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________________ कारिका ९] देवागम वस्तुतः अनेकान्त, भाव-अभाव, नित्य-अनित्य, भेद-अभेद आदि एकान्तनयोंके विरोधको मिटाकर, वस्तुतत्त्वकी सम्यक्-व्यवस्था करनेवाला है; इसीसे लोक-व्यवहारका सम्यक् प्रवर्तक है--बिना अनेकान्तका आश्रय लिये लोकका व्यवहार ठीक बनता ही नहीं, और न परस्परका वैर-विरोध ही मिट सकता है। इसीलिये अनेकान्तको परमागमका बीज और लोकका अद्वितीय गुरु कहा गया है---वह सबोंके लिये सन्मार्ग-प्रदर्शक है । जैनी नीतिका भी वही मूलाधार है। जो लोग अनेकान्तका सचमुच आश्रय लेते हैं वे कभी स्व-पर-वैरी नहीं होते, उनसे पाप नहीं बनते, उन्हें आपदाएँ नहीं सतातीं, और वे लोकमें सदा ही उन्नत उदार तथा जयशील बने रहते हैं। भावकान्तकी सदोषता भावैकान्ते पदार्थानामभावानामपह्नवात् । सर्वात्कमनाद्यन्तमस्वरूपमतावकम् ।।९।। ‘(हे वीर भगवन् ! ) यदि पदार्थोंके भाव ( अस्तित्त्व ) का एकान्त माना जाय--यह कहा जाय कि सब पदार्थ सर्वथा सत् रूप ही हैं, असत् ( नास्तित्व ) रूप कभी कोई पदार्थ नहीं है-- तो इससे अभाव पदार्थोंका--प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव और अत्यन्ताभावरूप वस्तु-धर्मोंका--लोप ठहरता है, और इन वस्तु-धर्मोंका लोप करनेसे वस्तुतत्व ( सर्वथा ) अनादि, अनन्त, सर्वात्मक और अस्वरूप हो जाता है, जो कि आपका इष्ट नहीं है-प्रत्यक्षादिके विरुद्ध होनेसे आपका मत नहीं है।' (किस अभावका लोप करनेसे क्या हो जाता अथवा क्या दोष आता है, उसका स्पष्टीकरण आगे किया गया है ) १. नीति-विरोध-ध्वंसी लोकव्यवहारवर्तकः सम्यक् । परमागमस्य बीजं भुवनैकगुरुजयत्यनेकान्तः ।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001170
Book TitleAptamimansa
Original Sutra AuthorSamantbhadracharya
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1978
Total Pages190
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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