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________________ ३३२ हरिवंशपुराणे प्राप्तः शरदृतुर्दृप्तः शरपुङ्खकरस्ततः । गुञ्जम॒ाज्यया सजः प्राज्यबाणासनश्रिया ॥१३॥ काले विद्याधरास्तत्र स्वविधौषधिसिद्धथे। निगृहोतमनोवेगा मनोवेगा विनिर्ययुः ॥१४॥ तदा तौ दम्पती शैलं ह्रीमन्तं हामवर्षिणौ । प्रयातौ विद्ययाश्लिष्टौ घनं विद्युद्घनौ यथा ॥१५।। 'असपत्नसपत्नीकतापसस्त्राधसम् । असिधारावतं तीन चरन्तमिव संततम् ।।१६।। मधुपानमदोन्मत्तपतत्रिमधुपारवः । विध्यतो मदनस्येव स शरज्यारवैर्युतः ॥१७॥ अवतीणी तमुद्गन्धिसप्तपर्णावतंसकम् । हारिणं वर्णयन्तौ तौ मरुघृणितभूरुहम् ॥१८॥ परिभ्रम्य चिरं शोभां पश्यन्तौ तृप्तिवर्जितौ। गिरेः सानुषु रम्येषु रम्येते स्म सस्मरौ ।।१९।। तयोः संभोगसंमारः पुष्पपल्लवकल्पिते । तल्पेऽनल्पोऽपि खेदाय समजायत नो तदा ॥२०॥ चिरेण रतिसंभोगसंभूतस्वेदभूषितौ । निष्क्रान्तौ कदलोगेहात् तौ रक्तान्तविलोचनौ ॥२१॥ मुक्तककारवं तत्र चित्रगात्रमपश्यताम् । कलापिनमकस्मात्ती मयूरं मत्तलोचनम् ॥२२॥ शोभया'हृतचित्तं तमुत्कादिरसुः सकौतुका । स्कन्धमारोप्य तेनासी नीता नीलयशा नमः ।।२३।। नीचेन नीलकण्ठेन नीलकण्ठवपु ता । हृतायां विह्वलो वध्वां वसुदेवोऽभ्रमद्वने ॥२४॥ पाङ्गस्वनैहंद्या-सफेद-सफेद कटाक्षों और मधुर वाणीसे मनोहर होती है उसी प्रकार वर्षाऋतु भी शुक्लापाङ्गस्वनैहृद्या-मयूरोंकी वाणीसे मनोहर थी॥१२॥ वर्षा के बाद, जो बाणोंको मूठको हाथमें धारण कर रहा था तथा गुंजार करते हुए भ्रमररूपी डोरीसे युक्त उत्तम बाणासन जाति के वृक्षरूपी बाणासन-धनुषकी शोभासे युक्त था ऐसे अहंकारी सुभटके समान शरद् ऋतु आयो ।।१३।। उस समय मनके समान तीव्र वेगको धारण करनेवाले विद्याधर अपनी-अपनी विद्याओं और ओषधियोंकी सिद्धिके लिए मनके वेगको नियन्त्रित कर बाहर निकले ||१४|| उस समय इच्छानुसार कामभोग वाले एवं विद्याके द्वारा अत्यन्त आलिगित दोनों दम्पती--कुमार वसूदेव और नीलयशा भी ह्रीमन्त पर्वतकी ओर गये। उस समय वे ऐसे जान पड़ते थे मानो परस्परमें गाढ़ आलिंगनको प्राप्त एवं इच्छानुसार वर्षा करते हुए बिजली और मेघ ही पर्वतकी ओर जा रहे हों ॥१५।। उस पर्वतका मध्य भाग वैरिरहित सपत्नीक तपस्वियोंकी स्त्रियोंको धारण करता था इसलिए ऐसा जान पडता था मानो निरन्तर अतिशय कठिन असिधारावतका ही आचरण कर रहा हो ॥१६|| वह पवंत जगह-जगह मधुपानके मदसे उन्मत्त पक्षियों और भ्रमरोंके शब्दसे युक्त था इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो कामीजनोंकों वेधनेवाले कामदेवके बाण और प्रत्यंचाके शब्दोंसे ही युक्त हो ॥१७|| उत्कट सुगन्धिसे युक्त सप्तपर्णवन जिसकी शोभा बढ़ा रहा था, जो स्वयं सुन्दर था तथा वायुसे जिसके वृक्ष हिल रहे थे ऐसे ह्रीमन्त पर्वतपर उतरकर वे दोनों उसकी प्रशंसा करने लगे। चिरकाल तक इधर-उधर भ्रमण कर शोभाको देखते हुए वे तृप्त ही नहीं होते थे अतः कामाकुलित होकर दोनोंने पर्वतके सुन्दर शिखरोपर बार-बार रमण किया था ॥१८-१९|| उन्होंने पुष्प और पतोंसे निर्मित शय्यापर अत्यधिक सम्भोग किया था फिर भी वह उस समय उनके खेदके लिए नहीं हुआ था ।।२०।। जो रतिक्रीड़ासे उत्पन्न पसीनासे सुशोभित थे तथा जिनके नेत्रोंके कोण लाल-लाल हो रहे थे ऐसे वे दोनों चिरकाल बाद कदली गृहसे बाहर निकले ॥२१।। बाहर निकलते ही उन्होंने एक ऐसा मयूर देखा जो केका वाणी छोड़ रहा था, चित्र-विचित्र शरीरसे युक्त था, शिखण्डोंसे सहित था और जिसके नेत्र अत्यन्त मत्त थे ।॥२२॥ शोभासे चित्तको हरण करनेवाले उस मयूरको देखकर जो अत्यन्त उत्कण्ठित थो तथा कौतुकवश जो उसे पकड़ लेना चाहती थी ऐसी नीलयशाको कन्धेपर बैठाकर वह मयूर आकाशमें ले गया ||२३|| यथार्थमें वह मयूर नहीं था किन्तु मयूरका १. असमत्ना ये सपत्नीकतापसास्तेषां स्त्रिय इति असपत्नसपत्नीकतापसस्त्रियस्तासां धरमुरो वक्षो यस्य पर्वतस्य स तम् । २. मनोहरम् । ३. हृतचित्ता तां म. । ४. मयुराकारधारिणा । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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