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________________ ४१६ हरिवंशपुराणे दुमणर्षिमेकान्ते दृष्टा नत्वा स पृष्टवान् । निर्नामकस्य जन्मानि सावधिः सोऽभ्यधान्मुनिः ॥१४॥ आसीच्चित्ररथो राजा नगरे गिरिपूर्वके । कामिनी गुणिनी यस्य कान्ता कनकमालिनी ॥१५॥ मांसप्रियस्य तस्यासीत्सूदोऽमृतरसायनः । राज्ञा च मांसपाकज्ञो दशग्रामेश्वरः कृतः ॥१५॥ मांसदोषं नृपः श्रुत्वा सुधर्मास्त्रिशतैर्नृपैः । क्षिप्त्वा मेघरथे लक्ष्मीमदीक्षिष्ट मुमुक्षया ॥५२॥ नवराजेन सूदोऽपि श्रावकेन सता ततः । निर्मदीकृत्य मास्पाको ग्राममात्रातिः कृतः ॥१५३॥ सूदेन कुपितेनासौ मुनिर्मासनिषेधनः । कट्वालाम्बुविषाहारं दत्त्वा प्राणर्वियोजितः ॥१५॥ उर्जयन्तगिरी मृत्वा स्वयोगादूर्जितादभूत् । द्वात्रिंशदब्धितुल्यायुः सोऽहमिन्द्रोऽपराजिते ॥१५॥ सूपकारो मृतः प्राप पृथिवीं बालुकाप्रभाम् । त्रिसमुद्रोपमं कालं नारकं दुःखमन्वभूत् ॥५६॥ ततश्चोद्वयं पर्यटय तिर्यग्गतिमहाटवीम् । सोऽङ्गो मलयराष्ट्रान्तःपलाशग्रामवर्तिनोः ॥१५॥ कुटुम्बिनोर्जडप्रायोयक्षिलायक्षदत्तयोः । यक्षस्वावरजो नाम्ना सूनुर्यक्षलिकोऽमवत् ।।१५।। स भ्रात्रा वार्यमाणोऽपि पर्यटन शकटं शठः । उपरिष्टात्तदान्धाहेरवाहयदनिष्टकृत् ॥१५९।। मग्नमोगा भुजङ्गी तु म्रियमाणातिदुःखतः । अकामनिर्जरायोगात् मानुष्यगतिमार्जयत् ।।१६०१ मृत्वा श्वेताम्बिकापुर्यां वासवस्य महीपतेः । जाता वसुन्धरागमें देवी नन्दयशा त्वियम् ।। १६९।। होता हआ निर्नामकको लेकर राजा आदिके साथ वनमें गया ॥१४८॥ वहाँ एकान्तमें द्रुमषेण नामक मुनिराजको देखकर शंखने उनसे निर्नामकके पूर्वभव पूछे । मुनिराज अवधिज्ञानी थे अत: उसके भवान्तर इस प्रकार कहने लगे ॥१४९।। गिरिनगर नामक नगरमें राजा चित्ररथ रहता था, उसकी कनकमालिनी नामकी गुणवती एवं सुन्दरी स्त्री थी ॥१५०॥ राजा चित्ररथ मांस खानेका बड़ा प्रेमी था, उसका एक अमतरसायन नामका रसोइया था जो मांस पकाना बहत अच्छा जानता था। उसकी कलासे प्रसन्न होकर राजाने उसे दश ग्रामोंका स्वामी बना दिया था ॥१५१।। एक दिन राजाने सुधर्म नामक मुनिराजसे मांस खानेके दोष सुने जिससे प्रभावित होकर उसने राज्य-लक्ष्मीको मेघरथ नामक पुत्रके लिए सौंप दी और स्वयं मोक्ष प्राप्त करनेको इच्छासे तीन सौ राजाओंके साथ दीक्षा धारण कर लो ॥१५२॥ नवीन राजा मेघ रथ श्रावक बन गया इसलिए उसने मांस पकानेवाले रसोइयाको अपमानित कर केवल एक ग्रामका स्वामी कर दिया ॥१५३॥ इस घटनासे रसोइया बड़ा कुपित हुआ। उसने सोचा कि मेरे अपमानका कारण मांसका निषेध करनेवाले ये मुनि ही हैं इसलिए उसने कड़वी तूमड़ीका विषमय आहार देकर मुनिको प्राण रहित कर दिया ॥१५४॥ मुनिराजका समाधिमरण ऊर्जयन्तगिरिपर हुआ था। प्रबल आत्मध्यानके प्रभावसे वे मरकर अपराजित नामक अनुत्तर विमानमें बत्तीस सागरको आयुके धारक अहमिन्द्र हुए ॥१५॥ रसोइया मरकर तीसरी बालकाप्रभा पथिवीमें गया और वहां तीन सागर तक नरकके तीव्र दुःख भोगता रहा ॥१५६।। वहाँसे निकलकर तिर्यंच गतिरूपी महाअटवीमें भ्रमण करता रहा। एक बार वह मलय देशके अन्तर्गत पलाश नामक ग्राममें रहनेवाले यक्षदत्त और यक्षिला नामक दम्पतीके यक्षलिक नामका पुत्र हआ। यह यक्षलिक स्वभावसे ही मूर्ख था। और यक्षस्व नामक बड़े भाईसे छोटा था ॥१५७-१५८॥ एक बार दुष्ट यक्षलिक गाड़ीपर बैठा कहीं जा रहा था। सामने मार्गमें एक अन्धी सर्पिणी पड़ी थी। बड़े भाईके रोकनेपर अनिष्टकारी यक्षलिकने उसपर गाड़ी चढ़ा दी जिससे उसका फग कट गया। तोव दुःखसे वह मरणोन्मुख हो गयी। उसी समय अकामनिर्जराके कारण उसने मनुष्यगतिका बन्ध कर लिया ॥१५९-१६०॥ तदनन्तर सर्पिणी मरकर श्वेताम्बिका पुरीमें वहाँके राजा वासवकी स्त्री वसुन्धराके गर्भ में नन्दयशा १. उपरिष्टात्ततो ग्राहे म., ख., ग.। २. वसुन्धरीगर्भे-म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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