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________________ एकविंशतितमः सर्गः गोधैका रसपानाय साधोऽत्रावतरिष्यति । सुस्वा शीघ्रं हि तत्पुच्छं धृत्वा निर्गच्छ निश्चयम् ॥१२॥ तदेत्युक्तवते धर्म तस्मै सम्यक्रवपूर्वकम् । सप्रपञ्चमुवाचाहं सहपञ्चनमस्कृतिम् ॥१३॥ परेधुश्च रसं पीत्वा गच्छन्त्याः पुच्छमाश्वहम् । गोधाया धृतवान् दोामाकृष्टश्च बहिस्तया ॥१४॥ तटोपाटितगात्रोऽहं बहिर्मुक्तोऽतिमूच्छितः । विबुद्धश्च पुनर्जन्म जातमिति व्यचिन्तयम् ॥१५॥ शनैरुत्थाय गच्छन्तमन्वधावद् यमोपमः । महिषो वनमध्ये मां प्रविष्टोऽहं गुहां ततः ॥९६॥ प्रसुप्तोऽजगरस्तत्र मयाक्रान्तः समुत्थितः । अमिधान्तमत्युग्रं सोऽगृहीन्महिषं मुखे ॥१७॥ यावच्चोद्धतयोर्युद्धं वर्तते विषमं तयोः । तावत् तत्पृष्ठमाक्रम्य निर्गतोऽहमतिद्वतम् ॥१०॥ विनिःसृत्य महारण्याद् प्रत्यन्तग्राममाप्नुयाम् । काकतालीयतस्तत्र रुद्रदत्तं ददर्श तम् ॥१९॥ क्षुत्पिपासातिहरणं कृत्वासौ मे ततोऽब्रवीत् । चारुदत्त! विषादं मा कार्षीत्वं शृणु मे वचः ॥१०॥ सुवर्णद्वीपमाविश्य समुपायं धनं महत् । प्रत्येष्यावः पुनर्यन रक्ष्यते कुलसंततिः ॥१०१॥ एकवाक्यतया तेन यातौ चैरावती नदीम् । उत्तीर्य गिरिकुटं च गिरिं वेत्रवनं वनम् ॥१०२॥ टङ्कणं देशमासाद्य क्रीवाजौ गतिदक्षिणौ । गतौ वामपथेनातिविषमेण शनैः शनैः ॥१०३॥ अतिलङ्घय समां प्राह रुद्रदत्तोऽन्विताद। चारुदत्त ! पशून् हत्वा कृत्वा मस्त्राप्रवेशनम् ॥१०४॥ आस्वहे तत्र नौ द्वीपे भारुण्डाश्चण्डतुण्डकाः । गृहीत्वामिषलोभेन पक्षिणः प्रक्षिपन्ति हि ॥१०५॥ उसने कहा कि हे सत्पुरुष ! रस पीनेके लिए यहाँ एक गोह आवेगी सो तुम सरककर यदि शीघ्र ही उसकी पूंछ पकड़ लोगे तो निश्चय ही बाहर निकल जाओगे ॥१२॥ वह उस पुरुषका अन्तिम समय था इसलिए इस प्रकार निकलनेका मार्ग बतलानेवाले उस पुरुषके लिए मैंने सम्यग्दर्शनपूर्वक विस्तारके साथ धर्मका उपदेश दिया और पंच नमस्कार मन्त्र भी सुनाया ॥९३॥ दूसरे दिन रस पीकर जब गोह जाने लगी तब मैंने दोनों हाथोंसे शीघ्र ही उसकी पूंछ पकड़ ली और वह मुझे बाहर खींच लायी ॥९४॥ किनारोंकी रगड़से मेरा शरीर छिन्न-भिन्न हो गया था इसलिए उस गोहने जब मुझे बाहर छोड़ा तब मैं अत्यन्त मूच्छित हो गया। सचेत होनेपर मैंने विचार किया कि मेरा पुनर्जन्म ही हुआ है ।।९५।। धीरे-धीरे उठकर मैं आगे चला तो वनके बीचमें यमराजके समान भयंकर भैंसाने मेरा पीछा किया। अवसर देख मैं एक गुहामें घुस गया ॥१६॥ उस गुफामें एक अजगर सो रहा था। मेरा पैर पड़नेपर वह जाग उठा और सामने दौड़ते हुए उस भयंकर भैंसेको उसने अपने मुखसे पकड़ लिया ॥१७॥ भैंसा और अजगर दोनों ही अत्यन्त उद्धत थे इसलिए जबतक उन दोनों में युद्ध हुआ तबतक मैं उसकी पीठपर चढ़कर बड़ी शीघ्रतासे बाहर निकल आया ॥९८॥ उस महावनसे निकलकर मैं समीपवर्ती एक गाँव में पहुँचा तो काकतालीयन्यायसे ( अचानक ) मैंने वहाँ अपने काका रुद्रदत्तको देखा ॥९९।। मैं कई दिनका भूखा-प्यासा था इसलिए रुद्रदत्तने मेरी भूख-प्यासकी बाधा दूर कर मुझसे कहा कि चारुदत्त ! खेद मत करो मेरे वचन सुनो ॥१००|| हम दोनों सुवर्णद्वीप चलकर तथा बहुत भारी धन कमाकर चम्पापुरी वापस आवेंगे जिससे अपने कुलकी रक्षा होगी ।।१०१॥ तदनन्तर रुद्रदत्तके साथ एक सलाह हो जानेपर दोनों वहां से चले और ऐरावती नदीको उतरकर तथा गिरिकूट नामक पर्वत और वेत्रवनको उल्लंघकर टंकण देशमें जा पहुंचे। वहाँ मार्ग अत्यन्त विषम था इसलिए चलने में चतुर दो बकरा खरीदकर तथा उनपर सवार हो धीरे-धीरे आगे गये ॥१०२-१०३॥ तदनन्तर समभूमिको उल्लंघकर रुद्रदत्तने बड़े आदर के साथ मुझसे कहा कि चारुदत्त ! अब आगे मागं नहीं है इसलिए इन बकरोंको मारकर तथा इनकी भस्त्रा ( भाथड़ी) । बनाकर उनमें हम दोनों बैठ जावें। तीक्ष्ण चोंचोंवाले भारुण्ड पक्षी मांसके लोभसे हम दोनोंको १. आशु + अहम् । २. वनवध्ये म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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