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सिद्धार्थकृत भोजनविधि
सं. साध्वी समयप्रज्ञाश्री
अगाउना अंकमां आपी हती लगभग तेवी ज छतां तेनाथी कंइक जुदी रचना अत्रे रजू कराय छे. श्रीवीरप्रभुना नामठवण प्रसंगे श्रीसिद्धार्थमहाराजाओ करावेला भोजनसत्कार- वर्णन करती 'सिद्धार्थकृत भोजनविधि' नामक अढारमा सैकामां रचायेल आ कृति भोजनना रसनी जेम काव्यरसथी आस्वाद्य छे. अहीं भोजनमंडप, पीरसनारी स्त्रीओ, पीरसवानो क्रम, भोजन बाद वस्त्रादिनी पहेरामणी वि. वर्णनमां लगभग बंने कृतिमां घणी बधी समानता छे. जोके, भोजनमां पीरसायेल वानगीओनुं वैविध्य भोजन करावनारना राजाशाही ठाठने छतो करे छे. जेमके - साकरमांथी बनावेला मात्र पकवानो ज २८ प्रकारनो छे. ज्यारे मात्र 'शालि'मां ज २० प्रकारनी विविधता छे. शाक-राईता ने भाजी मळीने वळी २३ जातनुं वैविध्य धरावे छे. ११ जातना लाडू अने ४ प्रकारना पाक तेना वैविध्य माटे दाद मांगी ले तेवा छे. भोजनना वैविध्यनी साथोसाथ कविओ कृतिनुं वैशिष्ट्य पण जाळववानो प्रयत्न कर्यो छे. शब्दोना प्रासानुप्रास उपरांत वच्चे-वच्चे ४ श्लोको पण बहु मझाना छे. लाडूनी यादीमां मूकेला 'सिंहकेसरिया'नी पाकविधि बतावतो श्लोक सघळा लाडूमां सिंहकेसरियानी अद्वितीयतानी साक्षी पूरे छे. ज्यारे लापसी अने वडानी विधि वर्णवता श्लोक पण सुंदर छे.
दाळनी बाबते बंने कृतिओमां जोतां लागे के, तुवेरनी दाळ ओ गुजरातनी-गुजरातीओनी खास वानगी पहेलेथी ज छे. खाजानी मोटाई माटे एक मझानी कल्पना पंक्ति मूकी छे. 'जिस्यां हुइ आवास तणां छाझां'. सात पडवाळा खाजा पर खांडनुं पड एवी होशियारीथी चढावायुं छे जाणे के घर परनां छजां !
छेल्ले, पीवा माटेना जे पाणी पीरसाया छे तेनी स्वच्छता माटे 'स्वच्छं सज्जनचित्तवत्' अने मधुरता माटे 'बालालिंगनवत्' विशेषणो वापरीने तो कविओ कमाल करी दीधी छे. आ श्लोक सुभाषितग्रन्थोमां प्रसिद्ध छे.
___ भोजननी वानगीओनी विविधता वर्णवीने मोजमां आवी गयेला कवि बोली ऊठ्या छे के 'घणू सूं? स्वर्गना देवता पिण खावाने टलवले' । एक
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तो सिद्धार्थ महाराजाने आंगणे निमन्त्रण अने साथे प्रभुनुं नामकरण, पछी शुं बाकी रहे ? अने अहीं कदाच कोईने कविनी, वातमां अतिशयोक्ति लागे ने मात्र कविकल्लोल गणीने वातने हसी न काढे ते माटे कवि स्वयं एक खुलासो आपे छे के, 'जे ए सर्व प्रभुने पुण्ये थाए... इंद्र प्रभुनी भक्ति करे तिहां किम न होइं?' जो के, उपर पण भोजनबाद पहेरामणीनं वर्णन छे त्यां पण कविओ 'पूर्वे वृष्टि थइ छे ते' - ओम जणावीने आ वातनी पुष्टि करी छे.
छेल्ले आ कृतिनी रचना ते वखते श्री द्राफा (?) शहेरमा बिराजेला पं. नेणचंद्रजीओ सं. १८४०नी भादरवा सुद चतुर्दशीना रोज करी छे ए वातनो उल्लेख छे. पं. नेणचंद्रजी अंगे कोई विशेष जाणकारी नथी. तेमज 'द्राफा' एटले कयुं नगर ? ते पण समजायुं नथी.
आखी भोजनविधि' पूर्ण थया बाद 'वस्त्रनामानि' - अलग नानो लेख छे.
सिद्धार्थकृत भोजनविधि हवे इहां राजा सिद्धार्थ जे ते; पुत्रनुं श्रीवर्धमानकुमर एहवं गुणनिःप्पन नाम देवा निमित्ते स्वजन वर्गने जिमाडे, तेह भणी भोजनविधि लिख्यते ॥
विउलं असणपाणमिति सकलज्ञाति-क्षत्रियाणां भोजनपूर्वसत्कारःमांड्यो उत्तंग तोरण मांडणो, तुरत नवो वेसिवाने आंगणो । ते तो नीलरतनतणो, तेहने वखाणीइं सुं घणो ॥ तेहमां भला चंद्रूआ बंधाया, पछे कुंकुमना छडा देवाया । मोतीतणा चोक पूराया, तेमाहिं वारुं पाट पथराया ॥ तिहां सखरा मांड्या आसण, जिहां बेसतां किसी विमासण । आगे मूकी सोवन आडणी, ते तो किम जाए छांडणी ॥ उपरि मूक्या सोवनथाल, ते तो सोहे घणुं विसाल । विचमे आली चोसठि वाटकी, लिगार नही जाति काटकी ॥ पछे गंगोदक दीधां, थाल कचोला ने हाथ पवित्र कीधां । तिहां सघली पांति बेठी दृष्टि करीने हेठी । तेहवे प्रीसणहारी पेठी, ते सहुने मनि बेठी ।
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ते केहवी – सोल शृंगार सज्या, बीजा काम तज्यां ।
हाथनी रुडी, बिहुं बांहे खलके चूडी । लघु लाघवीनी कला, जेणे मन कीधा मोकला । चित्तनी उदार, हाथनी घणुं दातार ।
धसमसती आवी, जिमनाराने मन भावी । हिवे जे प्रीसे ते कहे छे - काव्य : केला-खांड-खजूर-साकरघणी-नारिंग-जंभीरडां
आंबा-चींभड-तूरदालिसुरहं गोकं प्रधानं घ्रतं । लाडू-लावण-लापसी ललवती, चारोलियं भेलितं,
श्रीसिद्धार्थमहानरेन्द्रभुवने भुङ्क्ते जनः स्वेच्छया ॥१॥ अर्थ : हिवे पहिली फलहुली प्रीसे सहुनां हीयां हीसे ।
पाकां आंबानी कातली, ते बूरा खांडस्युं भरी ने वली पातली । पाकां भला केला, ते वली खांडस्युं कीधां भेलां । सखरा करणां, ते वली पीलां वरणां । नीला नारंगा, रंगे दीसता सुरंगा ।। पाकी नीली राएणि, प्रीसी भली भाएणि । वली आपे दाडिमनी कली, जे खातां पोहोचे मनरली । निमजां ने अखोड, जिमतां पहोचे मनकोड । द्राख ने बदाम, केई कागदी केई स्याम । सिलेमी खारिक ने खजूर, ते प्रीस्यां भरपूर । नालीयरनी गिरी, मालवी गुलसुं भरी । लींबू खाटा ने मीठां, एहवां तो कहीइं न दीठां । चारोली ने पिस्तां, सहुको जिमे हस्तां । वली सेलडी ने सदाफल, ते पिण प्रीस्यां परिघल ।
हिवे पकवान आणे, ते केहवां वखाणे । घेवर, गुंदवडां, पतासां, साकरीयाचिणा, साबूडी(णी), जलेबी, मुरकी, हेसमी, अमृती, घारडी, मेसूय, पेढा, दहिथरां, खूरमां, मोतीचूर, फीणा, वरसोलां,
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छाब्बडी सूत्रफीणी नाख्वा(?) चीनी बरफी, हलवो, सक्करपारा, पानडीयासाटा, गुलपापडी, तिलपापडी, गगनगांठीआ, चण्यानो मेसूप इत्यादि पकवान प्रीस्यां । हवे फरसाण आवे-सूखडी बोलावे । चण्याना गाठीआ लासा गांठीआं कावरीआ सेव, चण्यानी - मगनी पापडपूरी, गहुं-चण्यानी पूरी, चोपडां, फाफडा, चण्या तल्या, मग तल्या, ओलीया तल्या, चण्यानी दाल, मगनी दाल, अडदनी दाल, मठनी दालि - तेलसुं वघारी, घणां मरी-हलद्रसुं भरी । तदनंतर – सातपुडा खाजां, चिहूं खूणे साजा ।
खांडभर्यां ताजां, जिस्यां हुइ आवास तणां छाजां ॥ तदनंतर प्रीस्यां लाडू, जिस्या अमृतभर्या गाडूं ।
घृतसूं तल्या, खांडसूं मिल्या ॥
अति स्थूल, अति वाटला, अति उजला, अत्यंत सूकमाल, एलची दाणे वास्या ।
कौण-कौण ? तेहनां नाम, जिमतां मन न रहे ठांम ।
एहवा- मोतैया लाडू, सेवैया लाडू, दलीया लाडू, मगीया लाडू, अडदीया लाडू, कसमसीया लाडू, लाखणसाइ, करणासाइ लाडू, ओषधीया लाडू, चूरमाना लाडू, सिंघकेशरीआ लाडू - गाथा : -
चउसट्ठिकुसुमरसो, अट्ठारसरायदव्वसंजुत्तो । सोलससुगंधजुत्तो, नवबीए सिंघकेसरीओ ॥१॥ इस्या सिंघकेशरी प्रमुख लाडू प्रीस्या ।
हिवे किस्या पाक प्रीस्या ? एलचीपाक, कैरीपाक ते मुरबो, नालीयरपाक, दूधपाक, गूदपाक, गूलाबपाक, केलांपाक, जावंत्रीपाक, खजूरपाक ।
तदनंतर अथाणानी जाति । केरी,लींबू, केरडा, सेरडा, बदाम, आदू, नीली हलद्रमापरवती राइ, गिरमर मरी, सफलजल, कोठीबडां, अवेडां, करमदां, आमलां, बीली इत्यादिक अथाणां आप्यां ।
पछे पातली सेव, प्रीसी रुडी टेव । मीठी-मोली बूंऊ ल्यावे, जे जिमतां हर्ष थावे ॥ पछे मालपूडा ने लापसी, सहुको जिमे हसी ॥
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काव्य
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सूक्ष्मं गोधूमचूर्णं, घृत - गुडसहितं नालिकेरस्य खंड
- खर्जूर- सूंठी-तज - मरिचजुतं, एलची नागपुष्पम् ।
द्राक्षा
पक्वा (पक्त्वा) लोहे कढाहे टलविटलतू (तनू ? ) पावके मन्दकान्तौ, धन्या हेमन्तकाले प्रचूरघृतयुता भुञ्ज्यते लापनथी (श्रीः) ॥२॥ एहवी लापसी प्रीसी ।
हिवे वडां आवे, ते तो सहुने भावे ।
हिंग्वा जीरैर्मरीचैर्लवणपटुतरै राईकै: पूर्णगर्भ
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१स्निग्धः स्वादः सुगंध परिमलबहुल: कोमल: कुंकुमाभः । क्षिप्तो दन्तान्तराले मुरुमुरु कुरुते व्यक्तशब्दो यथा स्यात् धन्यानां वै कपोले प्रविशति वटकः कान्तया प्रेमदत्तः ॥२॥ मरीयालावडां, तल्यांवडां, कोरांवडां, कांजीवडां, घोलवडां, मगनी दालिनां वडां, उडदनी दालिनां वडां, केलानां वडां, मेथीनां वडां, आदूनां वडां, वैताकनां वडां,
घणे झोले भीनां घणे तेले सीनां ।
मरीना घणा चमत्कार, काने थाए झणत्कार ।
अत्यंत सुकुमाल, दीसतां विशाल ॥
हाथे लीधां उछले, मुखें घाल्यां तुरत गले । घणूं सूं ? स्वर्गना देवता ते पिण खावानें टलवले ॥
वली पायड पूनिमचंद, ते खांता होइ आनंद ।
हवे प्रीसी शालि, ते जिमी विचाली ॥ कण-कण ? ते भेद, जे सांभलतां उपजे उमेद ॥
सुगंध शालि, स्वर्ण शालि, बेरडी शाल, धोली शालि, राती शालि, महाशाल, पीलि शालि, शुधि शाल, कौमुदी शालि, मंजरी शाल, संसरी शाल, कुंकणी शालि, देवजीरी शाल, दुग्ध शाल, रायभोग शालि, कलीया शाल, कस्तुरी शाल, सांठी शाल, अखंड शाल, कल्प शाल । अखंड चोखा निबली स्त्रीइं खांड्या, सबली स्त्रीइं छड्या, हलवे हाथे सोह्या ( ध्या?) नमणी निजरे जोया,
१. सुस्निग्धस्नेहपक । टि. प्रतौ ।
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अनुसन्धान-५५
फूटरी स्त्रीइं धोया, चतुर स्त्रीइं वीण्या, उत्तम स्त्रीइं ओर्या, सुजाण स्त्रीइं उत(ता)र्या, एहवा आखा अणीआला सुगंध फरहरो सरस सुकमाल एहवा कूर प्रीस्या ।
हिवे दालि आवे, ते केहवी लावे ?
मंडोरा मगनी दालि, काबिली चिण्यानी दालि, गुजराती तूअरिनी दालि, झालरिनी दालि, मठनी दालि, वरणें पीली परिणामे शीयली ।
__ वली परिघल घी प्रीसे, ते केही भांते दीसे ? गायनां घीय, महिषीनां घीय, आजूनां ताव्या, मंजीष्टवरणां घी, सुरहां घी नाकें पीए एहवा घी प्रीस्या ।
हिवे विचे पोली प्रीसे, ते दीठे मन हीसे । आछी पोली, घीमांहि झबोली । फूंकनी मारी आकाशे जाये, एकवीसनो एक कोलीओ थाए । एहवी पोली प्रीसी ।
हिवे शाक आवे, ते सहुने भावे । कारेलां, कोचला, टीडोरांनां शाक, डोडीनां शाक, चीभडाना शाक, केलानां शाक, आरीआं-तुरीआंना शाक, मतीरानां शाक, वेगणनां शाक, घ्रतकालाना शाक, गुआरफलीनां, चोलाफलीना, सरघूआनी फलीनां ।
राइतां - सांगरिना राइतां, मरिच नीलीनां राइतां, नीलीपीपरिनां राइतां, खारेकद्राखनां राइतां, सेरडानां राइतां, मूलाफलीनां राइतां ।
हिवे भाजी आवे, ते सहुने मन भावे ।
सरसवनी भाजी, राइनी भाजी, सूआनी भाजी, मेथीनी भाजी, तांजलजानी भाजी इत्यादि ।
सर्व शाक ते खाटां खारां, गल्यां,तल्यां, वघार्यां, फुकार्यां, छमक्यार्यां, कलकलतां, फलफलतां, बलबलतां, सडसडतां, चमचमतां, छमछमतां, चूचूतां । राइतां हीगाला हलदीयां तीखां तमतमां कडूआं कसाइलां सरडकीआं फरडकीआं करडकीयां चाटणां चावणां लीबूरसे सहित । वली खांडमी आवे, तली काचरी
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ल्यावे । वडी भावे । घेसवडी, उबका वडी, सीरावडी, हलद सों जरद । यथा -
आछे नाह्न केरके चूणे चोखे छमकारे चूणे आछे से अथाणे घणे ओर भी अमोल है। चीरडी षडी रडी सीरावडी पूडी हरद आछे भुंजीआंको झोर हे । सांगरी निरोग फोगराइं सेलरांको योग, भाजी भांत भांतिकी मेलीबूकोनि चोर हे, एकली मिठाई तो धिठाइ कहे धर्मसीह
सालणेके जुवो लावा केसो अमोल है ॥१॥ इत्यादि शाक जिहां जोईई तीहां तेहवा प्रीस्या । हवे पलेव प्रीसे, ते केहवी दीसे ।
चोखानी पलेव, उडदनी पलेव, चोलानी पलेव, चिण्यानी पलेव, हलदीया पलेव, पिप्पलीया पलेव, सुंठीया पलेव, इत्यादि पलेव पण प्रीसी। हिवे भोजन विचे पीवानां पाणी आणे, ते केहवा ? वखाणे । यत- स्वच्छं सज्जनचित्तवल्लघुतरं, दीनातिवच्छीतलं,
बालालिङ्गनवत् प्रकाममधुरं तस्यैव संजल्पवत् । एलोशीर-लवङ्ग-चन्दनलसत्कर्पूरकस्तूरिका,
केतक्युद्यु(द्य)तपाटलासुरभितं पानीयमानीयताम् ॥१॥ साकर सरिखां पाणी, गंगोदक पांणी, कपूरवास्यां पाणी, एलचीवास्यां पाणी, शीतल पांणी आप्यां ।
पछे सूखडी-कूर-दालि जिम्यानंतर, हिवे दहीना घोलवा आणे, ते केहवा वखाणे । यत - वटकमंडक मोदिक लापसी, घृत सपूरण चूरण इंडरी;
कलमशालि तणा नव तंदुला, सुलवणा महिषीदधिसंयुता ॥४॥ गायनां दही, भेसना दही, सतरां दही काठां जाम्यां, मधुरां धाम्यां सखरां, सजीरालां, सलवणां ।
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जाडां घोल तेहना भर्या कचोल ।
चोखा साथे जिमतां घणा थया रंगरोल ।। हिवे चलूनां पाणी आवे, ते केहवा ल्यावे -
केवडे वास्या पाणी, काथे वास्यां पाणी, सुगंध वास्या पांणी, वाले वास्या पाणी । सुवन्न झारीइं पाणी भर्या, तिणसुं चलु कीधां ।
पछे मुखवास दीधां, ते सहुई लीधां ।
पांनना बीडां, वांकडी सोपारी, चीकणी सोपारी, नेवरी रोठी सोपारी, काली सोपारी, कपूर, केशर, एलची, लविंग, जायफल, जावित्री, तज, तमालपत्र, चिणकबाब, खेरसार, सूआ, विरहाली इत्यादि मुखवास दीधां ।
पछे सुगंधिनां विलेपन कीधां, केशरनी(ना) टीला कीधां, चूआचंदन-केशर-कस्तुरी-जवादिकना छांटणा कीधां । पछे सर्व कुटंबने पूर्वे वृष्टि थइ छे ते वस्त्र-आभूषण तेहनी पहिरावणी करी ।, चीनाशुक-हीरागल-मिसरुपटोला सूत्रेल वस्त्र रत्नकंबलादीक अनेक जाती वस्त्र, तथा वेढ, वीटी, कडा, उतरी, हार, हथोटा प्रमुख पहेरामणी कीधी । सर्व कुटंबने संतोष्यु ।
इति श्रीभोजन(ना)धिकार समाप्त ॥
इहां कोइ कहेस्ये जे ए तो कविकिल्लोल छ । तिवारे कहिवू जे ए सर्व प्रभुने पुण्ये थाए । देवता सर्व पूरे, जे इच्छा करे ते थाइं । आजने काले अनपूर्णाने आराधई, इच्छा भोजन पामे । तो, इंद्र प्रभुनी भक्ति करे तिहां किम न होइं? इहां संदेह राखवो नही ॥ संवत १८४० ना वर्षे भाद्रवा शुद १४ । श्रीद्राफा मधे ।
लि. पं. नेणचन्द्रेण ॥ अथ वस्त्रिनामानि ॥
देवदूष्य, देवांग, चीनांशुक, पट्टकूल, नीलनेत्र, वायंगणनेत्र, पाडूअपट्टहीर, पटसाउलि १० पंचराइआ, नर्म, खर्व, फूलपगर, जादर, नेत्रपट्ट, राजपट्ट, गजवडि, हंसवडि, कालवडि, भूअचिआं, पट्टकुल, पट्टहीर, साडी, घाटडी, चीर, कमखा, अतलस, लांहि, चादर, क्षिरोदक, खारछीनी, शणीआं गुआगरी डसणीआं, आगराइ, सडली, पटणी, मिश्रू, तास्ता, जरबाख, मुखमल,
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________________ मई 2011 67 कफइ, कथीपां, मसूजर, अतलस, अतलसकाकणीया, पामरी, कसबीवस्त्र, पीतांबर, शिरबंध, नरमो, सालु, भयरव, अटाण, खांसा श्रीसखर, श्रीबाप, मलमल, साही, दुपडा, अधोतरी, समीआणा, दुकडी भरुची, बास्ता, महिमुंदी, घटी, पटी, छायल, नारीकुंजर, साडला, छीट, चादर, चोरसादिक, रत्नकंबल इत्यादिकवस्त्रनामानि // कठिन शब्दार्थ आडणी - बाजोठ छडा - छांटणा. थापा जंभीरडां - जम्बीर-बीजोरुं निमजां - एक प्रकारनो मेवो अखोड - अखरोट सिलेमी - आखी खारेक साबूणी - रेवडी जेवी एक प्रकारनी साकरनी वानगी घारडी- घारी खूरमा - घउंना लोटमाथी बनतुं मोहनथाळ जेवू पकवान हेसमी, वरसोला - साकरनी मीठाई सफलजल - सफरजन (?) वटक: - वडा झोल - रसो-पाणी जेवो पलेव - राब (?) सालणुं - अथाj चूणे - चटणी / अथाणुं (?) मंडक - मांडा - पूडा