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व्यसनमुक्त हो जीवन
परमपूज्य व्याख्यानवाचस्पति श्रीमद्विजययतीन्द्रसूरीश्वरजी महाराज शिष्य
ज्योतिषाचार्य ज्योतिषसम्राशिरोमणि मुनिजयप्रभविजय श्रमण....
आज के इस भौतिक चकाचौध वाले युग में बहुसंख्यक व्यसन का अर्थ कष्ट होता है। यह संस्कृतशब्द है। यह प्रवृत्तिजन्य व्यक्ति किसी न किसी व्यसन से : ग्रस्त हैं। कुछ व्यसन आज है। अर्थात्, जिस प्रवृत्ति से कष्ट होता है, उस प्रवृत्ति को व्यसन एक फैशन का रूप में ले चुके हैं। जब व्यसनग्रस्त व्यक्तियों कहा जाता है। यहाँ एक प्रश्न उत्पन्न होता है। वह यह कि यदि का ध्यान इन व्यसनों के दुष्परिणामों की ओर आकर्षित किया कोई व्यक्ति यह कहे कि उसे मदिरापान से कष्ट नहीं आनंद जाता है, तो वे अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें स्वीकार तो कर लेते हैं, मिलता है, इसलिए मदिरापान उसके लिए व्यसन नहीं है, तो क्या किन्तु व्यसन त्यागने के लिए तत्परता प्रदर्शित नहीं करते हैं। यह सत्य मान लिया जाएगा? नहीं, कदापि नहीं। कारण यह है
आज की नई पीढ़ी तो प्रायः व्यसनाधीन होती जा रही है। उसे कि मदिरापान का तात्कालिक परिणाम उस व्यक्ति के लिए व्यसनों से दूर रखने के प्रयास भी निरर्थक सिद्ध होते जा रहे हैं। आनंददायक भले ही हो, किन्तु अंतिम परिणाम हर दशा में व्यसनों के भयावह दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। फिर भी कष्टप्रद ही रहने वाला है। अतः मदिरापान व्यसन है। व्यसन एक समाज व सरकार उनकी ओर से उदासीन हैं। हम यहाँ व्यसन प्रकार का विषवृक्ष है, जो मनुष्य के जीवन को शनैः-शनैः नष्ट शब्द का उपयोग कर रहे हैं, किन्तु यह व्यसन क्या है? इसको करता है। उसके परिवार की सुख-शांति को बर्बाद करता है। समझना आवश्यक है। इसे समझने के लिए व्यसन का अर्थ यहाँ एक बात और कहना उचित प्रतीत होती है। वह यह कि
और उसके प्रकारों की विवेचना आवश्यक प्रतीत होती है। वही बुराई व्यक्ति को अपनी ओर शीघ्रता से आकर्षित करती है। हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं
व्यक्ति उसकी ओर आकृष्ट होकर उसे अपनाने लगता है। फिर व्यसन के संबंध में किसी यशस्वी कवि ने लिखा है
धीरे-धीरे वह उसमें डूब जाता है। उससे बाहर निकल पाना
उसके लिए कठिन हो जाता है। वैसरे यह कहते हुए भी हम सुनते व्यसनस्य मृत्योश्च व्यसनं कष्टमुच्यते।
हैं कि क्या करें आदत पड़ गई है अब छूटती ही नहीं है। किन्तु व्यसन्यधोऽधो व्रजति स्वर्यात्यव्यसनी मत:।।
व्यक्ति यह भूल जाता है कि आदत भी उसने ही डाली है। यदि _तात्पर्य यह है कि मृत्यु और व्यसन इन दोनों में से व्यसन व्यक्ति दृढ संकल्प कर ले तो आदत में परिवर्तन करना कोई अधिक हानिप्रद है। क्योंकि मृत्यु एक बार ही कष्ट देती है, पर बडा कार्य नहीं है। जो अपनी आदत में परिवर्तन नहीं कर पाते व्यसनी व्यक्ति जीवन भर कष्ट पाता है और मरने के पश्चात् भी हैं. उनमें आत्मबल की कमी रहती है। जो व्यक्ति व्यसनों के वह नरक आदि में विभिन्न प्रकार के कष्टों का उपभोग करता है।
दुष्परिणामों से परिचित रहते हुए भी यदि उनका परित्याग नहीं जबकि अव्यसनी जीते जी भी यहाँ पर सुख के सागर पर तैरता है करते हैं. उनका सामाजिक जीवन प्रायः नष्ट हो जाता है और और मरने के पश्चात स्वर्ग के रंगीन सुखों का उपभोग करता है। प्रतिष्ठा समाप्त हो जाती है। पारिवारिक जीवन संघर्षमय हो व्यसन का अर्थ - कोई भी व्यक्ति जन्मजात व्यसनी नहीं जाता है, अत: जहाँ तक हो सके व्यसनों से बचना ही चाहिए। होता। व्यसन तो एक आदत है, जो संगति में रहने पर पड़ती है। व्यसन के प्रकार - व्यसनों को संख्या की सीमा में बाँध पाना जो जैसे वातावरण और व्यक्तियों की संगति में रहेगा उसके सरल नहीं है। कारण कि प्रत्येक वह आदत जो परिवार में संघर्ष अनुरूप ही उसका जीवन, उसकी आदत बन जाएगी। किंचित् को जन्म देती है. समाज में प्रतिष्ठा को ठेस पहँचाती है. व्यसन ही कोई ऐसा व्यक्ति मिलेगा जो काजल की कोठरी में रहकर की श्रेणी में आती है। फिर भी विद्वानों ने व्यसन में भेद, प्रकार भी बेदाग निकल आए। जब व्यसन के अर्थ पर आते हैं तो बताए हैं। वैदिक ग्रंथों में अठारह प्रकार के व्यसन बताते हए andidroidniwandwimitaniwomsiwandwindowondinbiwiroad-6 ५९Horridorironioritoroorieirdmivincibridnidiadride
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-यतीन्द्रसूरि स्मारक ग्रन्थ - आधुनिक सन्दर्भ में जैनधर्म - कहा गया है
के बाद भी ये रोग ठीक नहीं हो पाते हैं। व्यक्ति को अपने दश कामसमुत्थानि तथाऽष्टौ कोधजानि च।
सामने अपनी मृत्यु दिखाई देती है। तब वह पश्चात्ताप करता है। व्यसनानि दुरन्तानि यत्नेन परिवर्जयेत्॥
और उस घड़ी को कोसता है जब उसने व्यसन प्रारंभ किया, मृगयाऽक्षो दिवास्वप्नः परिवादः स्त्रियो मदः। . किन्तु अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। समय तीर्थत्रिकं वृथाऽट्य च कामजो दशको गणः।।
रहते आदमी को चेत जाना चाहिए। पहली बात तो यह कि उसे पैशून्यं साहसं द्रोहे ईर्ष्याऽसूयार्थदूषणम्।
किसी व्यसन में पड़ना ही नहीं चाहिए और यदि किसी कारणवश वाग्दण्डजं च पारूष्यं क्रोधजोऽपि गणोष्टकः।।
उसे कोई व्यसन लग गया है तो तत्काल उसे मुक्त होने का अठारह व्यसन में दस व्यसन कामज है और आठ व्यसन प्रयास करना चाहिए। किन्तु व्यक्ति ऐसा न करते हुए उसमें और कोधज हैं। जो इस प्रकार है
अधिक डूबता चला जाता है। उसकी आँख तो तब खलती है दस कामज व्यसन - (१) मुगया, (२) अक्ष (जआ). (३) जब उसे अपने पतन का गर्त दिखाई देता है। अब हम जिन सात दिन का शयन, (४) परनिन्दा, (५) परस्त्री सेवन, (६) मद,
व्यसनों का नामोल्लेख ऊपर कर चुके हैं, उनके विषय में (७) नृत्य सभा, (८) गीत सभा, (९) वाद्य की महफिल और
संक्षिप्त रूप में विचार करेंगे। (१०) व्यर्थ भटकना।
जुआ - जुआ का जन्म कैसे हुआ? यह कहना तो कठिन है आठ क्रोधज व्यसन - (१) चुगली खाना, (२) अति साहस किन्तु अनुमान यह लगाया जा
किन्तु अनुमान यह लगाया जा सकता है कि बिना किसी श्रम करना, (३) द्रोह करना, (४) ईर्ष्या, (५) असया. (६) अर्थ के सम्पत्ति प्राप्त करने की लालसा से इसका जन्म हुआ होगा। दोष, (७) वाणी से दण्ड और कठोर वचन
अथवा मनोरंजन के लिए खेले जाने वाले किसी खेल के माध्यम
से इसकी उत्पत्ति हुई होगी। कुछ भी हो, यह एक ऐसा व्यसन है __इस संबंध में जैन साहित्य का आलोडन करते हैं तो पाते
कि जिसे भी एक बार इसकी आदत या यों कहें लत लग जाती हैं कि जैनाचार्य मुख्य रूप से सात प्रकार के व्यसन बताते हैं।
है वह इसमें और अधिक डूबता चला जाता है। हारने के बाद यथा
भी व्यक्ति दाँव पर दाँव लगाता चला जाता है। अपना सब कुछ द्यूतं च मांसं च सुरा च वेश्या पापद्धि चौर्य परदारसेवा।
खो जाने के पश्चात् वह चिंताग्रस्त हो जाता है। ऋण लेकर भी एतानि सप्तव्यसनानि लोके घोरातिघोरं नरकं नयन्ति।
जुए पर दाँव लगाता है। उसकी आशा मृग मरीचिका ही सिद्ध सात व्यसन इस प्रकार हैं
होती है। धन प्राप्त करने की लालसा में वह दाँव पर दाँव (१) जुआ, (२) मांसाहार, (३) मद्यपान, (४) वेश्यागमन, लगाकर अपने आपको बर्बाद कर लेता है। (५) शिकार, (६) चोरी और (७) पर स्त्रीगमन। यदि हम
हमारे ऋषिमुनियों ने जुए को त्याज्य माना है। तभी तो सक्ष्मता से विचार करें तो जितने भी व्यसन हैं, वे सभी इन सात
ऋग्वेद में कहा गया है- अक्षर्मा दिव्यः। (१०.३४.१३) व्यसनों में आ जाते हैं।
सूत्रकृतांग सूत्र ९/१० में चौपड़ अथवा शतरंज के रूप में ___ वर्तमान युग में कुछ नवीन प्रवृत्तियां पाई जाती हैं। जैसे
जुआ खेलना मना किया गया है। जए को लोभ का बालक भी अश्लील साहित्य पढ़ना, अश्लील चलचित्र देखना, तम्बाकू कहा गया है और यह कहा गया है कि यह फिजूलखर्ची का सेवन, गुटखे के रूप में या बीड़ी, सिगरेट के रूप में, विभिन्न
माता-पिता है। जुआ किसी भी रूप में खेला जावे, वह असाध्य प्रकार के गुटखों का सेवन आदि। ये सब भी व्यसनों की भाँति
रोग है। यदि इतिहास के पृष्ठ पलटेंगे तो हमें ज्ञात हो जाएगा कि ही हानिप्रद है। प्रारंभ में तो व्यसन सामान्य से लगते हैं, किन्तु
जुआ प्राचीन काल में भी प्रचलित था और न केवल सामान्य आगे चलकर ये उग्र रूप धारण कर लेते हैं। व्यक्ति को इनकी
जन पतन के गर्त में समा चुके हैं। महाभारत का उदाहरण हमारे बुराई उस समय दिखाई देती है, जब वह कैंसर अथवा व्यसन ।
सामने है। युधिष्ठिर ने अंधा होकर अपनी पत्नी द्रौपदी तक को जन्य किसी भयंकर रोग से ग्रस्त हो जाता है और उपचार कराने
दाँव पर लगा दिया था। इससे अधिक व्यक्ति का पतन और
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- यतीन्द्रसूरि स्मारक ग्रन्थ - आधुनिक सन्दर्भ में जैनधर्म - क्या हो सकता है। जुए के कारण राजा नल और दमयंती की जो स्थानांग सूत्र में भी मांसाहारी को नरकगामी बताया गया दुर्गति हुई वह किसी से छिपी हुई नहीं है। प्राचीन काल में एक है। इसी प्रकार आचार्य मनु के अनुसार-मांस का अर्थ ही है, मिथ्या धारणा यह थी कि यदि कोई जुआ खेलने के लिए जिसका मैं मांस खा रहा हूं वह अगले जन्म में मुझे खाएगा। यदि आह्वान करता है तो उसे ठुकराना नहीं चाहिए वरन् उसका मांस को मां और स रूप में लिखे तो उसका अर्थ होता है मुझे निमंत्रण स्वीकार कर जुआ खेलना चाहिए।
खाएगा। आचार्य मनु का कथन इस प्रकार हैवर्तमान समय में जुए का प्रचलन अनेक रूपों में है। मांसभक्षयिताऽमुत्र, तस्य मांसमिहाझ्यहम्। अधिकारी वर्ग क्लबों में जुआ खेलते हैं। धनाढ्य अपने तरीके
र एतन्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः।मनुस्मृति 5-55॥ से खेलते हैं और गरीब अपने तरीके से। कहने का तात्पर्य यह है कई लोग मांसाहार में अधिक पौष्टक तत्त्वों की बात कर कि जैसे-जैसे सभ्यता और संस्कृति का विकास हो रहा है, इसको खाने का समर्थन करते हैं, किन्तु यह उनकी मिथ्या वैसे-वैसे इस व्यसन का भी विकास हो रहा है। व्यक्ति स्वयं ही धारणा है वर्तमान अनुसंधानों से यह निश्चित हो गया है कि अपने विनाश के द्वार खोल रहा है। इस विषय पर और भी बहत मांसाहार से अधिक पौष्टिक तत्त्व शाकाहारी भोजन में है। साथ कुछ लिखा जा सकता है, किन्तु यहां इतना ही कहना पर्याप्त ही यह भी तथ्य सामने आया है कि मांसाहारी भोजन से अनेक होगा कि समझदारी इसी में है कि जुए को अपनाया ही नहीं असाध्य रोग भी उत्पन्न होते हैं इसलिए यह सहज ही कहा जा जाए। इस व्यसन से दूर ही रहना उचित है।
सकता है कि मांसाहार धार्मिक दृष्टि से तो त्याज्य है ही, वैज्ञानिक (२) मांसाहार - महाभारत में कहा गया है कि मांस न पेड़ पर
दृष्टि से भी इसका सेवन सदैव हानिप्रद है। इसलिए मांसाहार
कभी भी नहीं करना चाहिये। मांसाहार सामाजिक नैतिक, धार्मिक लगता है और न भूमि में उत्पन्न होता है। यह प्राणिजन्य है, इसलिए त्याज्य है। वास्तविकता तो यह है कि यह भी एक ।
आर्थिक वैज्ञानिक आदि सभी दृष्टि से अनुपयुक्त है और स्वास्थ्य व्यसन ही है। एक बार जिस व्यक्ति को इसकी चाट लग जाती
की दृष्टि से भी उपयुक्त नहीं है। है, वह इसके पीछे-पीछे लगा रहता है। व्यक्ति यह भूल जाता है (३) मद्यपान- शराब क्या है? सड़ा हुआ पानी, जिस पदार्थ से कि बिना हिंसा किए, किसी प्राणी के प्राण लिए मांस उपलब्ध शराब अर्थात् मदिरा बनायी जाती है उसे पहले सड़ाया जाता है। नहीं हो सकता। आचार्य मनु के शब्दों में जीवों की हिंसा के उसके पश्चात् मदिरा बनती है इसमें हिंसा भी है, मद्यपान एक बिना मांस उपलब्ध नहीं होता और जीवों का वध कभी स्वर्ग ऐसा व्यसन है। जो व्यक्ति की विवेक बुद्धि को नष्ट कर देता है। प्रदान नहीं करता
जिस पदार्थ के सेवन से व्यक्ति की मानसिक स्थिति में परिवर्तन नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसा, मांसमुत्पद्यते क्वचित्।
आता है, वह मद्यपान के अंतर्गत आता है। इस दृष्टि से इसके न च प्राणिवधः स्वर्ग्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।।48।। अनेक रूप हो सकते हैं। हम यहाँ उन सबका वर्णन नहीं करेंगे। समुत्पत्तिं च मांसस्य बधबन्धौ च देहिनाम्।
मद्यपान से शरीर तो नष्ट होता ही है, मद्यपान करने वाले का धन प्रसमीक्ष्य निवर्तेत सर्वमांसस्य भक्षणात्।।49॥
भी बरबाद होता है और घर का चैन भी बरबाद होता है। इसके जब जीव के वध के बिना मांस प्राप्त नहीं हो सकता तो विषय में कहा गया है कि मदिरा का प्रथम घूट मानव का मूर्ख फिर इसका त्याग करना ही उचित है। कारण कि हिंसाजन्य बनाती है, द्वितीय चूंट पागल बनाती है, तृतीय चूंट से वह दानव समस्त पाप भी लगते हैं, जो हिंसा करता है, उसे स्वर्ग मिल नहीं की तरह कार्य करने लगता है और चौथी बूंट से वह मुर्दे की सकता। हिंसक की दुर्गति ही होती है। आचार्य हेमचंद्र ने हिंसा भाँति भूमि पर लुढ़क पड़ता है मदिरा पान करने वाले वाला के फल बताते हुए लिखा है कि पंगपन कोढीपन. लला आदि व्यक्ति समझता है कि वह मदिरा पी रहा है। किन्तु वास्तविकता हिंसा के ही फल हैं
इसके विपरीत यह है कि मदिरा व्यक्ति को पीती है। जब व्यक्ति पंगु-कुष्ठि-कुणित्वादि दृष्टवा हिंसाफलं सुधीः।
मदिरापान का आदी हो जाता है तो वह धीरे-धीरे अनेक रोगों से निरागस्त्र सजन्तूनां हिंसां संकल्पतस्तजेत॥ योगशास्त्र 2/19॥ ग्रस्त हो जाता है और अंत में मृत्यु भी प्राप्त हो सकती है इस
अर्थ में मदिरा धीमा विष भी है। amodeodidroidiwordwordwordwordwordworrordirado- ६१160mirroriabbrdwordromowordrowomdivoritorionirombord
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- यतीन्द्रसूरिस्मारक ग्रन्थ - आधुनिक सन्दर्भ में जैनधर्मअनेक व्यक्ति यह कहते है कि मदिरा तो टॉनिक है, विवेकः संयमो ज्ञानं, सत्यं शौचं दया क्षमा। इससे शारीरिक थकान मिटती है। सुस्ती दूर होती है और चुस्ती मद्यात् प्रलीयते सर्वं तृण्यां वह्निकणादिव।। आती है, किन्तु यह उनकी मिथ्या धारणा है। मदिरा पान करने
योग शास्त्र ३/१६ वाले व्यक्ति की शारीरिक शक्ति घट जाती है और वह शीघ्र ही तात्पर्य यह है कि आग की नन्हीं सी चिनगारी विशालकाय थक भी जाता है। मदिरा पान से पेट की ज्ञानवाही और क्रियावाही घास के ढेर को नष्ट कर देती है। वैसे ही मदिरापान से विवेक, नाडियाँ निश्चेष्ट हो जाती है, जिससे भूख का भान नहीं रहता। संयम, ज्ञान, सत्य, शौच, क्षमा आदि सभी सदगण नष्ट हो जाते हैं। लाभ की अपेक्षा हानि होती है। पाचन संस्थान विकृत हो जाता है
(४) वेश्यागमन- चिंतनकारों ने वेश्यागमन को कुपथागामी नशा उतरने के पश्चात् शरीर का अंग अंग शिथिल हो जाता है,
व्यसन की संज्ञा दी है। यह एक ऐसा चमकीला, लुभावना और इसलिए मद्यपान त्याज्य है।. किसी भी स्थिति में उचित नहीं
आकर्षक व्यसन है, जो जीवन को न केवल निंदनीय बनाता है, कहा जा सकता। आचार्य हरिभद्र ने मद्यपान के सोलह दोष इस
वरन् बरबाद भी कर देता है। वेश्या अपने शिकार को फंसाने के प्रकार बताये हैं
लिए कपट व्यवहार करती है। अपनी निर्लज्ज भाव भंगिमा से (१) शरीर विद्रूप होना (२) शरीर में विविध रोग उत्पन्न होना उसे अपने जाल में फँसाती है, वह इतना अपनत्व प्रदर्शित (३) परिवार में तिरस्कृत होना (४) समय पर कार्य करने की करती है कि वेश्यागामी यह समझ लेता है कि वह उसके प्रति क्षमता न होना (५) अन्तर्मानस में द्वेष उत्पन्न होना (६) ज्ञान पर्ण रूप से समर्पित है। परिणामस्वरूप वेश्यागामी अपना तन्तुओँ का धुंधला हो जाना, (७) स्मृति का लोप हो जाना (८) सर्वस्व अर्थात यौवन बल स्वास्थ्य धन आदि सब कुछ उस पर बद्धि भ्रष्ट होना (९) सज्जनों से संपर्क समाप्त हो जाना (१०) लटा देता है और उसकी आँख तो जब खलती है तब वेश्यागामी वाणी में कठोरता आना (११) नीच कुलोत्पन्न व्यक्तियों से की जेब खाली हो जाती है और वेश्या उसे दत्कार कर अपने कोठे संपर्क (१२) कुलहीनता, (१३) शक्ति ह्रास (१४) धर्म, (१५) से निकाल देती है, एक वेश्या वेश्यागामी को दर दर का भिखारी अर्थ६ काम इन तीनों का नाश होना।
___ बना देती है। शारीरिक दृष्टि से भी वह इतना क्षीण हो चुका होता है महाकवि कालिदास ने जब एक मदिरा विक्रेता से पछा कि कुछ कर सकने का सामर्थ्य उसमें शेष नहीं रहता है। कि उसके पात्र में क्या है तो उसने उत्तर दिया कि उसके पात्र में भर्तहरि ने वेश्या के संबंध में लिखा हैआठ दुर्गुण हैं। (१) मस्ती, (२) पागलपन, (३) कलह (४) वेश्याऽसौ मदनज्वाला रूपेन्धनसमेक्षिताओ। धृष्टता (५) बुद्धि का नाश (६) सच्चाई और योग्यता से घृणा कामिभिर्यत्र हूयन्ते यौवानाचि धनानि च।। (७) खुशी का नाश और (८) नरक का मार्ग।
इसका तात्पर्य यह है कि वेश्या कामाग्नि की ज्वाला है, उपर्युक्त दुर्गुणों से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। जो सदा रूप-ईंधन से सुसज्जित रहती है। इस रूप ईंधन से । कि मद्यपान कितना हानिप्रद है। किसी मनोवैज्ञानिक ने लिखा सजी हुई वेश्या कामाग्नि ज्वाला में सभी के यौवन धन आदि है कि मदिरापान से असंतुष्ट व्यक्ति सुख प्राप्त करने का प्रयास भस्म कर देती है। करता है, निरुत्साही व्यक्ति साहस, ढुलमुल मनोवृत्तिवाला आत्म
वेश्या आर्थिक और शारीरिक शोषण करने वाली जीती विश्वास और इसी प्रकार उदास व्यक्ति सुख की खोज करता है,
जागती प्रतिमा है वह समाज का कोढ़ है, मानवता का अभिशाप किन्तु सबको इसके विपरीत विनाश मिलता है।
है, समाज के माथे पर कलंक का काला टीका है। समस्त नारी इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि मद्यपान किसी भी जाति की लांछन है। शास्त्रों में नारी का गौरव गरिमा का चित्रण स्थिति में हितकर नहीं है। इसका सेवन विनाश के अतिरिक्त करते हुए जिन महान रूपों में चित्रित किया गया है, वैश्या नारी कुछ भी नहीं दे सकता है, इसलिए कभी भी किसी भी स्थिति में होते हुए भी नारी के उन रूपों के विपरीत रूप प्रस्तुत करने इसका उपयोग नहीं करना चाहिये। कारण यह भी है कि आचार्य वाली है। सदगणों के स्थान पर अवगणों की खान है। लज्जा को हेमचंद्र ने भी लिखा है।
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- यतीन्द्रसूरि स्मारक ग्रन्थ - आधुनिक सन्दर्भ में जैनधर्म नारी का आभूषण कहा गया है, किन्तु वेश्या का इस आभूषण __पापद्वधो तनुमद्वधोज्झितघृण। पुत्रेऽपि दुष्टाशयः। से कोई संबंध नहीं है, वह निर्लज्ज है। वेश्या के संबंध में
इसका तात्पर्य यह है कि जिस भी व्यक्ति को शिकार का कथासरित्सागर में ठीक ही कहा गया है कि वेश्याओं से स्नेह
व्यसन लग जाता है कि वह मानव प्राणीवध करने में दया को की इच्छा करना बालू से तेल निकालने के समान है।
तिजांजलि देकर हृदय को कठोर बना देता है। वह अपने पुत्र के कः प्राज्ञो वांछितस्नेहं वेश्याषु सिकतासु च। प्रति भी दया नहीं रख पाता।
वेश्या कामांध व्यक्तियों को अपने जाल में फंसाती है। आचार्य वसुनन्दी ने कहा हैकामांध व्यक्ति के संबंध में कहा गया है कि कौए को रात में महमज्जससेवी पावड पावं चिरेण जं घोरं।। दिखायी नहीं देता। चमगादड़ को दिन में दिखायी नहीं देता,
तं एयदिणे पुरिसो लहेइ पारद्धिरमणेण।. श्रावकाचार।। किन्तु कामांध को न दिन में दिखायी देता है ओर न रात में। ऐसे कामांध व्यक्ति वेश्या के चंगुल में फँसकर अपना सर्वस्व नष्ट
कहने का तात्पर्य यह है कि मधु मद्य मांस का दीर्घकाल
तक सेवन करने वाला जितने महान पाप का संचय करता है, कर देते हैं। इतना ही नहीं वेश्याएँ अनेक प्रकार की गुप्त व्याधियों से भी ग्रसित रहती है, जिसके कारण जो भी व्यक्ति
उतने सभी पापों को शिकारी एक दिन में शिकार खेलकर संचित उनके संपर्क में आता है, वह भी इन व्याधियों का शिकार हो
कर लेता है। इस कथन से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता जाता है और फिर जीवन पर्यन्त दुःख भोगता रहता है, वेश्या तो
है कि शिकार कितना भयंकर व्यसन है। यहां एक बात और शरीर की सौदागर होती है। वह धन के बदले अपना तन बेचती
सहज ही कही जा सकती है कि जो व्यक्ति अन्य प्राणियों के है। इसलिए वेश्यागमन को दुर्व्यसन माना गया है। फिर आजकल
प्राणों का हरण करता है उसके जीवन में आनंद का कोई स्थान एड्स नामक एक नया रोग भी उत्पन्न हो गया है। यह रोग
नहीं है। अर्थात् उसे आनंद उपलब्ध नहीं होता है। इसके साथ ही
एक अन्य बात यह भी है कि शिकारी शिकार करने के लिए यौनाचार के कारण होता है, इसका अभी तक कोई उपचार नहीं निकला है, इसलिए इस घातक रोग से बचने के लिए भी वेश्या ।
अनेक कठिनाइयों में फँस जाता है। उसे वन-वन भटकना पड़ता का परित्याग कर देना चाहिये। इस व्यसन से सदैव ही बचने का।
है, कई बार मार्ग भूल कर घंटों भूखा-प्यासा वन में इधर से उधर प्रयास करना चाहिये।
भटकता रहता है, और कभी कभी जिनका का वह शिकार
करने के लिए जाता है, स्वयं उनका शिकार भी बन जाता है। (५) शिकार- शिकार अर्थात् आखेट । अपने मनोरंजन
अथवा अन्य हिंसक जीवन उसे अपना लक्ष्य बना लेते हैं। वनों प्रयोजन के लिए किसी प्राणी का आखेट करना, शिकार करना में शिकार के लिए भटकते हए अनेक प्रकार के कष्ट भी सहन शिकार है। यह मनुष्य के जंगलीपन का प्रतीक है। जैन ग्रंथों में करने पडते है। इसे पापर्द्धि के कहा गया है कि जिसका तात्पर्य है पाप के द्वारा
शिकार करना किसी भी स्थिति में न्याय संगत नहीं है। प्राप्त वृद्धि।
इस वर्तमान भौतिकवादी युग में अंग श्रृंगार, फैशन, विलासिता शिकार करना वीरता का नहीं कायरता का प्रतीक है,
के लिए निरीह पशु पक्षियों का वध करना कदापि उचित नहीं क्रूरता का द्योतंक है। शिकार में शिकारी अपने आपको छिपाकर ।
कहा जा सकता। उस समस्त सामग्री पर प्रतिबंध लगना चाहिये, पशु पर अपने अस्त्र-शस्त्र का प्रहार कर उसे मारता है। इस
इस जिसमें निरीह प्राणियों के प्राणों का हरण किया जाता है। शिकार
। प्रकार छिपकर प्रहार करना कायरता की निशाना है। यदि पशु
१ पशु के पापाचार से बचना चाहिये।. पाप से बचकर अपने आपका पलटकर शिकारी पर आक्रमण कर दे तो शिकारी को प्राणों का
जीवन सुखमय बनाने का प्रयास करना चाहिये। संकट उत्पन्न हो जाता है। शिकारी के पास धर्म नाम की कोई चीज नहीं होती। वह तो पाप से अपनी आय प्राप्त करता है।
(६) चोरी- किसी वस्तु अथवा धन को उसके स्वामी से शिकारी के संबंध में कर्पूर प्रकरण में कहा गया है
पूछे बिना ले लेना चोरी हैं। यों यदि सक्ष्म परिभाषा की जाये तो
__कई बातों का उदाहरण के लिए यदि हम अपना कार्य नहीं करते రసారసాగరరరరరరmodi aa ro
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-यतीन्द्रसूरिस्मारक ग्रन्थ - आधुनिक सन्दर्भ में जैनधर्म हैं तो कामचोर कर नहीं देते हैं, तो टैक्सचोर हो जाते हैं, भगवान किसी से छिपकर अथवा स्वामी की दृष्टि बचाकर वस्तु महावीर ने कहा है
ले लेना छन्न चोरी है । जैसे सुनार देखते देखते स्वर्ण रजत चुरा अदिन्नमन्नेसु य णो गहेज्जा। सूत्रकृतांग। १०/२
लेता है वह नजर चोरी है। ऊपर से ठगना, झूठा विज्ञापन करने
धन कमाना ठगी चोरी है। ताला गाँठ आदि खोलकर वस्तु या इसका तात्पर्य यह है कि बिना दी हुई किसी भी वस्तु को
धन ले जाना उद्घाटक चोरी कहलाती है। किसी को डरा धमका ग्रहण न करो। भगवान का तो यह भी कहना है कि दाँत कुरेदने
कर उसे लूटे लेना बलात्, चोरी है। किसी पर आक्रमण करके, के लिए एक तिनका भी न लो।
उसके घर या दुकान में प्रवेश कर धन सम्पत्ति ले जाना घातक दन्तसोहणमाइस्स अदत्तस्स विवज्जंण। उत्तराध्ययन १९/२८ चोरी कहलाती है। आजकल ये सभी प्रकार की चोरियाँ खूब हो
की
सभी समोरीका निशा रही है, बल्कि अंतिम तीन प्रकार की चोरियों का तो बोलबाला है। ही किया है। प्रश्न यह उपस्थित होता है कि व्यक्ति चोरी क्यों इनके अतिरिक्त वर्तमान युग में कुछ सभ्य प्रकार की करता है। पहली बात तो यह है कि वह अपनी आवश्यकता की चोरियाँ भी हो रही है। जैसे कम बोलना और अधिक मूल्य पर्ति के लिए करता है। इससे बड़ी और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि लेना, मिलावट करना, घुस-घोरी, झूठे दस्तावेजों के माध्यम से चोरी करने का कारण लोभ है उत्तराध्ययन सूत्र में कहा गया है। सम्पत्ति हड़पना। पक्षपात करना, अर्थ चोरी के साथ-साथ सूवे अतित्ते ये परिग्गहे य सत्तोवसत्तो न उवेइ तुढेिं।
आजकल नाम की चोरी, साहित्य की चोरी उपकार की चोरी, अतुट्ठिदोसेण दुही परस्स लोभाविले आययई अदत्तं।। ३२/२९ आदि भी खूब हो रही हैं। विवेक सम्पन्न व्यक्ति को इस प्रकार
की चोरियों से बचना चाहिये। तात्पर्य यह है कि रूप में अतप्त तथा परिग्रह में आसक्त । है। उस और उपसक्त (अत्यन्त आसक्त) व्यक्ति सन्तोष को चोरी मनुष्य के चरित्र को नष्ट करती है, उसके साहस और प्राप्त नहीं होता। वह असंतोष के दोष से दुःखी एक लोभ से कर्तव्य परायणता को समाप्त करती है चोरी व्यक्ति में हीन व्याकुल व्यक्ति दूसरे की अदत्त (नहीं दी हुई) वस्त ग्रहण करता भावना का संचार करती है चोरी करना भी पाप की श्रेणी में आता (चुराता) है।
है। अतः सदैव इससे बचने के लिए प्रयास करना चाहिये। इससे
तभी बचा जा सकता है कि जब मन में आए लोभ से बचा जाये। इसे चोरी का आभ्यन्तर कारण कह सकते हैं।
अतः लोभ को भी अपने पास फटकने नहीं देना चाहिये। चोरी के बाह्य कारण निम्नानुसार बताये जाते हैं
(७) परस्त्री सेवन- कामवासना एक ऐसी ज्वाला है, जो (१) बेकारी (२) दरिद्रता (३) फिजूलखर्ची (४) यशः जैसे-जैसे भोग में अभिवृद्धि होती है, वैसे-वैसे और भड़कती कीर्ति की लालसा (५) स्वभाव या कुसंस्कार और
जाती है। परिणाम यह होता है कि मनुष्य की सम्पूर्ण सुखशांति (६) अराजकता।
उस ज्वाला में भस्म हो जाती है। परस्त्री गमन निंदनीय कृत्य है। संस्कारी व्यक्ति किसी भी स्थिति में चोरी ओर निकटतम परस्त्री गामी व्यक्ति अविश्वसनीय होता है। उसकी स्वयं की कार्य नहीं करेगा। वास्तविकता तो यह है कि चोरी एक असामाजिक पत्नी भी सदैव उससे नाराज रहती है। उसका मन सदैव कलुषित वर्जित कार्य है। संस्कारवान व्यक्ति इस तथ्य से भलीभाँति रहता है। उसका ध्येय एक ही रहता है। परनारी सेवन। जिस भी परिचित रहता है। इस कारण वह चोरी करना तो क्या चोरी के नारी को वह देखता है, वह उसकी ओर वासनात्मक दृष्टि से विषय में कुछ सकारात्मक विचार भी नहीं कर सकता। आकर्षित हो जाता है। वह वासनांध हो जाता है। परस्त्रीगामी प्रश्न व्याकरण सूत्र में चोरी के तीस नाम बताये गये हैं।
व्यक्ति जीवन भर असंतुष्ट बना रहता है। एक विचारक ने छह प्रकार की चोरी बतायी है। (१) छन्न चोरी विचारकों ने परस्त्रीगमन के प्रमुख कारण इस प्रकार बताये (२) नजर चोरी (३) ठगी करके चोरी (४) उद्घाटक चोरी हैं। (५) बलात् चोरी और (६) घातक चोरी।। androidrodrsairdriadrianitariandidreddinidad ६४Karinitarinirodaradirdindidroidddddddasaram
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________________ - यतीन्द्रसूरि स्मारक ग्रन्थ - आधुनिक सन्दर्भ में जैनधर्म(१) क्षणिक आवेश (2) अज्ञानता (3) बुरी संगित (4) उसका उदाहरण अन्यत्र मिलना कठिन है धर्मपत्नी के संबंध में पति के परस्त्रीगमन को देखकर उसकी पत्नी भी पथभ्रष्ट होती है कहा गया है कि वह मंत्री की भांति (5) विकृत साहित्य का पढ़ना (6) धनमद के कारण, (7) सेवा करती है। धार्मिक कार्यों में पति को प्रेरणा प्रदान करती है। धार्मिक अंधविश्वास (8) सहशिक्षा (9) अश्लील चलचित्र, पृथ्वी की भाँति क्षमाशील होती है। माता के समान स्नेह से ह और (11) मादक पदार्थों का सेवन। भोजन कराती है। ये सब गुण पर स्त्री में कहाँ मिलते हैं? यहाँ एक बात स्पष्ट करना उचित प्रतीत होता है वह यह पर स्त्री से संबंध रखने में पुरुष के प्राण भी संकट में पड़ कि जिस प्रकार एक पुरुष के लिए पर स्त्री सेवन व्यसन है, ठीक जाते हैं। मानसिक अशांति बनी रहती है। मनुष्य सदैव संदेहशील उसी प्रकार एक स्त्री के लिए पर पुरुष सेवन भी व्यसन है, बना रहता है। महर्षि वाल्मीकि के अनुसार पर स्त्री से अवैध निंदनीय है। संबंध रखने जैसा कोई पाप नहीं है। ___यह बात सत्य है कि गृहस्थ कामवासना का पूर्ण रूप से परदाराभिमशत्तुि नान्यतः पापतरं महत्। वाल्मीकि रामायण३३९/३० परित्याग नहीं कर सकता। कामवासना को नियंत्रित करने के आचार्य मनु ने भी इसे (परस्त्री सेवन को) निकृष्ट कार्य लिए मनीषियों ने विवाह संस्कार का विधान किया है। विवाह माना है। समाज की नैतिक शांति, पारिवारिक प्रेम और प्रतिष्ठा को सुरक्षित नहीद्दशमनायुतयं लोके किंचित् दृश्यते। रखने का एक उपाय है। गृहस्थ को चाहिये कि वह अपनी याद्दशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम्। मनुस्मृति।। 4/341 विवाहित पत्नी में ही संतोष करके शेष सभी पर स्त्री आदि के साथ मैथुन विधि का परित्याग करे। उपासक दशांग में भी यही महाकवि कालिदास ने परस्त्रीसेवन को अनायों का कार्य कहा गया है। कहा हैसदार संतोषिलिए अवषिं सव्व मेहुण विहिं पच्चक्खाई। अनार्य:- परदारव्यवहारः अभिज्ञान शाकुन्तल। इन उदाहरणों को प्रस्तुत करने का उद्देश्य यही है कि परस्त्रीसेवन को पर स्त्री सेवन सभी दृष्टि से गलत है, हानिप्रद है। यह सभी ने अनुचित बताया है। अतः इसका परित्याग करना ही अवैध पापाचार है। धर्मपत्नी को छोड़कर जिस भी स्त्री के साथ उचित है। यदि इस ओर दृष्टि ही न जाये इसका विचार ही नहीं संबंध बनाया जाता है कि वह निंदनीय तो है ही समाज में किया जाये और स्व धर्म पत्नी में ही संतोष रखकर अपने प्रतिष्ठा के प्रतिकूल भी है। फिर धर्मपत्नी जिस प्रेम लगन और कर्तव्य की पूर्ति करते हुए धर्माराधना की जाये तो ऐसा पापाचारों निष्ठा से अपने पति का साथ निभाती है, उसका पर स्त्री में से बचा जा सकता है। अभाव होता है पर स्त्री कभी भी व्यक्ति को बीच भँवर में छोड़कर उसको धोखा दे सकती है। वह अपनी प्रतिष्ठा (इज्जत) इस निबंध में संक्षेप में सप्त व्यसनों पर विचार किया के नाम पर पुरुष को पतन के गर्त में ढकेल सकती है, सो सेवा गया है, सभी व्यसन कष्ट कर, निंदनीय पाप में वृद्धि करने वाले, धर्मपत्नी करती है, उस सेवा भावना का पर स्त्री में अभाव रहता प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने वाले हैं। अतः इनसे बचकर ही रहना है। धर्म पत्नी न केवल अपने पति की सेवा करती है, वरन पति के चाहियोयदि मनुष्य इससे बचकर जीवन यापन करता है तो माता-पिता की भी सेवा करती है। परिवार को एक सूत्र में बाँधे / उसके जीवन में सच्चरित्रता नैतिकता धार्मिक भावना का सागर रखती है। अपनी संतान के पालन पोषण में जो त्याग वह करती है, दहाड़ें मारेगा। जीवन व्यसन मुक्त रहेगा तो जीवन विकास के द्वार स्वतः खुलते चले जायेंगे। రతరతరతరతరతరతరతied గరుగురురరరరరరరరwand D:\GYANMAMAKHAND8.PMS