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________________ एकादशः सर्गः मूलमध्यान्तदुःस्पर्शं सर्वदाग्निशिखामिव । भास्वरामपि घिग्लक्ष्मीं सर्व संतापकारिणीम् ॥९५॥ मर्त्यलोके सुखं तद् यच्चित्तसंतोषलक्षणम् । सति बन्धुविरोधे हि न सुखं न धनं नृणाम् ॥ ९६ ॥ जनयन्ति नृणां मोगाः प्रतिकूलेषु बन्धुषु । 'शीतज्वरामिभूतानां शोतस्पर्शा इवासुखम् ॥९७॥ इति संचिन्त्य संत्यज्य स राज्यं तपसि स्थितः । कैलासे प्रतिमायोगं तस्थौ वर्ष सुनिश्चलः ॥९८॥ वल्मीकरन्ध्रनिर्यातैः फणिभिर्मणिभूषितैः । चरणौ रेजतुस्तस्य पुरेव नरपैर्भृतैः ॥९९॥ वल्लभेव पुरा वल्ली माधवी कोमलाङ्गिका । निःशेषाङ्गपरिष्वङ्गं चक्रे तस्य मुनेरपि ॥ १०० ॥ लतां व्यपनयन्तीभ्यां खेचरीभ्यां बभौ मुनिः । श्याममूर्तिः स्थिरो योगी यथा मरकताचलः ।। १०१ ।। कषायान्तमसौ कृत्वा भरतेन कृतानतिः । केवलज्ञानमुत्पाद्य पारिषद्यः प्रभोरभूत् ॥ १०२ ॥ चतुर्दशमहारत्नैर्निधिभिर्नवभिर्युतः । निःसपत्नं ततश्चक्री बुमोज वसुधां कृती ॥१०३॥ अदाद् द्वादशवर्षाणि दानं चासौ यथेप्सितम् । लोकाय कृपया युक्तः परीक्षापरिवर्जितम् ॥ १०४॥ जिनशासनवात्सल्यभक्तिमारवशीकृतः । परीक्ष्य श्रावकान् पश्चाद् यवब्रीह्यङ्कुरादिभिः ॥ १०५ ॥ काकिण्या लक्षणं कृत्वा सुरत्नत्रय सूत्रकम् । संपूज्य स ददौ तेभ्यो भक्तिदानं कृते युगे ॥१०६ ॥ ततस्ते ब्राह्मणाः प्रोक्ताः व्रतिनो भरतादृताः । वर्णत्रयेण पूर्वेण जाता वर्णचतुष्टयी ॥१०७॥ २०५ धिक्कार हो ||१४|| जिस प्रकार अग्निकी शिखा सदा मूल, मध्य और अन्तमें दुःखकर स्पशंसे सहित है तथा देदीप्यमान होकर भी सबको सन्ताप करनेवाली है उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी आदि, मध्य और अन्तमें दुःखकर स्पशंसे सहित है - सब दशाओंमें दुःख देनेवाली है तथा देदीप्यमान- तेज तर्राटेसे युक्त होनेपर भी सबको सन्ताप उत्पन्न करनेवाली है-आकुलता की जननी है इसलिए इसे धिक्कार हो || ९५|| मनुष्यलोकमें सुख वही है जो चित्तको सन्तुष्ट करनेवाला हो परन्तु बन्धुजनोंमें विरोध होनेपर मनुष्योंको न सुख प्राप्त होता है और न धन ही उनके पास स्थिर रहता है || ९६|| जिस प्रकार शीत-ज्वरसे आक्रान्त मनुष्योंके लिए शीतल स्पर्श दुःख उत्पन्न करते हैं उसी प्रकार बन्धुजनोंके विरुद्ध होनेपर भोग भी मनुष्योंके लिए दुःख उत्पन्न करते हैं ||९७|| इस प्रकार विचार कर तथा राज्यका परित्याग कर बाहुबली तप करने लगे और कैलास पर्वतपर एक वर्षका प्रतिमा योग लेकर निश्चल खड़े हो गये ||९८ || उनके चरण, arita fबलोंसे निकले हुए मणिभूषित सर्पोंसे इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे जिस प्रकार कि पहले मणिभूषित आश्रित राजाओंसे सुशोभित होते थे ||१९|| जिस प्रकार पहले कोमलांगी वल्लभा उनके समस्त शरीरका आलिंगन करती थी उसी प्रकार कोमलांगी माधवीलता उनके मुनि होनेपर भी उन बाहुबलीके समस्त शरीरका आलिंगन कर रही थी ||१०० || दो विद्याधर परियाँ उनके शरीरपर लिपटी हुई लताको दूर करती रहती थीं जिससे श्याममूर्तिके धारक एवं स्थिर खड़े हुए योगिराज बाहुबली मरकतमणिके पर्वत के समान सुशोभित हो रहे थे || १०१ ॥ तदनन्तर भरतने आकर जिन्हें नमस्कार किया था ऐसे बाहुबली मुनिराज कषायोंका अन्त कर तथा केवलज्ञान उत्पन्न कर भगवान् वृषभदेव के सभासद् हो गये -उनके समवसरण में पहुँच गये ॥१०२॥ तदनन्तर चौदह महारत्नों और नो निधियोंसे युक्त अतिशय बुद्धिमान् चक्रवर्ती भरत, पृथिवीका निष्कण्टक उपभोग करने लगे || १०३ || भरत महाराज दयासे युक्त हो बिना किसी परीक्षा के बारह वर्षं तक लोगोंके लिए मनचाहा दान देते रहे || १०४ || तदनन्तर जिन - शासन सम्बन्धी वात्सल्य और भक्तिके भारसे वशीभूत होकर उन्होंने जो तथा धान्य आदिके अंकुरोंसे श्रावकों की परीक्षा की, काकिणी रत्नसे निर्मित रत्नत्रयसूत्र - यज्ञोपवीतको उनका चिह्न बनाया और आदर-सत्कार कर कृतयुगमें उन्हें भक्तिपूर्वक दान दिया ।। १०५ - २०६|| आगे चलकर भरतके १. शीतद्वाराभिभूतानां ख. 1 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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