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________________ सप्तविंशः सर्गः मृत्वा मृगायणो राज्ञः साकेतेऽतिबलस्य सः । हिता हिरण्यवत्येषा श्रीमत्याश्च सुताभवत् ॥६३॥ मधुरा त्वं रामदत्ताभः पूर्णचन्द्रस्तु वारुणी । वणिक्सुमित्रदत्तोऽहं सिंहचन्द्रस्तवात्मजः ॥ ६४॥ 'दष्टः श्रीमतिपूर्वेण भुजगेन पिता गजः । संजातो ग्राहितो धर्म मया स मदवारणः ॥ ६५ ॥ दुर्भुजङ्गचरी मृखा चमरी चमरातुरा । रौद्रः कुक्कुटसर्पोऽभूद् रुक्षपक्षपरिग्रहः ॥ ६६ ॥ सोपवासव्रतश्रान्तः स विश्रान्तमदः करी । ग्रस्तः कुक्कुटसर्पेण सहस्रारमगात्सुधीः ॥ ६७ ॥ विमाने श्रीप्रभे तत्र श्रीधरः श्रीधरोऽमरः । अप्सरोभिरमा भोगी धर्मेण रमतेऽधुना ॥ ६८ ॥ क्रोधाद् धम्मिल्लपूर्वेण मर्कटेन हतस्तदा । पापः कुक्कुटसर्पोऽगात्पृथिवीं बालुकाप्रभाम् ॥ ६९॥ म्लेच्छः शृगालदत्तस्तद्दन्तिदन्तास्थिमौक्तिकम् । दत्तवान् धनमित्राय पूर्णचन्द्राय वाणिजः ॥७०॥ दन्तास्थिभिरयं तुष्टः कारयित्वा नृपासनम् । हारभारं तु मुक्ताभिरथास्ते तद्विभर्त्ति तम् ॥७१॥ अहो संसारवैचित्र्यं देहिनामिह मोहिनाम् । पितुरङ्गानि जायन्ते भोगाङ्गानि पराङ्गवत् ॥७२॥ निशम्य शमिनो वाक्यं रामदत्ता प्रमादिनम् । तदशेषमुदाहृस्य पूर्णचन्द्रमबोधयत् ॥७३॥ दानपूजा तपः शीलसम्यक्त्वमनुपालय सः । कल्पे तस्मिन् विमानेऽभूद्वैडूर्यप्रभनामनि ॥ ७४ ॥ रामदत्ताऽपि सम्यक्त्वास्त्रेणमुत्सृज्य तत्र तु । प्रभंकरविमानेऽभूद्देवः सूर्यप्रभाभिः ॥ ७५ ॥ सिंह चन्द्रमुनिः सम्यगाराधितचतुष्टयः । ग्रैवेयकेऽहमिन्द्रोऽभूत्स प्रीतिकरसंज्ञके ॥ ७६ ॥ थी || ६२ ॥ मृगायण मरकर साकेत नगर में राजा अतिबल और उसकी रानी श्रीमतीके तुम्हारी माँ हिरण्यवती हुआ है ||६३ || उसकी मधुरा ब्राह्मणी तू रामदत्ता हुई है, वारुणीका जीव तेरा छोटा पुत्र पूर्णचन्द्र हुआ है, और वणिक् सुमित्रदत्तका जीव में तेरा सिचन्द्र नामका पुत्र हुआ हूँ ||६४॥ पिता सिंहसेनको श्रीभूतिके जीव अगन्धन सपने डँस लिया था इसलिए मरकर वे हाथी हुए थे। मैंने उन्हें हाथी की पर्याय में श्रावकका धर्मं धारण कराया था ||६५ || श्रीभूति पुरोहितका जीव साँप हुआ था फिर चमरी मृग हुआ। तदनन्तर चमरमृगके लिए आतुर होता हुआ मरकर रूखे पंखों को धारण करनेवाला दुष्ट कुक्कुट सर्प हुआ || ६६ || पिताका जीव जो हाथी हुआ था वह उपवासका व्रत लेकर शिथिल पड़ा हुआ था और उसका सब मद सूख गया था उसी दशा में पुरोहितके जीव कुक्कुट सर्पने उसे डँस लिया जिससे वह अच्छे परिणामोंसे मरकर सहस्रार स्वर्ग गया || ६७॥ वह वहाँ श्रीप्रभ नामक विमानमें लक्ष्मीको धारण करनेवाला श्रीधर नामका देव हुआ है और इस समय धर्मके प्रभावसे भोगोंसे युक्त हो अप्सराओंके साथ रमण कर रहा है || ६८|| धम्मिल्लका जीव जो मर्कट हुआ था उसने हाथीका घात करनेवाले कुक्कुट सर्पको क्रोधवश मार डाला जिससे वह मरकर बालुकाप्रभा नामक तीसरे नरक में गया || ६९ || किसी श्रृंगालदत्त नामक भीलने उस हाथी दांत, हड्डी और मोती इकट्ठे कर धनमित्र सेठके लिए दिये और धनमित्रने राजा पूर्णचन्द्र के लिए समर्पित किये ॥ ७० ॥ राजा पूर्णचन्द्र उन्हें पाकर बहुत सन्तुष्ट हुआ । उसने दाँतों की हड्डियोंसे सिंहासन बनवाया है और मोतियोंसे बड़ा हार तैयार करवाया है। इस समय वह उसी सिंहासनपर बैठता है और उसी हारको धारण करता है || ७१ || अहो ! मोही प्राणियोंकी संसारकी विचित्रता तो देखो कि जहाँ अन्य प्राणियोंके अंगके समान पिताके अंग भी भोगके साधन हो जाते हैं || ७२ || मुनिराज सिंहचन्द्रके वचन सुनकर आर्यिका रामदत्ताने जाकर प्रमादमें डूबे पूर्णचन्द्रको वह सब बताकर अच्छी तरह समझाया ||७३ || जिससे वह दान, पूजा, तप, शील और सम्यक्त्वका अच्छी तरह पालन कर उसी सहस्रार स्वर्गके वैडूर्यप्रभ नामक विमानमें देव हुआ ||७४ || रामदत्ता भी सम्यग्दर्शन के प्रभावसे स्त्री पर्यायको छोड़कर उसी सहस्रार स्वर्गके प्रभंकर नामक विमान में सूर्यप्रभ नामका देव हुई || ७५ || और सिंहचन्द्र मुनि भी अच्छी तरह चार १. दृष्टः म. । २. लक्ष्मीधरः । ३ एतन्नामधेयः । ४. वाच्य म. । Jain Education International ३६७ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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