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________________ सप्तदशः सर्गः २५५ वैदिकार्थविचारोऽयं त्वदन्येषामगोचरः । विच्छिन्नमसंप्रदायानामिदानीमिह भूतले ।।९५॥ तदत्र भवतोऽध्यक्षममीषां विदुषां पुरः । लभेतां निश्चयादेतौ न्याय्यौ जयपराजयः ॥१६॥ न्यायेनावसिते ह्यत्र वादे वेदानुसारिणाम् । स्यात्प्रवृत्तिरसंदिग्धा सर्वलोक पकारिणी ।।९७॥ इत्युर्वीन्द्रः स विज्ञप्तः पूर्वपक्षमदापयत् । पर्वताय सदस्यैस्तैः सगर्वः पक्षमग्रहीत् ॥२८॥ अजैर्यज्ञविधिः कार्यः स्वर्गार्थिभिरिति श्रतिः । अजाश्चात्र चतुष्पादाः प्रणीताः प्राणिनः स्फुटम् ॥५९॥ न केवलमयं वेदे लोकेऽपि पशुवाचकः । आवृद्धादङ्गनाबालादजशब्दः प्रतीयते ।।१०॥ नरोऽजपोतगन्धोऽयमजायाः क्षारमित्यपि । नापनेतुमियं शक्या प्रसिद्विस्त्रिदशैरपि ॥१०॥ सिद्धशब्दार्थसंबन्धे नियत्ते तस्य बाधने । व्यवहारविलोप: स्यादन्धधूकमिदं जगत् ॥ १०२।। अबाधितः पुनाये शब्दे शब्दः प्रवर्तते । शास्त्रीयो लौकिकश्चात्र व्यवहारः सुगोचरे ॥६०३॥ यथाग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकाम इति श्रुतौ । अग्निप्रभृतिशब्दानां प्रसिद्धार्थपरिग्रहः ॥१०४॥ तथैवात्राजशब्दस्य पशुरर्थः स्फुटः स्थितः । कुत्र यागादिशब्दार्थः पशुपातश्च निश्चितः ।। १०५॥ अतोऽनुष्ठानमास्थेयम जपोतनिपातनम् । यजैयष्टव्यमित्यत्र वाक्यनिष्ठितसंशयः ।।१०६। आशङ्का च न कर्तव्या पशोरिह निपातने । दुःखं स्यादिति मन्त्रेण सुखमत्योर्न दुःखिता ॥१०॥ मन्त्राणां वाहने साक्षाद् दीक्षान्तेऽतिसुखासिका । मणिमन्त्रौषधीनां हि प्रभावोऽचिन्यतां गतः ।।१०८॥ आये हैं क्योंकि आप न्यायमार्गके वेत्ता हैं ॥९४॥ यह वैदिक अर्थका विचार इस समय पृथिवीतलपर आपके सिवाय अन्य लोगोंका विषय नहीं है क्योंकि उन सबका सम्प्रदाय छिन्न-भिन्न हो चुका है ।।९५॥ इसलिए आपकी अध्यक्षतामें इन सब विद्वानोंके आगे ये दोनों निश्चय कर न्यायपूर्ण जय और पराजयको प्राप्त करें ॥९६॥ न्याय द्वारा इस वादके समाप्त होनेपर वेदानुसारी मनुष्यों की प्रवृत्ति सन्देहरहित एवं सब लोगों का उपकार करनेवाली हो जायेगी ।।९७|| इस प्रकार वृद्धजनोंके कहनेपर राजा वसुने पर्वतके लिए पूर्व पक्ष दिलवाया अर्थात् पूर्वपक्ष रखनेका उसे अवसर दिया और अपने साथी सदस्योंके कारण गर्वसे भरे पर्वतने पूर्व पक्ष ग्रहण किया ॥२८॥ पूर्व पक्ष रखते हुए उसने कहा कि 'स्वर्गके इच्छुक मनुष्यों को अजों द्वारा यज्ञकी विधि करनो चाहिए' यह एक श्रुति है इसमें जो अज शब्द है उसका अर्थ चार पाववाले जन्तु विशेष-बकरा है ॥९९॥ अज शब्द न केवल वेदमें ही पशुवाचक है किन्तु लोकमें भी स्त्रियों और बालकोंसे लेकर वृद्धों तक पशुवाचक ही प्रसिद्ध है ।।१००। यह मनुष्य अजके बालकके समान गन्ध वाला है, और 'यह अजा -बकरीका दूध है' इत्यादि स्थलों में अज शब्दकी जिस अर्थमें प्रसिद्धि है वह देवोंके द्वारा भी दूर नहीं की जा सकती ॥१०१॥ सिद्ध शब्द और उसके अर्थका जो सम्बन्ध पहलेसे निश्चित चला आ रहा है यदि उसमें बाधा डाली जावेगी तो व्यवहारका हो लोप हो जावेगा क्योंकि यह जगत् अन्ध उलूकोंसे सहित है—निर्विचार मनुष्योंसे भरा हुआ है ।।१०२।। ब्द योग्य अर्थमें अवांछित रूपसे प्रवृत्त होता है और ऐसा होनेपर ही शास्त्रीय अथवा लौकिक व्यवहार चलता है ॥१०३॥ जिस प्रकार 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः' स्वर्गका इच्छुक मनुष्य अग्निहोत्र यज्ञ करे, इस श्रुतिमें अग्नि आदि शब्दोंका प्रसिद्ध ही अर्थ लिया जाता है उसी प्रकार 'अजैर्यष्टव्यं स्वर्गकामैः' स्वर्गके इच्छुक मनुष्योंको अजोंसे होम करना चाहिए इस श्रुतिमे भी अजका पशु अर्थ हो स्पष्ट है और यागादि शब्दोंका अर्थ तो पशुधात निश्चित ही है ॥१०४-१०५॥ इसलिए 'अजैर्यष्टव्यम्' इत्यादि वाक्यों द्वारा निःसन्देह, जिसमें अजके बालकका घात होता है ऐसा अनुष्ठान करना चाहिए ॥१०६।। यहाँ यह आशंका नहीं करनी चाहिए कि घात करते समय पशुको दुःख होता होगा क्योंकि मन्त्रके प्रभावसे उसकी सुखसे मृत्यु होती है उसे दुःख तो नाम मात्रका भी नहीं होता ॥१०७॥ दीक्षाके अन्त में मन्त्रोंका उच्चारण होते ही पशुको सुखमय स्थान साक्षात् Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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