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चतुस्त्रिंशः सर्गः
४२९ अष्टाशीत्या समाहैरिह भवति विधाकालसंख्याप्यहोमि
विंशत्या त्रिरत्नातिकृतिसुकृते वर्षमेकं त्रिमास्या ॥७॥ पारणा तक आना चाहिए। फिर एक बेला एक उपवासके क्रमसे बारह बेला और बारह पारणाएं तत्पश्चात् नीचेके चार बेला और चार पारणाएं करनी चाहिए ।।७६-७७।।
द्वितीयरत्नावलीयन्त्र -
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१. विधो ग. म. । २. रत्नावली समय एको वर्षस्त्रयो मासा द्वाविंशतिदिनानि ।
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