ही स्नेह है || १४८|| सत्पुरुषोंके द्वारा निरन्तर चिन्तन की हुई उक्त सोलह भावनाएं, पृथक-पृथक् अथवा समुदाय रूपसे तीर्थंकर नामकर्मके बन्धकी कारण हैं ॥ १४९ ॥ १. भक्ति: म. । २ क्रियते म. । ३. चतुरादिविंशतिस्तवक: म., क., ख. । ४. वण्यंते यो ज्ञे म. । ५. कालो म । ६. मितकार्य म । ७. सद्भिः भव्यमानानि सद्भाव्यमानानि ( क. टि. ) । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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