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________________ त्रिंशः सर्गः अथ 'कार्तिकराकायां चिरक्रीडातिखेदकः । प्रियङ्गसुन्दरीगाढभुजबन्धवशः प्रियः ॥१॥ सुखनिद्राप्रसुप्तोऽसौ विबुद्धश्च कुतश्चन । अद्राक्षीद रूपिणीमेकां कन्यामन्यामिव श्रियम् ॥२॥ अप्राक्षीत् पुण्डरीकाक्षि ! का स्वमत्रेत्यसौ हि सा । ज्ञास्यसे हि कुमारेति तमाहय विनिर्ययौ ॥३॥ व्यपनीय प्रियाश्लेषमेषोऽनुपदवीमयात् । रम्यहचूतलासीना हेतुं साह निजागमे ॥४॥ आर्यपुत्र ! शृणु श्रीमन् समाधाय निजं मनः । वचो मदीयमप्राप्यवस्तुप्रापणकारणम् ॥५॥ इहास्ति दक्षिणश्रेण्या देशे गान्धारनामनि । पुरं गन्धसमृद्धाख्यं गन्धाराख्यस्तु तत्पतिः ॥६॥ पृथिवीति महादेवी पृथिवीवास्य वल्लभा । सुता प्रमावती तस्य श्रीरिवाहं प्रभावती ॥७॥ गता मानसवेगस्य स्वर्णनाभपुरं परम् । ज्ञात्वाङ्गारवती वार्ता दुहितुः पृष्टवस्यहम् ॥८॥ प्रवृत्तिवेगवत्यास्तु तरसखीभिर्ममोदिता। संगमो यदुचन्द्रेण चित्राया इव च त्वया ॥९॥ तत्रैव नगरे या सा शुद्धशीलविभूषणा । त्वन्नामग्रहणाहारा सोमश्रारवतिष्टते ॥१०॥ त्वद्वियोगमहादुःखपाण्डुगण्डालकान्तया । कान्तया प्रहिता तेऽहं संदेशप्रापिणो तया ॥११॥ शीलप्राकाररक्षाहमलच्यानुनयैररेः । आर्यपुत्रावतिष्ठेयं शत्रुस्थाने कियचिरम् ॥१२॥ - अथानन्तर कार्तिककी पूर्णिमाके दिन चिरकाल तक क्रीड़ा करनेसे अतिशय खिन्न कुमार वसुदेव प्रियंगुसुन्दरीमें प्रगाढ़ भुजबन्धनसे बँधे सुखकी नींद सो रहे थे कि किसी कारण जाग पड़े। जागते ही उन्होंने सामने खड़ी द्वितीय लक्ष्मीके समान अतिशय रूपवती एक कन्या देखी ॥१-२॥ कुमारने उससे पूछा कि हे कमललोचने ! यहाँ तुम कौन हो ? उत्तरमें कन्याने कहा कि हे कुमार ! थोड़ी देर बाद मेरा सब वृत्तान्त जान लोगे। अभी मेरे साथ आइए-इस प्रकार कुमारको बुलाकर वह कन्या बाहर चली गयी ॥३॥ कुमार भी प्रियाका आलिंगन दूरकर उसके पीछे-पीछे चल दिये । बाहर जाकर वह सुन्दर महलके फर्सपर बैठ गयी और अपने आनेका कारण इस प्रकार कहने लगी ।।४।। हे आर्यपुत्र ! हे श्रीमन् ! अपना मन स्थिरकर अप्राप्य वस्तुकी प्राप्तिमें कारणभूत मेरे वचन सुनिए ।।५।। इस विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीके गान्धार देशमें एक गन्धसमृद्ध नामका नगर है उसका स्वामी राजा गन्धार है ॥६॥ • उसकी पृथिवी नामकी स्त्री है जो उसे पृथिवीके ही समान प्यारी है। मैं उन दोनोंकी साक्षात् लक्ष्मीके समान कान्तिमती प्रभावती नामकी पुत्री हूँ ॥७॥ मैं एक दिन मानसवेगके स्वर्णनाभ नामक उत्तम नगरको गयी थी। वहां मैंने मानसवेगकी माता अंगारवतीको जानकर उससे उसकी पुत्री वेगवतीका वृत्तान्त पूछा ॥८॥ वेगवतीकी सखियोंने मुझे उसका समाचार बताया और साथ ही यह भी बताया कि जिस प्रकार चन्द्रमाके साथ चित्रा नक्षत्रका संगम होता है उसी तरह आपके साथ उसका संगम हुआ है ।।९।। उसी नगरमें शुद्ध शील ही जिसका आभूषण है तथा आपका नाम ग्रहण करना ही जिसका आहार है ऐसी सोमश्री भी रहती है ।।१०।। जिसकी अलकावलीके छोर आपके वियोगजन्य महा दुःखसे सफेद-सफेद दिखनेवाले गालोंपर लटक रहे हैं ऐसी आपकी उस सोमश्री प्रियाने मुझे सन्देश लेकर आपके पास भेजा है ॥११।। उसने कहलाया है कि हे आर्यपुत्र ! यद्यपि मैं शत्रुको अनुनयविनयके द्वारा अलंघनीय शीलरूपी प्राकारके अन्दर सुरक्षित हूँ तथापि इस तरह मुझे यहाँ १. कार्तिकपूर्णिमायाम् । २. श्रीमान् म.। ३. ज्ञात्वाङ्गारवती म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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