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________________ ३४६ हरिवंशपुराणे तत्पुराधिपतिं युद्धे स जिस्वा कपिलश्रुतिम् । उवाह विधिना वीरस्तरकन्या कपिलामिधाम् ॥२६॥ तस्यामजनयत्पुत्रं प्रसिद्धं कपिलाख्यया । प्रीतिं श्वसुरपुत्रेण प्राप्तश्चांशुमता पराम् ॥२०॥ वारिबन्धेऽन्यदा गन्धगजेन' हियमाणकः । दृढमुष्टिर्जघानेभं नीलकण्ठः शुचाभवत् ॥२०॥ पतितश्च शनैः शौरिस्तडागाम्मस्यनाकुलः । अटव्याश्च विनिष्क्रम्य गतः शालगुहां पुरीम् ॥२९॥ तत्र पद्मावती लेभे धनुर्वेदोपदेशतः । जित्वा जयपुरेशं च तत्सुतामपि लब्धवान् ॥३०॥ साकमंशुमता यातो मद्रिलाख्यपुरं परम् । पौण्ड्रश्च नृपतिस्तत्र दुहिता चारुहासिनी ॥३१॥ दिव्यौषधिप्रभावेन सा युववेषधारिणी। तेन विज्ञातवृत्तान्ता परिणीतातिहारिणी ॥३२॥ पुत्रं पात्रं श्रियां तस्यां स पौण्डमुदपादयत् । निशि हंसापदेशेन हृतश्चाङ्गारकारिणा ॥३३॥ विसृष्टश्चापि गङ्गायां पपात वियतः शनैः । अपश्यत्पुरं प्रातरिलावर्धनसंज्ञकम् ॥३४॥ तत्रापणे निविष्टोऽसौ वणिग्दत्तचरासने । आपणः क्षणमात्रेण पूर्यते स्म धनैश्च सः ॥३५॥ तत्प्रभावमसौ बुद्ध्वा वणिग्नीत्वा स्वमन्दिरम् । ददौ रत्नवतीं यूने कन्या धन्याय संपदा ॥३॥ भुञ्जानः स तया दिव्यान् भोगानन्तरवर्जितान् । यातः शक्रमहं द्रष्टुमेकदा तु महापुरम् ॥३॥ पुरो बहिरसी दृष्ट प्रासादान् विपुलान् बहुन् । पृष्टवानिति केनामी किमर्थ वा निवेशिताः ॥३८॥ पहुंचे ॥२५।। वीर वसुदेवने वेदसामपुरके राजा कपिलमुनिको युद्धमें जीतकर उसको कपिला नामक पुत्रीके साथ विधि-पूर्वक विवाह किया ।।२६।। वहाँ कपिलाके भाई अंशुमान नामक साले के साथ वसुदेव परम प्रीतिको प्राप्त हुए जिससे वहाँ रहकर उन्होंने कपिलाके कपिल नामक पुत्र उत्पन्न किया ।।२७।। एक दिन जिस नीलकण्ठने पहले नीलयशाका अपहरण किया था वह गन्धहस्तीका रूप धरकर वेदसामपुरमें आया। उसे बन्धनमें डालनेके लिए जब वसुदेव उसपर आरूढ़ हुए तो उन्हें वह हरकर आकाशमें ले गया। यह देख वसुदेवने उसे मट्रियोंके दढ प्रहारसे खब पीटा जिससे शोकवश वह गन्धहस्तीका रूप छोड़कर नोलकण्ठ हो गया ॥२८॥ वसुदेव धीरे-धीरे तालाबके जलमें गिरे और बिना किसी आकुलताके अटवीसे निकलकर शालगुहा नामक नगरीमें पहुँच गये ||२९|| वहाँ धनुर्वेदके उपदेशसे उन्होंने पद्मावती नामकी कन्या प्राप्त को। वहांसे चलकर जयपुर गये और वहाँके राजाको जीतकर उसकी कन्या भी प्राप्त की ॥३०॥ वहांसे चलकर वे अपने साले अंशुमान्के साथ भद्रिलपुर नामक श्रेष्ठ नगर गये । वहाँ उस समय पौण्ड्र नामका राजा राज्य करता था। उसकी चारुहासिनी नामकी एक कन्या थी, वह कन्या दिव्य ओषधिके प्रभावसे सदा युवाका वेष धारण करती थी। वसुदेवको इसका पता लग गया इसलिए उन्होंने उस अतिशय सुन्दरी कन्याके साथ विवाह कर लिया ।।३१-३२।। तथा कुछ समय बाद उस कन्यामें उन्होंने लक्ष्मीका पात्र एक पौण्ड्र नामका पुत्र उत्पन्न किया। एक दिन वसुदेव रात्रिके समय शयन कर रहे थे कि उनका वैरी अंगारक उन्हें हंसका रूप धरकर हर ले गया ॥३३|| जब उससे छूटे तो धीरे-धीरे आकाशसे गंगा नदीमें गिरे। उसे पार कर जब किनारेपर आये तो सवेरा होते ही उन्होंने इलावधन नामका नगर देखा ॥३४॥ वहां वे एक दुकानमें सेठके द्वारा दिये हुए उत्तम आसनपर बैठ गये। उनके बैठते ही क्षणमात्रमें वह दुकान धनसे भर गयी ॥३५।। इसको सेठ, वसुदेवका ही प्रभाव जानकर उन्हें अपने घर ले गया तथा वहाँ ले जाकर उसने भाग्यशाली तरुण वसुदेवके लिए अपनी रत्नवती कन्या प्रदान की ॥३६|| वसुदेव रत्नवतीके साथ निरन्तराय दिव्य भोगोंको भोगते हुए वहीं रहने लगे। तदनन्तर वे एक समय इन्द्रध्वज विधान देखनेके लिए महापुर नगर गये ॥३७।। वहां उन्होंने नगरके बाहर बहुत-से बड़े-बड़े महल देखकर किसी मनुष्यसे पूछा कि ये महल किसने किस लिए बनवाये हैं ? ॥३८॥ मनुष्यने कहा कि राजा सोमदत्तने अपनी १. गन्धगजेन्द्रह्रियमाणकः घ. । २. स चाभवत् म. । ३. तत्रता- म. । ४. युवन्वेष- म., क., ग., घ., ङ. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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