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________________ २५२ हरिवंशपुराणे वसना वासवेनेव नवयौवनवर्तिना। वनितेव विनीतवं नीता नीतिविदावनिः ॥५४॥ नमःस्फटिकमूर्द्धस्थसिंहासनमधिष्टितम् । नभस्थमेव भूपास्तं दत्तास्थानमर्मसत ॥५५॥ भूमौ कीर्तिरभूत्तस्य महिम्ना धर्मजन्मना । अश्मोपरिचरस्यात्र वसोरन्वर्थतापुषः ॥५६॥ इक्ष्वाकुवंशजा जाया कुरुवंशोद्भवा परा । दशपुत्रास्तयोर्जावाः वसोर्वसुसमाः क्रमात् ॥५७॥ बृहद्वसुरिति ज्ञेयः पूर्वश्चित्रवसुः परः । वासवश्वार्कनामा च पञ्चमश्च महावसुः ॥५८॥ विश्वावसू रविः सूर्यः सुवसुश्च बृहद्ध्वजः । इत्यमी वसुराजस्य सुताः सुविजिगीषवः ॥५९॥ सुतैर्दशमिरन्योऽन्यप्रीतिबद्धमनोरथैः । इन्द्रियाथै रिवोपेतः पार्थिवः सुखमन्वभूत् ॥६॥ एकदा नारदश्छात्रैर्बहुभिश्छत्रिभिर्वृतः । गुरुवद्गुरुपुत्रेच्छः पर्वतं द्रष्टुमागतः ॥६॥ कृतेऽभिवादने तेन कृतप्रत्यभिवादनः । सोऽभिवाद्य गुरोः पत्नी गुरुसंकथया स्थितः ॥६॥ अथ व्याख्यामसौ कुर्वन् वेदार्थस्यापि गर्वितः । पर्वतः सर्वतश्छात्रवृतो नारसंनिधौ ॥६३॥ अजैर्यष्टव्यमित्यत्र वेदवाक्ये विसंशयम् । अजगब्दः किलाम्नातः पश्वर्थस्यामिधायकः ॥६॥ तैरजैः खलु यष्टव्यं स्वर्गकामैरिह द्विजैः । पदवाक्यपुराणार्थपरमार्थविशारदैः ॥६५॥ प्रतिबन्धमिहान्धस्य तस्य चक्रे स नारदः। युक्त्यागमबलालोकध्वस्ताज्ञानतमस्तरः ॥६६॥ भट्टपुत्र ! किमित्येवमपव्याख्यामुपाश्रितः। कुतोऽयं संप्रदायस्ते सहाध्यायिन्नुपागतः ॥६॥ लिए सौंपकर तपोवनको चले गये ॥५३॥ नवयौवनसे मण्डित, नीतिका वेत्ता वसु इन्द्रके समान जान पड़ता था। उसने समस्त पृथिवीको स्त्रीके समान वशीभूत कर लिया था ॥५४॥ राजा वसु सभामें आकाशस्फटिकके ऊपर स्थित सिंहासनपर बैठता था इसलिए अन्य राजा उसे आकाशमें ही स्थित मानते थे॥५५॥ राजा वसु सदा आकाशस्फटिकपर चलता था और सदा सत्यका ही पोषण करता था इसलिए पृथिवीपर उसका यही यश फैल रहा था कि वह धर्मकी महिमासे आकाशमें चलता है ॥५६।। उसकी एक स्त्री इक्ष्वाकुवंशकी और दूसरी कुरुवंशकी थी। उन दोनोंसे उसके क्रमसे १ बृहद्वसु, २ चित्रवसु, ३ वासव, ४ अर्क, ५ महावसु, ६ विश्वावसु, ७ रवि, ८ सूर्य, ९ सवस और १० बहध्वज ये दश पूत्र हए। ये सभी पूत्र वसके ही समान अतिशय विजिगीषविजयाभिलाषी-पराक्रमी थे ॥५७-५९।। इन्द्रियोंके विषयोंके समान परस्परको प्रीतिसे युक्त इन दश पुत्रोंसे सहित राजा वसु अत्यधिक सुखका अनुभव कर रहा था ॥६॥ ___अथानन्तर एक दिन बहुतसे छत्रधारी शिष्यों-से घिरा नारद, गुरुपुत्रको गुरुके समान मानता हुआ पर्वतसे मिलनेके लिए आया ।।६१।। पवंतने नारदका अभिवादन किया और नारदने पर्वतका प्रत्यभिवादन किया। तदनन्तर गुरुपत्नीको नमस्कार कर नारद गुरुजीकी चर्चा करता हआ बैठ गया ।।६२॥ उस समय पर्वत सब ओरसे छात्रोंसे घिरा वेद वाक्यकी व्याख्या कर रहा था सो नारदके सम्मुख भी उसी तरह गवसे युक्त हो व्याख्या करने लगा ॥६३॥ वह कह रहा था कि 'अजैर्यष्टव्यम्' इस वेद वाक्यमें जो अज शब्द आया है वह निःसन्देह पशु अर्थका ही वाचक माना गया है ॥६४। इसलिए पद वाक्य और पुराणके अर्थके वास्तविक जाननेवाले एवं स्वर्गके इच्छुक जो द्विज हैं उन्हें बकरासे ही यज्ञ करना चाहिए ॥६५।। युक्तिबल और आगम बलरूपी प्रकाशसे जिसका अज्ञानरूपी अन्धकारका पटल नष्ट हो गया था ऐसे नारदने अज्ञानी पर्वतके उक्त अर्थपर आपत्ति की ।।६६।। नारदने पर्वतको सम्बोधते हुए कहा कि हे गुरुपुत्र ! तुम इस प्रकारकी निन्दनीय व्याख्या क्यों कर रहे हो? हे मेरे सहाध्यायी! यह सम्प्रदाय उन १. अस्योपरि -म.। २. -रन्वर्थतायुषः म., क.। ३. बृहद्ध्वजाः म.। ४. युक्तागम- म.। युक्त्या. गमबलाल्लोक- ख.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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