SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 27
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ विषय सूची पृष्ठ विषय पृष्ट विषय धर्मका वर्णन करने के बाद विस्तारसे श्रुतज्ञान इस घटनासे बाहबलीने विरक्त होकर दीक्षा का व्याख्यान किया धारण कर ली। उनकी तपस्याका वर्णन २०४-२०५ श्रुतज्ञानके पर्याय, पर्यायसमास आदि २० चक्रवर्ती भरतके वैभवका वर्णन २०५-२०८ भेदोंका वर्णन, उसोके अन्तर्गत आचारांग द्वादश सगं आदि अंगोंका वर्णनीय विषय और उनके भेदोपभेदोंका निरूपण १८५-१९० भरत समवसरण में जाकर शलाकापुरुषोंदृष्टिवाद अंगके पूर्वगत भेदोका वर्णन, का चरित्र सुनते थे। उन्होंने तीर्थकरों के अंगबाह्य श्रुतका निरूपण, समस्त थुतके स्मरणार्थ अपने द्वारपर २४ घण्टियोंकी अक्षरोंका परिमाण, मतिज्ञानका स्वरूप तथा वन्दनमाला बँधवायी थी। उन्हीके साम्राज्यउसके भेदोंका कथन, अवधि, मनःपर्यय और में सर्वप्रथम जयकुमार और सुलोचनाका केवलज्ञानका निरूपण तथा उनके प्रयोजन स्वयंवर हुआ २०९-२११ आदिको चर्चा १९१-१९७ विद्याधर और विद्याधरीको देख जयकुमार और सुलोचना मूच्छित हो गये। अनन्तर एकादश सगं जातिस्मरण द्वारा अपने पूर्वभव जानकर समवसरणसे वापस आकर भरतने पुत्र जन्म बहुत प्रसन्न हुए । सुलोचना द्वारा पूर्वभवोंका का उत्सव किया और चक्ररत्नकी पूजा कर वर्णन २११ दिग्विजयके लिए प्रस्थान किया, पूर्व, दक्षिण रतिप्रभ देवके द्वारा जयकुमारके शीलकी और पश्चिम दिशाके देव और मनुष्योंको परीक्षाका वर्णन २११ वश कर उन्होंने उत्तर दिशाकी ओर प्रयाण जयकुमार द्वारा सुलोचनाके लिए भगवान् किया और विजया देवका स्मरण कर उसे ऋषभदेवके समवसरणका वर्णन । जयकुमारपरास्त किया, तदनन्तर तमिस्र गुहाद्वारसे ने स्वयं १०८ राजाओंके साथ दीक्षा ले ली उत्तर भरत क्षेत्र में प्रवेश किया १९८-२००। तथा गणधरका पद प्राप्त किया। भगवान के उत्तर भरत के म्लेच्छ राजाओं तथा उनके ८४ गणधरोंके नाम एवं शिष्य-परम्पराका सहायक मेघमुख देवको परास्त कर समस्त वर्णन । कैलास पर्वतपर योग निरोध कर म्लेच्छ खण्डोंपर विजय प्राप्त की। इस तरह भगवान् ऋषभदेव मोक्ष पधारे २११-२१५ साठ हजार वर्ष तक पखण्ड भरतको दिग्विजय कर भरत चक्रवर्ती अयोध्याके निकट २००.२०२ आये त्रयोदश सगं जब चक्ररत्न अयोध्याके प्रवेश-द्वारगर रुक चक्रवर्ती भरतने अर्ककीतिको राज्य दे दीक्षा गया तब भरतके पूछनेपर बुद्धिसागर पुरो धारण कर ली और वृषभसेन आदि गणधरोंहितने उसका कारण बताया। भरतने अपने के साथ कैलास पर्वतसे मोक्ष प्राप्त किया २१६ सब भाइयोंके पाय दूत भेजे । बाहुबलीको अर्क कीति स्मितयशको राज्य देकर तप द्वारा छोड़ अन्य भाइयों ने राज्यसे व्यामोह छोड़ मोक्षको प्राप्त हुए। सूर्यवंश और चन्द्रवंशके दीक्षा ले ली परन्तु बाहुबलीने दृष्टियुद्ध, जल- अनेक राजाओंका समुल्लेख २१६-२१७ युद्ध और मल्ल युद्ध में भरत को परास्त कर अजितनाथ भगवान्, सगर चक्रवर्ती, उनके दिया। भरतने क पत हो उसपर चक्ररत्न अद्गु आदि साठ हजार पुत्र और कालक्रमसे चला दिया परन्तु चर भी उसा कुछ बिगाड़ होनेवाले सम्भवनाथसे लेकर शीतलनाथ तकनहीं सका। २०२-२०४ के तीर्थंकरोंका समल्लेख २१७-२१८ [४] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy