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________________ ९६७ सीता (भौ) एक महानदी ५।१२३ सीताकुट (भौ) माल्यवान पर्वत का एक्ट ५।२२० सीमाकट (0) नीलकुलाचलका चौथा कल ५।१०० मतदा (11) एक महानदी संतदा (भौ) विदेह की एक विभंगा नदी ५।२४१ मंगोदाकत (भी) विद्युत्प्रभका एक कूट ५१२२३ यातादाकट (भी) निषधाचलका मालवा कर ५८९ मोड कर (व्य) पाचवाँ कुलकर ७।१५४ सं!सन्तक (भौ) रत्नप्रभा पथिवी के प्रथम प्रस्तारका इन्द्रक नामका विल ४१७६ समर (व्य) विदेहके तीर्थंकर शब्दानुक्रमणिका सुकीर्ति (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५/२५ सुकेतु (व्य)विजयार्धका निवासी एक विद्याधर ३६ सुखरथ ( व्य) दहस्थका पुत्र १८।१९ सुखानुबन्ध (पा) सल्लेखना व्रतका अतिचार ५८।१८४ सुखावह (भी) पश्चिम विदेहका ___ वक्षारगिरि ५।२२० सुगन्ध (व्य) अरुणवर द्वीपका रक्षक देव ५६६४५ सुगन्धा (भी) पश्चिम विदेहका एक देश ५।२५१ सुगर्म (व्य) वसुदेव और रत्न वतीका पुत्र ४८।५९ सुग्रीव (व्य) विजयखेट नगरमें रहनेवाला एक गन्धर्वाचार्य १९१५४ सुघोष = बलदेवके शंखका नाम ४२७९ सुघोष = गन्धर्वसेनाके द्वारा वमुदेवको दी हुई वीणा १९।१३७ सुचक्षु (व्य) मानुषोत्तर पर्वतका रक्षक देव ॥६३९ सुचन्द्र (व्य) आगामी बलभद्र सुतेजस् (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५।१४ सुदर्शन (व्य) एक यक्ष १८॥३० सुदर्शन = चक्रवर्तीका चक्ररत्न १११५७ सुदर्शन (व्य) अलका नगरीका राजा २७१७९ सुदर्शन (व्य) जगसन्धका पुत्र ५२१३२ सुदर्शन (व्य) पांचवां बलभद्र ६०।२९० सुदर्शनचक्र कृष्ण का एक रत्न ५३१४९ सुदर्शन (व्य) भगवान् अरनाथ के पिता ४५।२१ सुदर्शन ( भो) रुचिकगिरिका उत्तर दिशासम्बन्धी कूट ५।७१६ सुदर्शन ( भो) अधोवेयकका पहला इन्द्रक ६।५२ सुदर्शन (व्य ) मानुषोत्तरकी उत्तर दिशामें स्थित म्फटिक कूटपर रहनेवाला देव घर (व्य) उठा कुलकर गः (व्य) आगामी प्रति नारायण ६०५७० सकच्छ (व्य ) ऋषभदेवका पा (भौ। पश्चिम विदेहका देश ५१२४५ मौ )विद नगरी २२९७ मन (योजयकम का पूर्त. व १० मम्मार (व्य सनत्कुमार चक्र. बकाय ४',123 सारिका (न्य ) नामकी सुचारु ( व्य) कृष्णका पुत्र ४८।७१ सुचारु (व्य)कुरुवंशी एक गजा ४५४२३ सुज्येष्टा (व्य) गटवर्धनकी स्त्री ६०1७१ मज्येष्टा (व्य ) धनदत्त सेठ और नन्दयगाकी पुत्री सुदर्शना (व्य) भगवान् ऋपभ देवकी दीक्षाकालकी पालकी ९७७ सुदर्शना (व्य) घनदन गट और नन्दयशाकी पुत्री १८।११३ सुदर्शना (व्य) राजा विगट्की स्त्री ४६।२३ सुदर्शना(व्य) सन्ध्याकार नगर के राजा सिंहघोषकी स्त्री ४५।११५ सुदर्शना (भौ) नन्दीश्वर द्वीपके उत्तर दिशामम्बन्धी अंजनगिरिकी उत्तर दिशामें स्थित वापिका ५।६६४ समारिका (व्य) नदेव वैश्य की म्बी ४६५० सुतार (व्य) प्रकीर्णकामनीका पुत्र एक विद्याधर ४६१८ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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