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________________ एकविंशतितमः सर्गः राज्ये संस्थाप्य मां प्राज्ये सम्यग्दर्शनभावितम् । गुरोहिरण्यकुम्भस्य समीपे प्रावजत् पिता ॥११९॥ भार्या विजयसेना मे नाम्नान्यासीन्मनोरमा । ख्याता गान्धर्वसेनाख्या प्रथमायामभूत्सुता ॥१२०॥ इतरस्यामभूत्पुत्रो ज्येष्टो सिंहयशःश्रुतिः। वाराहग्रीवनामान्यो विनयादिगुणाकरः ॥१२१॥ राज्ये तो यौवराज्ये च स्थापयित्वा यथाक्रमम् । 'गुरोरेव गुरोरन्ते प्रव्रज्यां श्रितवानहम् ॥१२॥ कम्भकण्टकनामायं ढेपः सागरवेष्टितः । गिरिः कर्कोटकश्चात्र चारुदत्तागतः कथम् ॥१२३॥ इत्युक्ते यतिनाद्यन्तां सुखदुःखविमिश्रिताम् । कथंकथमहं तस्मै कथामकथयन्निजाम् ॥१२४|| तदा विद्याधरौ द्वौ तं मुनि पुत्रौ नमस्तलात् । अवतीर्य ववन्दाते वन्दनीयमनिन्दिती ॥२५॥ कुमारी! चारुदत्तोऽयं भ्राता यो वा मयोदितः । इत्युक्ते मां परिष्वज्य स्थितानुक्त्वा बहुप्रियम् ॥१२६॥ तावच्च द्वौ विमानायादवतीर्य सुरौ पुरा। मां प्रणम्य मुनि पश्चान्नवासीनी ममाग्रतः ॥१२७॥ अक्रमस्य तदा हेतुं खेचरौ पर्चपृच्छताम् । देवावृषिमतिक्रम्य प्राग्नतौ श्रावकं कुतः ॥ १२८॥ त्रिदशावूचतुहें तुं जिनधर्मोपदेशकः । चारुदत्तो गुरुः साक्षादावयोरिति बुध्यताम् ॥१२९।। तत्कथं कथमित्युक्त छाग पूर्वः सुरोऽमणीत् । श्रयतां मे कथा तावत् कथ्यते खेचरी! स्फुटम् ॥१३॥ वाराणस्यां पुरागार्थवेदव्याकरणार्थवित् । ब्राह्मण: सोमशर्मासीत्सोमिला तस्य माहना ॥१३१॥ तयोर्दुहितरौ भद्रा सुलसा च सुयौवने । वेदव्याकरणादीनां शास्त्राणां पारगे परे ॥१३२।। जिसे छड़ाया था ||११८|| उस घटनाने मेरे हृदयमें सम्यग्दर्शनका भाव भर दिया था। कुछ समय बाद हमारे पिताने विशाल राज्यपर मुझे बैठाकर हिरण्यकुम्भ नामक गुरुके पास दीक्षा ले ली ॥११९।। मेरी विजयसेना और मनोरमा नामकी दो स्त्रियां थीं उनमें पहली विजयसेनाके गान्धर्वसेना नामकी पुत्री हुई और दूसरी मनोरमाके सिंहयश नामका बड़ा और वाराहग्रीव नामका छोटा इस प्रकार दो पुत्र हुए। ये दोनों ही पुत्र विनय आदि गुणोंकी खान थे ।।१२०-१२१|| एक दिन मैंने क्रमसे बड़े पुत्रको राज्यपर और छोटे पुत्रको युवराज पदपर आरूढ़ कर अपने पितारूप गुरुके समीप ही दीक्षा धारण कर ली ।।१२२।। हे चारुदत्त ! यह समुद्रसे घिरा हुआ कुम्भकण्टक नामका द्वीप है और यह कर्कोटक नामका पर्वत है यहाँ तुम कैसे आये ? ॥१२३।। मुनिराज के ऐसा कहनेपर मैंने आदिसे लेकर अन्त तक सुख-दुःखसे मिली हुई अपनी समस्त कथा जिस-किसी तरह उनके लिए कह सुनायो ॥१२४।। उसी समय मुनिराजके दोनों उत्तम विद्याधर पुत्रोंने आकाशसे नीचे उतरकर उन वन्दनीय मुनिराजको वन्दना को-उन्हें नमस्कार किया ॥१२५।। मुनिराजने दोनों पुत्रोंको सम्बोधते हुए कहा कि हे कुंमारो ! जिसका पहले मैंने कथन किया था यह वही तुम्हारा भाई चारुदत्त है। मुनिराजके ऐसा कहनेपर दोनों विद्याधर मेरा आलिंगन कर प्रिय वचन कहते हुए समीप हो बैठ गये ।।१२६।। उसी समय दो देव विमानके अग्रभागसे उतरकर पहले मुझे और बादमें मुनिराजको नमस्कार कर मेरे आगे बैठ गये ||१२७।। विद्याधरोंने उस समय इस अक्रमका कारण पूछा कि हे देवो! तुम दोनोंने मुनिराजको छोड़कर श्रावकको पहले नमस्कार क्यों किया? ॥१२८॥ देवोंने इसका कारण कहा कि इस चारुदत्तने हम दोनोंको जिनधर्मका उपदेश दिया है इसलिए यह हमारा साक्षात् गुरु है यह समझिए ॥१२९|| यह कैसे ? इस प्रकार कहनेपर जो पहले बकराका जीव था वह देव बोला कि हे विद्याधरो ! सुनिए, मैं अपनी कथा स्पष्ट कहता हूँ ॥१३०॥ किसी समय बनारसमें पुराणोंके अर्थ, वेद तथा व्याकरणके रहस्यको जाननेवाला एक सोमशर्मा नामका ब्राह्मण रहता था उसकी ब्राह्मणीका नाम सोमिला था ॥१३१॥ उन दोनोंके भद्रा और सुलसा नामकी दो यौवनवती पुत्रियाँ थीं। जो वेद, व्याकरण आदि शास्त्रोंकी परम पार१. पितुरेव । २. सौमिल्ला म. । ३. भामिनी म.। ब्राह्मणी (ग. टि.)। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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