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________________ द्वाविंशतितमः सर्गः कायोत्सर्गविधानेन शोधितेर्यापथौ पथि । जैनेऽतिनिपुणौ क्षोण्यां निषेण्णौ पुनरुत्थितौ ॥२५॥ पुण्यपञ्चनमस्कारपदपाठपवित्रितौ । चतुरुत्तममाङ्गल्यशरणप्रतिपादिनी ॥ २६ ॥ वर्धतृतीयेषु सप्ततिशतात्मके । धर्मक्षेत्रे त्रिकालेभ्यो जिनादिभ्यो नमोऽस्त्विति ॥२७॥ सामायिकं करोमीति सर्व सावद्ययोगकम् । संप्रत्याख्यामि कार्य च तावदित्युज्झिताङ्गकौ ॥२८॥ शत्रौ मित्रे सुखे दुःखे जोविते मरणेऽपि वा । समतालाभलाभे मे तावदित्यन्तराशयौ ॥ २९ ॥ सप्तप्राणप्रमाणं तु स्थित्वा कृत्वा शिरोऽञ्जलिम् । इत्युदाहरतां श्रव्यं तौ चतुर्विंशतिस्तवम् ॥१०॥ ऋषभाय नमस्तुभ्यमजिताय नमो नमः । शम्भवाय नमः शश्वदभिनन्दन ! ते नमः ॥३१॥ नमः सुमतिनाथाय नमः पद्मप्रभाय ते । नमः सुपार्श्व विश्वेशे नमश्चन्द्रप्रमार्हते ॥३२॥ नमस्ते पुष्पदन्ताय नमः शीतलतायिने । नमोऽस्तु श्रेयसे श्रीशे श्रेयसे श्रितदेहिनाम् ॥३३॥ नमोऽस्तु वासुपूज्याय सुपूज्याय जगत्त्रये । वर्तते यस्य चम्पायां निःकम्पोऽयं महामहः ॥३४॥ विमलाय नमो नित्यमनन्ताय नमो नमः । नमो धर्मजिनेन्द्राय शान्तये शान्तये नमः ॥३५॥ कुन्थुनाथाय तथाराय नमस्त्रिधा । मल्लये शल्यमल्लाय मुनिसुव्रत ! ते नमः ॥३६॥ जिनेन्द्र प्रदर्शित मार्ग में अतिशय निपुणता रखनेवाले दोनों, नमस्कार करनेके लिए जमीनपर पड़ गये, फिर उठकर खड़े हुए। पंच नमस्कार मन्त्र के पाठसे अपने-आपको उन्होंने पवित्र किया, अरहन्त, सिद्ध, साधु और केवलिप्रज्ञप्त धर्म ये चार ही संसार में उत्तम पदार्थ हैं, चार ही मंगल हैं और इन चारोंकी शरण में हम जाते हैं इस प्रकार उच्चारण किया । 'अढ़ाई द्वीपके एक सौ सत्तर धर्मक्षेत्रों में जो तीर्थंकर आदि पहले थे, वर्तमान में हैं और आगे होंगे उन सबके लिए हमारा नमस्कार हो' यह कहकर उन्होंने निम्नांकित नियम ग्रहण किया कि हम जबतक सामायिक करते हैं तबतक के लिए समस्त सावद्य योग और शरीरका त्याग करते हैं - यह नियम लेकर उन्होंने शरीरसे ममत्व छोड़ दिया और शत्रु-मित्र, सुख-दुःख, जीवन-मरण तथा लाभ-अलाभमें मेरे समता भाव हो ऐसा मनमें विचार किया । तदनन्तर सात श्वासोच्छ्वास प्रमाण खड़े रहकर उन्होंने शिरोनति की और उसके बाद चौबीस तीर्थंकरोंके सुन्दर स्तोत्रका उच्चारण किया || २४-३० || चौबीस तीर्थंकरोंका स्तोत्र इस प्रकार था - ३२१ हे ऋषभदेव ! तुम्हें नमस्कार हो, हे अजितनाथ ! तुम्हें नमस्कार हो, हे शम्भवनाथ ! तुम्हें निरन्तर नमस्कार हो, हे अभिनन्दन नाथ ! तुम्हें नमस्कार हो ||३१|| हे सुमतिनाथ ! तुम्हें नमस्कार हो, हे पद्मप्रभ ! तुम्हें नमस्कार हो, हे जगत् के स्वामी सुपार्श्वनाथ ! तुम्हें नमस्कार हो, हे चन्द्रप्रभ जिनेन्द्र ! तुम्हें नमस्कार हो ||३२|| हे पुष्पदन्त ! तुम्हें नमस्कार हो, हे शीतलनाथ ! आप रक्षा करनेवाले हैं अतः आपको नमस्कार हो, हे श्रेयांसनाथ ! आप अनन्त चतुष्ट्यरूप लक्ष्मीके. स्वामी हैं तथा आश्रित प्राणियोंका कल्याण करनेवाले हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ॥ ३३ ॥ जिनका चम्पापुरीमें यह अचल महोत्सव मनाया जा रहा है तथा जो तीनों जगत् में पूज्य हैं ऐसे वासुपूज्य भगवान् के लिए नमस्कार हो ||३४|| हे विमलनाथ ! आपको नमस्कार हो, हे अनन्तनाथ ! आपको नमस्कार हो, हे धर्मंजिनेन्द्र ! आपको नमस्कार हो, हे शान्तिके करनेवाले शान्तिनाथ ! आपको नमस्कार हो ||३५|| हे कुन्थुनाथ ! आपको नमस्कार हो, हे अरनाथ ! आपको नमस्कार हो, हे मल्लिनाथ ! आप शल्यों को नष्ट करनेके लिए मल्लके समान हैं अतः १. निष्पन्नो म. ग. । २. 'चत्तारि मंगलं – अरहन्ता मंगलं सिद्धा मंगलं साहू मंगलं केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं । चत्तारि लोगुत्तमा — अरहन्ता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा । चत्तारि सरणं पवज्जामि अरहन्ते सरणं पवज्जामि, सिद्धे सरणं पवज्जामि, साहू सरणं पवज्जामि, केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पवज्जामि । ३. विश्वस्य ईट् विश्वेट् तस्मै । ४. श्रिया ईट् श्रीट् तस्मै । ४१ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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