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________________ ४४४ हरिवंशपुराणे विधीनामिह सर्वेषामेषा हि च प्रदर्शना । एकश्चतुर्थकामिख्यो द्वौ षष्ठं तु योऽष्टमः । दशमाद्यास्तथा वेद्याः षण्मास्यन्तोपवासकाः ॥२५॥ आर्या पञ्चदशीपर्यन्ता उपवासाः प्रतिपदादितिथिषु कार्याः । बहुभेदा विज्ञेया जिनमार्गे सर्वसौख्यसंपन्नाः ॥१२६॥ माद्रपदशुक्लपक्षे सप्तम्यामप्यनन्तफेलंसुखफलदः । परिनिर्वाणाख्यविधिः प्रतिवर्षमुपोषणीयस्तु ॥१२७॥ शालिनी एकादश्यां प्रातिहार्यप्रसिद्धः तुल्यां पल्यैः शं फलस्यस्य चैव । एकादश्यां कृष्णजायामशीतिः षट् पूर्वाशं संविधत्ते ह्यनन्तम् ॥१२८॥ अनुष्टुप् शुद्धस्य मार्गशीर्षस्य तृतीयस्यामनन्तकृत् । विमानपङ्क्तिवैराज्यः चतुर्थ्या षष्ठतो विधिः ।।१२९।। एतेषु विधयः कार्या यथाशक्ति शरीरिमिः । स्वर्गापवर्गसौख्यस्य पारम्पर्येण हेतवः ॥१३०॥ है ॥१२४।। इस प्रकरणमें ऊपर जितनी विधियोंका वर्णन किया गया है उन सबमें सामान्य रूपसे यह दिखा देना आवश्यक है कि जहाँ उपवासके लिए चतुर्थक शब्द आया है वहाँ एक उपवास, जहां षष्ठ शब्द आया है वहां दो उपवास और जहाँ अष्टम शब्द आया है वहां तीन उपवास समझना चाहिए। इसी प्रकार दशमको आदि लेकर छह मासपर्यन्तके उपवासोंकी संज्ञा जाननी चाहिए ॥१२५॥ प्रतिपदासे लेकर पञ्चदशी तककी तिथियोंमें उपवास करना चाहिए। ये उपवास अनेक भेदोंको लिये हुए हैं और जैन मार्गमें इन्हें सब प्रकारके सुखोंसे सम्पन्न करनेवाला कहा है ॥१२६॥ प्रतिवर्ष भादों सदी सप्तमीके दिन उपवास करना चाहिए। यह परिनिर्वाण नामक विधि है तथा अनन्त सुखरूपी फलको देनेवाली है ॥१२७।। भादों सुदी एकादशीके दिन उपवास करनेसे प्रातिहार्य प्रसिद्धि नामकी विधि होती है तथा यह पल्यों प्रमाणकाल तक सुखरूपी फलको फलती है। हर एक मासकी कृष्ण पक्षको एकादशियोंके दिन किये हुए छियासी उपवास अनन्त सुखको उत्पन्न करते हैं ॥१२८॥ मार्गशीर्ष सुदी तृतीयाके दिन उपवास करना अनन्त मोक्ष फलको देनेवाला है तथा इसी मासकी चतुर्थीके दिन वेला करनेसे विमान पंक्ति वैराज्य नामकी विधि होती है और उसके फलस्वरूप विमानोंकी पंक्तिका राज्य प्राप्त होता है ।।१२९।। इन ऊपर कही हुई विधियोंमें मनुष्योंको यथाशक्ति विधियाँ करनी चाहिए क्योंकि वे साक्षात् और परम्परासे स्वर्ग १. प्रतिपदादिषु च कार्या-क.।' २. फलसुखदः म.। ३. विंशति सप्ताधिकाश्चाष्टौ क., ड. । * अस्मिन् प्रकरणे क., ङ., ग. पुस्तकेषु पार्श्वभागे निम्नाङ्किताः श्लोकाः समाबद्धाः सन्ति परं तु रचनाशैथिल्यात्ते ग्रन्थाङ्गभूताः सन्तीति न प्रतिभान्ति । पश्चात् केनचित् योजिता इति प्रतीयते । पं. गजाधरलालेन तु स्वकृतानुवादे प्रवेशितास्ते भाद्रपदकृष्णपक्षे षष्ट्यां सूर्यप्रभस्त्रयोदश्याम् । चन्द्रप्रभनामा च ज्योतिर्माला च पल्यं तु ॥ ततः कृष्णद्वादश्यां नन्दीश्वर इत्युदीरितानन्तफलः । कार्तिकशुक्लतृतीयामधिष्ठितश्चापि विविधसर्वार्थविधिः ।। श्री पं. गजाधरलालेन अन्येऽपि द्वित्रा: श्लोका अनूदिताः येषु कुमारसंभव-सुकुमारविध्योरुल्लेखः कृतः कितूपलब्धपुस्तकेषु ते श्लोका नावलोकिताः, मुम्बईस्थ सरस्वतीभवनपुस्तकेऽपि एते श्लोका न सन्ति । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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