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________________ पञ्चमः सर्गः १११ अन्तश्छिन्नतटो भाति बहिर्वृद्धिक्रमोन्नतिः । सोऽभ्यन्तरमुखासीनभृगाधिपतिविक्रमः ।।५९५॥ चतुर्दशगुहाद्वारदत्तनिर्गमनो गिरिः । 'पुष्करोदं नयत्येष पूर्वापरनदीवधूः ॥५९६॥ पञ्चाशद्योजनायामास्तद व्याससंगताः । अर्धयोजनसंवृद्धसप्तत्रिंशत्समच्छिताः ॥५९७॥ अष्टोच्छ्रायचतुासगृहद्वारोपशोभिताः । चत्वारो. मूनि तस्याद्रेश्चतुर्दिक्षु जिनालयाः ।।५९८॥ तत्प्रदक्षिणवृत्तानि प्राच्यादिषु दिशासु च । इष्टदेशनिविष्टानि कूटान्यष्टादशावले ॥५२९॥ तानि पञ्चशतोत्सेधमूलविस्तारवन्ति तु । शते चाद्ध तृतीये द्वे विस्तृतान्यपि चोपरि ॥६००॥ त्रोणि त्रीणि हि कूटानि चतुर्दिक्षु विदिक्षु तु । चत्वारि वज्रमैशान्यामाग्नेय्यां तपनीयकम् ॥६.१॥ प्राच्यां दिशि तु बैडूर्ये यशस्वान् वसति प्रभुः । अश्मगर्ने यशस्कान्तः सुपर्णानां यशोधरः ॥६०२॥ सौगन्धिके ततोऽपाच्या रुचके नन्दनस्तथा । लोहिताक्षे पुनः कूरे नन्दोत्तर इतीरितः ॥६०३।। तस्यामशनिघोषोऽपि वसत्यञ्जनके दिशि । सिद्धश्चाञ्जनमूले तु प्रताच्यां कनके पुनः ।।६०४।। क्रमणे मानुषाख्यस्तु कूटे रजतनामनि । उदीच्यां स्फटिके कूटे सुदर्शन इति श्रुतः ॥६०॥ अङ्के मोघः प्रवालेऽस्यां सुप्रवृद्धो वसत्यसौ । तपनीये सुरः स्वातिर्वज्रे तु हनुमानापि ॥६०६॥ निषधस्पृष्टभागस्थे रत्नाख्ये पूर्वदक्षिणे । वेणुदेव इति ख्यातः पन्नगेन्द्रो वसत्यसौ ॥६०७॥ सौ तेरह है ।।५९४।। यह मानुषोत्तर भीतरकी ओर छिन्नतट टाँकोसे कटे हुएके समान एक सदृश है और इसका बाह्य भाग पिछली ओरसे क्रमसे ऊंचा उठता गया है अतः भोतरको ओर मुख कर बैठे हए सिंहके समान उसका आकार जान पडता है ।।५९५।। यह पर्वत चौदह गफारूपी दरवाजों के द्वारा निकलनेका मार्ग देकर पूर्व-पश्चिमकी नदीरूपी स्त्रियोंको पुष्करोदधिके पास भेजता रहता है ।।५९६।। जिन गुफाओंसे नदियां निकलती हैं वे पचास योजन लम्बी, पचीस योजन चौड़ी और साढ़े सैंतोस योजन ऊंची हैं ॥५९७।। मानुषोत्तर पर्वतके उपरितन भागपर चारों दिशाओं में आठ योजन ऊंचे और चार योजन चौड़े गृह-द्वारोंसे सुशोभित चार जिनालय हैं ।।५९८॥ इसी मानुषोत्तर पर्वतकी पूर्वादि दिशाओं में प्रदक्षिणा रूपसे इष्ट स्थानोंपर बने हुए अठारह कूट हैं । ५९९॥ ये कूट पाँच सौ योजन ऊँचे हैं। इनके मूल भागका विस्तार पाँच सौ योजन और ऊध्वंभागका ढाई सौ योजन है ॥६००। मानुषोत्तर पर्वतकी चारों दिशाओं में तीन-तीन तथा विदिशाओमें चार* कुट हैं। इन चारके सिवाय ऐशान दिशामें वनकूट ओर आग्नेय दिशामें तपनोयक कूट और भी हैं ॥६०१॥ पूर्व दिशाके वैडूर्य नामक पहले कूटपर यशस्वान् देव, दूसरे अश्मगर्भ कूटपर यशस्कान्त और तीसरे सौगन्धिक कूटपर सुपर्णकुमारोंका स्वामी यशोधर देव रहता है । तदनन्तर दक्षिण दिशाके रुवक कूटपर नन्दन, लोहिताक्ष कूटपर नन्दोत्तर और अंजन कूटपर अशनिघोष देव रहता है। पश्चिम दिशाके अंजनमूल कूटपर सिद्धदेव, कनक कूटपर क्रमण देव और रजत कूटपर मानुष नामका देव रहता है। उत्तर दिशाके स्फटिक कूटपर सुदर्शन, अंक कूटपर मोच और प्रवाल नामक कूटपर सुप्रवृद्ध देव रहता है । आग्नेय विदिशाके पूर्वोक्त तपनीयक कूटपर स्वाति देव तथा ऐशान दिशाके वज्रक कूटपर हनुमान् नामका देव रहता है। मानुषोत्तर पर्वतके पूर्व-दक्षिण कोणमें निषधाचलसे स्पृष्ट भागमें रत्न नामका कूट है और उसपर नागकुमारोंका स्वामी वेणदेव रहता है। पूर्वोत्तर कोणमें नीलाचलसे स्पष्ट भागमे सर्वरत्न नामका कट है उसपर १. सुखासोन म. । २. पुष्करो नन्दयत्येष म. । * ऐशान और आग्नेय विदिशामें दो-दो तथा नैऋत्य और वायव्य में एक-एक इस प्रकार विदिशाओंमें ६ तथा दिशाओं में १२ कुल मिलाकर १८ कुट बताये हैं। इनमें चार सिद्धायतन कुट और मिला देनेपर २२ कूट होते है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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