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________________ अष्टमः सर्गः १५१ अधोमुखमयूखौघदण्डमातपवारणम् । ताराभरणयोरिक्षप्तं श्यामयेवेन्दुमण्डलम् ॥६४।। संध्यारागाङ्गरागाड्य पूर्वाशागनयारुणम् । सिन्दूरारुणितं कुम्भं मङ्गलार्थमिवोद्धृतम् ॥६५॥ मीनौ कृतजलक्रीडौ हृतात्मोदरशोभयोः । नेत्रयोश्चलयोर्दातुमुपालम्ममिवागतौ ॥६६।। हारिणौ वारिणा पूर्णी विशालौ कलशौ धनौ । सौवौं स्वोपमो द्रष्टुं स्तनभाराविवोद्धतौ ॥६७॥ 'सोद्दण्डपुण्डरीकौघं राजहंसमनोहरम् । रथपादातिनादाढ्यं सरः सैन्यमिवोर्जितम् ॥६॥ *प्रमीन मिथुनोन्मेपमकराद्यरुराशिभिः । प्रपूर्णितमिवाकाशं वर्द्धमान महार्णवम् ॥६९॥ सावष्टम्भभुजस्तम्भैः प्रौढदृष्टिमिरुन्मुखैः । सिंहहेमासनं व्यूढं मनुराजैर्जगद् यथा ।।७।। स्वर्गसौन्दर्यसंदर्भमिव दर्शयितुं नृणाम् । विमानं कलगीताभिर्देवकन्यामिराहृतम् ।।७१।। सुगन्धित दो बड़ी-बड़ी मालाएँ देखीं। वे मालाएं ऐसी जान पड़ती थीं मानो समस्त ऋतुओंकी लक्ष्मीने मिलकर मरुदेवीकी सेवाके लिए उन मालाओंको बनाकर ऊपर उठा रखा हो ॥६३|| छठवीं बार उसने चन्द्रमण्डलको देखा। वह चन्द्रमण्डल ऐसा जान पड़ता था मानो तारारूपी आभूषणोंसे युक्त रात्रिरूपी स्त्रोके द्वारा ऊपर उठाया हुआ छत्र हो हो। ऐसा छत्र कि जिसकी नीचे की ओर आनेवाली किरणोंका समूह ही दण्डका काम दे रहा था।॥६४|| सातवों बार उसने सन्ध्याकी लालिमारूपी अंगरागसे युक्त उदित होता हुआ सूर्य देखा। वह सूर्य ऐसा जान पड़ता था मानो पूर्व दिशारूपी स्त्रीने मंगलके लिए सिन्दुरसे रंगा हुआ कलश ही ऊपर उठाया हो ॥६५।। आठवीं बार उसने जलके भीतर क्रीड़ा करते हुए दो मीन देखे। वे मीन ऐसे जान पडते थे मानो अपने उदरकी शोभाको हरनेवाले चंचल नेत्रोंका उलाहना देने के लिए ही मरुदेवीके पास आये हों ॥६६|| नौवीं बार उसने जलसे भरे हुए दो स्वर्णमय विशाल कलश देखे। वे कलश ऐसे जान पड़ते थे मानो अपनी उपमा धारण करनेवाले माताके स्तनोंको देखने के लिए ही ऊपर उठे हों ॥६७|| दशवीं बार उसने एक ऐसा सरोवर देखा जो किसी बलिष्ठ सेनाके समान जान पड़ता था। क्योंकि जिस प्रकार सेना, सोद्दण्डपुण्डरीकोघ-ऊपर उठे दण्डोंसे युक्त छत्रोंके समूहसे सहित होती है उसी प्रकार वह सरोवर भी सोद्दण्डपुण्डरीकोघ-ऊँचे-ऊंचे डण्ठलोंसे युक्त श्वेत कमलोंके समहसे सहित था। जिस प्रकार सेना, राजहंस मनोहर-उत्तम राजाओंसे मनोहर होती है उसी प्रकार वह सरोवर भी राजहंस मनोहर-हंस* विशेषोंसे सुन्दर था। और जिस प्रकार सेना, रथपादातिनादाढय-रथके पहियोंकी विशाल चीत्कारसे युक्त होती है उसी प्रकार वह सरोवर भी रथपादातिनादाढय-चक्रवाक पक्षियोंके अत्यधिक शब्दके युक्त था ॥६८॥ ग्यारहवीं बार उसने बढ़ता हुआ एक ऐसा महासमुद्र देखा जो ठीक आकाशके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार आकाश मीन, मिथुन, मकर आदि राशियोंसे युक्त होता है-उसी प्रकार महासमुद्र भी उत्तम मीन युगलोंको उछल-कूद तथा मगर-मच्छ आदिकी विशाल राशिसे पूर्ण था ।।६९।। बारहवीं बार उसने एक सुवर्णमय सिंहासन देखा। वह सिंहासन जिस प्रकार सबल भुजाओंके धारक, प्रौढ़ दृष्टिसे युक्त एवं कार्य करने में तत्पर कुलकरोंके द्वारा जगत् धारण किया जाता है उसी प्रकार मजबूत भुजस्तम्भोंसे युक्त, प्रौढ़ दृष्टिसे सहित एवं ऊपरकी ओर मुख किये हुए सिंहोंके द्वारा धारण किया गया था ॥७०।। तेरहवीं बार उसने एक विमान देखा जो ऐसा जान पड़ता था मानो मनूष्योको स्वर्गलोकका सौन्दर्य दिखलाने के लिए सुन्दर गीत गानेवाली देवकन्याएं उसे पृथिवीपर ले आयी हों ॥७१।। १. मयूखोद्यदण्ड म.। २. सौद्दण्डपुण्डरीकौघराज- म.। ३. रथपादाः चक्रवाकाः तेषामतिनादेन दीर्घशब्देन आढयं सहितम् । प्रकर्षेण मीना मत्स्यास्तेषां मिथुनानि तेषामुन्मेषः। मकरादीनामुराशिश्च तैः, पक्षे राशिविशेषः। * राजहंसास्तु ते चञ्चुचरणोहित: सिता:-जिनकी चोंच और चरण लाल होते हैं बाको सफेद होते हैं, ऐसे हंस राजहंस कहलाते हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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