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________________ ४४२ हरिवंशपुराणे पञ्चविंशतिकल्याणभावनाविधिरत्र तः । तावद्भिरेव बोद्धव्यो विद्वद्भिरुपवर्णितः ॥११॥ सम्यक्त्वविनयज्ञानशीलसत्वश्रुतश्रुताः । समित्येकान्तगुप्तीनां भावना धर्म्यशुक्लगाः ॥१४॥ संक्लेशेच्छानिरोधस्य संवरस्य च भावनाः । प्रशस्तयोग संवेगकरुणोद्वेगभावनाः ॥१५॥ मोगसंसारनिर्वेदभक्तिवैराग्यमोक्षजाः । मैञ्युपेक्षा प्रमोदान्ताः ख्याताः कल्याणमावनाः ॥१६॥ प्रतीत्य सप्तभूमीनां जघन्यपरमायुषाम् । चतुर्दशोपवासास्तु विधेया विधिवबुधैः ॥११७॥ तिर्यग्गतावपर्याप्तपर्याप्तानां नृणां गतौ । प्रत्येकमपि चत्वार ऐशानान्ते प्रबुद्धयः ॥११८॥ द्वाविंशतिरतस्तूमच्युतान्तेष्वमी ततः । वेयकेषु कर्तव्य अष्टादश नवस्वपि ॥१९॥ द्वौ नवानुदिशेष्वेतौ हो वानुत्तरपञ्चके । अष्टाषष्टिरमी सर्वे स्युर्दुःखहरणे विधौ ॥१२०॥ नामत्रिणवतित्वादीरुत्तरप्रकृतीः प्रति । ते चत्वारिंशदष्टामिः कर्मक्षयविधौ स तम् ॥१२॥ पर पांच व्रतोंकी पचीस भावनाएँ होती हैं। उन्हें लक्ष्य कर पचीस उपवास करना तथा एकएक उपवासके बाद एक-एक पारणा करना, यह भावना विधि नामका व्रत है। यह पचास दिनमें पूर्ण होता है ॥११२॥ पंचविंशति कल्याण भावना विधि-पचीस कल्याण भावनाएं हैं, उन्हें लक्ष्य कर पचीस उपवास करना तथा उपवासके बाद पारणा करना यह पंचविंशति कल्याण भावना व्रत विद्वानोंके द्वारा कहा गया है ॥११३।। १. सम्यक्त्व भावना, २. विनय भावना, ३. ज्ञान भावना, ४. शील भावना, ५. सत्य भावना, ६. श्रुत भावना, ७. समिति भावना, ८. एकान्त भावना, ९. गुप्तिभावना, १०. ध्यानभावना, ११. शुक्ल ध्यान भावना, १२. संक्लेश निरोध भावना, १३. इच्छा निरोध भावना, १४. संवर भावना, १५. प्रशस्तयोग, १६. संवेग भावना, १७. करुणा भावना, १८. उद्वेग भावना, १९ भोगनिर्वेद भावना, २०. संसारनिर्वेद भावना, २१. भुक्तिवैराग्य भावना, २२. मोक्षभावना, २३. मैत्री भावना, २४. उपेक्षा भावना और २५. प्रमोद भावना, ये पचीस कल्याण भावनाएँ हैं ॥११४-११६।। दुःखहरण विधि-दुःखहरण विधिमें सर्वप्रथम विद्वानोंको सात भूमियोंकी जघन्य और उत्कृष्ट आयुकी अपेक्षा चौदह उपवास करना चाहिए ॥११७|| तदनन्तर तियंचगतिके पर्याप्तक और अपर्याप्तक जीवोंकी द्विविध आयुकी अपेक्षा चार उपवास करना चाहिए। उसके बाद मनुष्यगतिके पर्याप्तक और अपर्याप्तक जीवोंकी द्विविध आयुकी अपेक्षा चार उपवास करना चाहिए। फिर देवगतिमें ऐशान स्वर्ग तकके दो, उसके आगे अच्युत स्वर्ग तकके बाईस, फिर नौ ग्रैवेयकोंके अठारह, नौ अनुदिशोंके दो और पंचानुत्तर विमानोंके दो इस प्रकार सब मिलाकर अड़सठ उपवास करना चाहिए। इस व्रतमें दो उपवासके बाद एक पारणा होती है। इस तरह अड़सठ उपवास और चौतीस पारणा दोनोंको मिलाकर यह विधि एक सौ दो दिन में पूर्ण होती है। इस विधिके करनेसे सब दुःख दूर हो जाते हैं ।।११८-१२०॥ कर्मक्षय विधि-कर्मक्षय विधिमें नाम कमको तेरानबे प्रकृतियोंको आदि लेकर समस्त कर्मोंकी जो एक सौ अड़तालीस उत्तर प्रकृतियाँ हैं उन्हें लक्ष्य कर एक सौ अड़तालीस उपवास करना चाहिए । इसमें एक उपवासके बाद एक पारणा होती है। इस प्रकार उपवास और पारणा दोनोंको मिलाकर दो सौ छियानबे दिनमें यह व्रत पूर्ण होता है। इस व्रतके प्रभावसे कर्मोका क्षय होता है ।।१२१॥ १. प्रसुप्तयो संवेग-म. । प्रशस्तप्रयोगसंवेग ग.। २. कारणोद्वेग ग., म., क.। ३. प्रमादान्ताः ग., म.। ४. प्रशमान्ते म. । ५. प्रबुद्धयन् ? म. प्रबुद्धयः ग.। ६. परमूवं ग. । ७. नामतस्त्रिनवत्वादी-म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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