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________________ ३९० हरिवंशपुराणे स्वयंवरविधौ तस्याः संगताः सकलाः नृपाः । जरासन्धं पुरोधाय समुद्रविजयादयः ॥१२॥ तत्र चित्रमणिस्तम्मधारितेषु यथाक्रमम् । ते मञ्चेपु समासीना नृपा भूषितविग्रहाः ॥१३॥ वसुदेवोऽपि तत्रैव 'भ्रात्रलक्षितवेषभृत् । तस्थौ पाणविकान्तःस्थो गृहीतपणवोऽग्रणीः ॥१४॥ ततः स्वयंवरान्तभूभागं सौभाग्यभूमिका । प्रविष्टा रोहिणी कन्या रोहिणीवातिरूपिणी ॥१५॥ तदा च सर्वभूपालैर्बलितैरलमाकुलैः । सालोकि युगपन्नेत्रैरर्चयद्भिरिवाम्बुजः ॥१६॥ तद्पश्रवणाद् येषां परा प्रीतिरभूत्पुरा । सा रूपदर्शनात्तेषां महत्त्वमगमत्परम् ॥१७॥ श्रुतितूलततौ वृद्धो योऽनुरागतनूनपात् । दर्शनेन्धनदीप्तस्य तस्य वृद्धिः किमुच्यताम् ॥१८॥ शङ्खतूर्यरवस्यान्ते ततो धात्री पवित्रवाक । धृतप्रसाधनां कन्यां मान्यामाहामितो नृपान् ॥१९॥ आतपत्रमिदं यस्य चन्द्रमण्डलपाण्डुरम् । त्रिखण्डजयतो लब्धं यशः स्वमिव शोभते ॥२०॥ यस्य चाज्ञाकराः सर्वे भूचरास्तु नमश्चराः । वसुंधरेश्वरः सोऽयं जरासन्धोऽवतिष्ठते ॥२१॥ वृणीष्द रोहिणीशं तं नृपं त्वल्लाभलोभतः । रोहिणीसंगमुज्झित्वा क्षितिं चन्द्रमिवागतम् ॥२२ तस्मिन्नरागिणीं बुद्ध्वा रोहिणी साह सात्त्विका । जरासन्धसुतास्वेते वृणीष्वषु हृदि स्थितम् ॥२३॥ धात्री चेतोविदूचे तां मथुरानाथमग्रतः । उग्रसेननृपं पश्य रोचते यदि ते सुते ॥२४॥ पुत्री सचमुच ही रोहिणी ताराके समान कीर्तिमती थी ॥११॥ रोहिणीके स्वयंवरमें जरासन्धको आगे कर समुद्रविजय आदि समस्त राजा आये ॥१२।। शोभित शरीरको धारण करनेवाले राजा लोग स्वयंवर मण्डपमें नाना प्रकारके मणिमयो खम्भोंसे सुशोभित मंचोंपर यथाक्रम बैठ गये ।।१३।। भाइयोंकी पहचानमें न आ सके ऐसे वेषको धारण करनेवाले कुमार वसुदेव भी स्वयंवरमें गये और पणव नामक बाजा बजानेवालोंके पास जाकर बैठ गये। उस समय कुमार अपने हाथमें पणव नामक बाजा लिये हए थे और उसके बजानेवालों में सबसे अग्रणी जान पड़ते थे ॥१४॥ तदनन्तर सौभाग्यकी भूमि और रोहिणी-ताराके समान अतिशय रूपवतो रोहिणी कन्याने स्वयंवरके भीतर प्रवेश किया ॥१५॥ उस समय समस्त राजाओंने मुड़-मुड़कर, आकुलतासे युक्त नेत्रों द्वारा एक साथ उसका अवलोकन किया। उस समय उसकी ओर देखनेवाले राजा ऐसे जान पड़ते थे मानो नेत्ररूपी कमलोंसे उसको पूजा हो कर रहे हों ॥१६॥ जिन राजाओंको पहले उसका रूप सुनकर परम प्रीति उत्पन्न हुई थी अब उसका रूप देखकर उन राजाओंको वह परम प्रीति और भी अधिक महत्त्वको प्राप्त हो गयो ||१७|| सो ठीक ही है क्योंकि जो अनुरागरूपी अग्नि श्रवणरूपो रूईको सन्ततिमें लगकर धीरे-धीरे सुलग रही थी वह यदि दर्शनरूपी इंधनको पाकर एकदम प्रज्वलित हो उठे तो उसकी वृद्धिका क्या कहना है ? ||१८|| तदनन्तर जब शंख और तुरही आदि वादित्रोंका शब्द शान्त हुआ तब पवित्र वचन बोलनेवाली धाय, अलंकारोंको धारण करनेवाली माननीय कन्याको राजाओंके सम्मुख ले जाकर कहने लगी॥१९|| कि हे पुत्रि ! जिसका यह चन्द्र-मण्डलके समान सफेद छत्र, तीन खण्डोंकी विजयसे प्राप्त यशरूपी धनके समान सुशोभित हो रहा है और समस्त भूमिगोचरी तथा विद्याधर राजा जिसके आज्ञाकारी हैं ऐसा यह वसुधाका स्वामी राजा जरासन्ध बैठा है ।।२०-२१॥ हे रोहिणी ! तुझे पानेके लोभसे रोहिणीका समागम छोड़कर पृथिवीपर आये हुए चन्द्रमाके समान जान पड़ता है ऐसे इस राजा जरासन्धको त स्वीकृत कर ॥२२॥ सत्त्वगणको धारण करनेवाली धायने जब देखा अनुराग जरासन्धमें नहीं है तब उसने आगे बढ़कर कहा कि ये जरासन्धके पुत्र हैं। इनमें से जो तुझे पसन्द हो उसे वर ॥२३॥ उनमें भी जब अनुराग नहीं देखा तब चित्तको जाननेवाली धायने आगे १. भ्रातृभिरलक्षितं वषं बिभर्तीति भ्रात्रलक्षितवेषभृत् । २. तनो म.। श्रुतिकुलतनो ग.। ३. रोहिणी शान्तम् म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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