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प्राचीन प्रश्नव्याकरण : वर्तमान ऋषिभाषित और उत्तराध्ययन निदेशक, पार्श्वनाथ विवाश्रम शोध संस्थान, वाराणसी
___ श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों ही परम्पराएं यह स्वीकार करती हैं कि प्रश्नव्याकरण सूत्र (पण्हवागरण) जैन अंग-आगम साहित्य का दसवां अंग-ग्रन्थ है; किन्तु दिगम्बर परम्परा के अनुसार अंग-आगम साहित्य के विच्छेद (लुप्त) हो जाने के कारण वर्तमान से यह ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। श्वेताम्बर परम्परा अंग साहित्य का विच्छेद नहीं मानती है। अतः उसके उपलब्ध आगमों में प्रश्नव्याकरण नामक ग्रन्थ आज भी पाया जाता है। किन्तु समस्या यह है कि क्या इस परम्परा के वर्तमान प्रश्न व्याकरण की विषयवस्तु वही है, जिसका निर्देश आगम ग्रन्थों में है अथवा वह परिवर्तित हो चुकी है। प्रश्नव्याकरण की विषयवस्तु सम्बन्धी प्राचीन निर्देश श्वेताम्बर परम्परा के स्थानांग, समवायांग, अनुयोगद्वार एवं नन्दीसूत्र में और दिगम्बर परम्परा के राजवातिक, धवला एवं जयधवला नामक टीका ग्रन्थों में उपलब्ध है। प्रश्नव्याकरण नाम क्यों ?
'प्रश्नव्याकरण' नाम को लेकर प्राचीन टीकाकारों एवं विद्वानों में यह धारणा बन गयी थी कि जिस ग्रन्थ में प्रश्नों के समाधान किये गये हों, वह प्रश्नव्याकरण है। मेरो दृष्टि में प्रश्नव्याकरण के प्राचीन संस्करण की विषयवस्तु प्रश्नोत्तरशैली में नहीं थी और न वह प्रश्न-विद्या अर्थात् निमित्तशास्त्र से ही सम्बन्धित थी। गुरु-शिष्य सम्वाद की प्रश्नोत्तर शैली में आगम-ग्रन्थ की रचना एक परवर्ती घटना है-व्याख्या-प्रज्ञप्ति इसका प्रथम उदाहरण है। यद्यपि अंग एवं नन्दीसूत्र में यह माना गया है कि प्रश्नव्याकरण में १०८ पूछे गये, १०८ नहीं पूछे गये और १०८
और अंशतः नहीं पूछे गये प्रश्नों के उत्तर है।' किन्तु यह अवधारणा काल्पनिक ही लगती है। प्रश्नव्याकरण की प्राचीनतम विषयवस्तु प्रश्नोत्तर रूप में थी या उसमें प्रश्नों का उत्तर देने वाली विद्याओं का समावेश था-समवायांग और नन्दीसूत्र के उल्लेखों के अतिरिक्त आज इसका कोई प्रबल प्रमाण उपलब्ध नहीं है। प्राचीनकाल. में ग्रन्थों को प्रश्नों के रूप में विभाजित करने को परम्परा थो। इसका सबसे महत्त्वपूर्ण उदाहरण आपस्तम्बीय धर्मसूत्र है जिसकी विषयवस्तु को दो 'प्रश्नों में विभक्त किया है। इसके प्रथम प्रश्न में ११ पटल और द्वितीय प्रश्न में ११ पटल है। यह सम्पूर्ण ग्रन्थ प्रश्नोत्तर रूप में भी नहीं है। इसी प्रकार बौधायन धर्मसूत्र की विषयवस्तु भी प्रश्नों में विभक्त है। अतः प्रश्नोत्तर शैली में होने के कारण या प्रश्न विद्या से सम्बन्धित होने के कारण इसे प्रश्नव्याकरण नाम दिया गया था-यह मानना उचित नहीं होगा। वैसे इसका प्राचीनतम नाम 'वागरण' (व्याकरण) ही था। ऋषिभाषित में इसका इसी नाम से उल्लेख है। प्राचीनकाल में तात्त्विक व्याख्या का व्याकरण कहा जाता था। प्रश्नध्याकरणको विषयवस्तु
स्थानांग को छोड़कर प्रश्नव्याकरण की विषयवस्तु के सम्बन्ध में अन्य ग्रन्थों में जो निर्देश है, उससे वर्तमान प्रश्नव्याकरण निश्चय ही भिन्न है। यह परिवर्तन किस रूप में हुआ है, यहा विचारणीय है। यदि हम ग्रन्थों के कालक्रम को ध्यान में रखते हुए प्रश्नव्याकरण की विषयवस्तु के सम्बन्ध में उपलब्ध विवरणों को देखें, तो हमें कालक्रम में उसकी विषयवस्तु में उसमे हुए परिवर्तनों की स्पष्ट सूचना मिल जाती है :
(अ) स्थानांक-प्रश्नव्याकरण की विषयवस्तु के सम्बन्ध में प्राचीनतम उल्लेख स्थानांगसूत्र में मिलता है। इसमें प्रश्नव्याकरण की गणना दस दशाओं में की गई है तथा उसके निम्न दस अध्ययन बताये गये है-१. उपमा,
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२. संख्या, ३. ऋषिभाषित, ४. आचार्यभाषित, ५. महावीरभाषित, ६. क्षीमकप्रश्न, ७. कोमलप्रश्न, आदर्शप्रश्न आद्रकप्रश्न. ९. अंगुष्ठप्रश्न, १०. बाहुप्रश्न ।' इससे फलित होता है कि सर्वप्रथम यह दस अध्यायों का ग्रन्थ था। दस अध्यायों के ग्रन्थ दसा (दशा) कहे जाते थे।
(ब) समवायांग-स्थानांग के पश्चात् प्रश्नव्याकरण सूत्र की विषयवस्तु का अधिक विस्तृत विवेचन करनेवाला आगम समवायांग है। समवायांग में उसकी विषयवस्तु का निर्देश करते हुए कहा गया है कि 'प्रश्नव्याकरणसूत्र में १०८ प्रश्नों, १०८ अप्रश्नों और १०८ प्रश्नप्रश्नों का, विद्याओं के अतिशयों (चमत्कारों) का तथा नागों-सुपर्णों के साथ दिव्य संवादों का विवेचन है। यह प्रश्नव्याकरणदशा स्वसमय-परमसमय के प्रज्ञापक एवं विविध अर्थों वाली भाषा के प्रवक्ता प्रत्येक बुद्धों के द्वारा भाषित, अतिशय गुणों एवं उपशमभाव के वारक तथा ज्ञान के आकर आचार्यों के द्वारा
तार से भाषित और जगत् के हित के लिए वीर महर्षि के द्वारा विशेष विस्तार से भाषित है। यह आदर्श, अंगुष्ठ, बाहु, असि, मणि, क्षौम (वस्त) एवं आदित्य (के आश्रय से) भाषित है। इसमें महाप्रश्न विद्या, मनप्रश्नविद्या, देवप्रयोग आदि का उल्लेख है। इसमें सब प्राणियों के प्रधान गुणों के प्रकाशक, दुर्गुणों को अल्प करनेवाले, मनुष्यों को मति को विस्मित करने वाले, अतिशयमय, कालज्ञ एवं शमदम से युक्त उत्तम तीर्थंकरों के प्रवचन में स्थित करनेवाले, दुराभिगम, दुरावगाह, सभी सर्वज्ञों के द्वारा सम्मत सभी अज्ञजनों को बोध करानेवाले प्रत्यक्ष प्रतीतिकारक, विविध गुणों से और महान् अर्थों से युक्त जिनवरप्रणीत प्रश्न (वचन) कहे गये हैं।
प्रश्नव्याकरण अंक की सीमित वाचनायें हैं, संख्यात अनुयोगद्वार है, संख्यात प्रति पक्तियाँ हैं, संख्यात वेढ है, संख्यात श्लोक हैं, संख्यात नियुक्तियां हैं और संख्यात संग्रहणियाँ हैं ।
प्रश्नव्याकरण अंगरूप से दसवां अंग है, इसमें एक श्रुतस्कन्ध है, पैंतालीस उद्देशन काल हैं, पैतालीस समुद्देशन काल हैं। पद गणना की अपेक्षा संख्यात लाखपद कहे गये हैं। इसमें संख्यात अक्षर हैं, अनन्तगम है, अनन्तपर्याय हैं, परीत त्रस हैं, अनन्त स्थावर हैं। इसमें शाश्वतकृत, निबद्ध, निकाचित जिन-प्रज्ञप्त भाव कहे जाते हैं, प्रज्ञापित किये जाते हैं, प्ररूपित किये जाते हैं, निदर्शित किये जाते है और उपशित किये जाते है। इस अंग के द्वारा आत्मा ज्ञाता होता है, विज्ञाता होता है। इस प्रकार चरण और करण की प्ररूपणा के द्वारा वस्तु-स्वरूप का कथन, प्रज्ञापन, निदर्शन और अपदर्शन किया जाता है ।
(स) नन्दीसूत्र-नन्दीसूत्र में प्रश्नव्याकरण की विषयवस्तु का जो उल्लेख है; वह समवायांग के विवहण का मात्र संक्षिप्त रूप है। उसके भाव और भाषा दोनों ही समान हैं। मात्र विशेषता यह है कि इसमें प्रश्नव्याकरण के ४५ अध्ययन बताये गये हैं जबकि समवायांग में केवल ४५ समुद्देशनकालों का उल्लेख है, ४५ अध्ययन का उल्लेख समवायांग में नहीं है ।
(द) तत्त्वार्थवातिक-तत्त्वार्थवार्तिक में प्रश्नव्याकरण की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि आक्षेप और विक्षेप के द्वारा हेतु और नय के आश्रय से प्रश्नों के व्याकरण को प्रश्नव्याकरण कहते है। इसमें लौकिक और वैदिक अर्थों का निर्णय किया जाता है।
(इ) धवला-धवला में प्रश्नव्याकरण की जो विषयवस्तु बताई गई है, वह तत्वार्थ में प्रतिपादित विषयवस्तु से किंचित भिन्नता रखती है। उसमें कहा गया है कि प्रश्नव्याकरण में आक्षेपणी, विक्षेपणी, संवेदनी और निवेदनी इन चार प्रकार की कथाओं का वर्णन है। उसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि आक्षेपणी कथा परसमयों (अन्य मतों) का निराकरण कर छह द्रव्यों और नव तत्त्वों का प्रतिपादन करती है। विक्षेपणी कथा में परसमय के द्वारा स्वसमय पर लगाये गये आलेपों का निराकरण कर स्वसमय को स्थापना करती है। संवेदनो कथा पुण्यफल की कथा है। इसमें तीर्थकर, गणधर, ऋषि, चक्रवर्ती आदि की ऋद्धि का विवरण है। निर्वेदनी कथा पाप फल की कथा है। इसमें
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४०६ पं० जगन्मोहनलाल शास्त्री साधुवाद ग्रन्थं
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नरक, तिर्यञ्च जरा-मरण, रोग आदि सांसारिक दुःखों का वर्णन किया जाता है । उसमें यह भी कहा गया है कि प्रश्नव्याकरण प्रश्नों के अनुसार हत, नष्ट, मुक्ति, चिन्ता, लाभ, अलाभ, सुख, दुःख, जीवित, मरण, जय, पराजय, नाम, द्रव्य, आयु और संख्या का निरूपण करता है। इस प्रकार प्रश्नव्याकरण की विषयवस्तु के सम्बन्ध में प्राचीन उल्लेखों में एकरूपता नहीं है ।
प्रश्नव्याकरण की विषयवस्तु सम्बन्धी विवरणों को समीक्षा
मेरी दृष्टि में प्रश्नव्याकरणसूत्र की विषयवस्तु के तीन संस्कार हुए होंगे। प्रथम एवं प्राचीनतम संस्कार, जो 'वागरण' कहा जाता था, ऋषिभाषित, आचार्यभाषित और महावीरभाषित ही इसकी प्रमुख विषयवस्तु रही होगी । ऋषिभाषित में 'वागरण' ग्रन्थ का एवं उसकी विषयवस्तु की ऋषिभाषित से समानता का उल्लेख है ।" इससे प्राचीनकाल ( ई० पू० ४ थी या ३री शताब्दी) में इसके अस्तित्व की सूचना तो मिलती ही है, साथ ही प्रश्नव्याकरण और ऋॠषिका सम्बन्ध भी स्पष्ट होता है ।
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यद्यपि मेरी दृष्टि में 'उपमा' में कुछ
स्थानांगसूत्र में प्रश्नव्याकरण का वर्गीकरण दस दशाओं में किया । सम्भवतः जब प्रश्नव्याकरण के इस प्राचीन संस्करण की रचना हुई होगी, तब ग्यारह अंगों अथवा द्वादश गणिपिटिक की अवधारणा भी स्पष्ट रूप से नहीं बन पाई थी । अंग-आगम साहित्य के पांच ग्रन्थ --- उपासकदशा, अन्तकृतदशा, प्रश्नव्याकरणदशा और अनुत्तरोपपातिकदशा तथा कर्मविपाकदशा ( विपाकदशा) - दस दशाओं से ही परिगणित किए जाते थे। आज इन दशाओं में उपर्युक्त पाँच तथा आचारदशा, जो आज दशाश्रुतस्कन्ध के नाम से जानी जाती है, को छोड़कर शेष चार -बन्धदशा, द्विगृद्धिदशा, दीर्घदशा और संक्षेपदशा उपलब्ध है । उपलब्ध छह दशाओं में भी उपासकदशा और आयारदशा की विषयवस्तु स्थानांग में उपलब्ध विवरण के अनुरूप है । कर्मविपाक और अनुत्तरोपपातिकदशा की विषयवस्तु में कुछ समानता है और कुछ भिन्नता है । जबकि प्रश्नव्याकरणदशा और अन्तकृतदशा को विषयवस्तु पूरी तरह बदल गई है । स्थानांग में प्रश्नव्याकरण की जो विषयवस्तु सूचित की गई है, वहो इसका प्राचीनतम संस्करण लगता है, क्योंकि यहां तक इसकी विषयवस्तु में नैमित्तिक विद्याओं का अधिक प्रवेश नहीं देखा जाता है । स्थानांग प्रश्नव्याकरण के जिन दस अध्ययनों का निर्देश करता है, उनमें भी मेरी दृष्टि में इसि भासियाई, आयरियभासियाइं और महावीर भासियाई - ये तीन प्राचीन प्रतीत होते हैं । उवमा और संखा की सामग्री क्या थी ? कहा नहीं जा सकता रूपकों के द्वारा धर्म-बोध कराया गया होगा जैसा कि ज्ञाताधर्म कथा में कर्म और अण्डों के रूपकों द्वारा क्रमशः यह समझाया गया है कि जो इन्द्रिय-संयम नहीं करता है, वह दुःख को प्राप्त होता है और जो साधना में अस्थिर रहता है, वह फल को प्राप्त नहीं करता है । इसी प्रकार 'संखा' में स्थानांग और समवायांग के समान संख्या के आधार पर वर्णित सामग्री हो । यद्यपि यह भी सम्भव है कि संखा नामक अध्ययन का सम्बन्ध सांख्यदर्शन से रहा हो क्योंकि अन्य परम्पराओं के विचारों को प्रस्तुत करने की उदारता इस ग्रन्थ में थी । साथ हो, प्राचीनकाल में सांख्य श्रमणाधार का ही दर्शन था और जैन दर्शन से इसकी निकटता थी। ऐसा प्रतीत होता है कि अद्दागपरिणाई, बाहुपसिणाई आदि अध्यायों का सम्बन्ध भी निमित्तशास्त्र से न होकर इन नामवाले व्यक्तियों की तात्विक परिचर्चा से रहा हो जो क्रमशः आर्द्रक और बाहुक नामक ऋषियों की तत्वचर्चा से सम्बन्धित रहे होंगे । अदागपरिणाई की टीकाकारों ने 'आदर्शप्रश्न' के रूप में संस्कृत छाया भी उचित नहीं है । उसकी संस्कृतछाया 'आर्द्रकप्रश्न' ऐसी होनी चाहिएं। आर्द्रक से हुए प्रश्नोत्तरों की चर्चा सूत्रकृतांग में मिलती है, साथ ही वर्तमान ऋषिभाषित में भी 'अद्दाएण' (आर्द्रक) और बाह ( बाहुक) नामक अध्ययन उपलब्ध है । हो सकता है कि कोमल और खोम = क्षोभ भी कोई ऋषि रहे हैं । सोम का उल्लेख भी ऋषिभाषित में है । फिर भी यदि हम यह मानने को उत्सुक ही हों कि ये अध्ययन निमित्त शास्त्र से सम्बन्धित थे, तो हमें यह मानना
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होगा कि यह सामग्री उसमें बाद में जुड़ी है, प्रारम्भ में उसका अंग नहीं थी क्योंकि प्राचीनकाल में निमित्त शास्त्र का अध्ययन जैनभिक्षु के लिए वजित था और इसे पापश्रुत माना जाता था।
स्थानांग और समवयांग-दोनों में प्रश्नव्याकरण सम्बन्धी जो विवरण हैं, वे भी एक काल के नहीं हैं। समवायांग का विवरण परवर्ती है, क्योंकि उस विवरण में मूल तथ्य सुरक्षित रहते हुए भी निमित्तशास्त्र सम्बन्धी विवरण काफी विस्तृत हो गया है। स्थानांग में प्रश्नव्याकरण के दस अध्ययन बताये गये हैं जबकि समवायांग उसमें ४५ उद्देशक होने की सूचना देता है । 'उवमा' और 'संखा' नामक स्थानांग में वणित प्रारम्भिक दो अध्ययनों का यहाँ निर्देश ही नहीं है। हो सकता है कि 'उवमा' की सामग्री ज्ञाताधर्मकथा में और 'संखा' की सामग्री-यदि उसका सम्बन्ध संख्या से था, तो स्थाांग या समवायांग में डाल दी गई हो। 'कोमलपसिणाई' का भी उल्लेख नहीं है। इन तीनों के स्थान पर 'असि' 'मणि' और 'आदित्य'-ये तीन नाम नये जुड़ गये हैं, पुनः इनका उल्लेख भी अध्ययनों के रूप में नहीं है । समवायांग का विवरण स्पष्टरूप से यह बताता है कि प्रश्नव्याकरण का वर्ण्य-विषय चमत्कारपूर्ण विविध विधाओं से परिपूर्ण है। यहाँ इसिभासियाई, आयरियभासियाई और महावीरभासियाइं-इन तोन अध्ययनों का विलोप कर यह निमित्तशास्त्र सम्बन्धी विवरण इनके द्वारा कथित है, यह कह दिया गया है।
वस्तुतः समवायांग का विवरण हमें प्रश्नव्याकरण के किसी दूसरे परिवर्षित संस्करण की सूचना देता है जिसमें नेमिशास्त्र से सम्बन्धित विवरण जोड़कर प्रत्येकबुद्धभाषित (ऋषिभाषित) आचार्यभाषित और वोरभासित (महावीरभाषित) भाग अलग कर दिए गये थे और इस प्रकार इसे शुद्धरूप से एक निमित्तशास्त्र का ग्रन्थ Tथा। उसे प्रामाणिकता देने के लिए यहाँ तक कह दिया गया कि यह प्रत्येकबद्ध आचार्य और महावीरभाषित है।
तत्वार्थवार्तिक में प्रश्नव्याकरण की विषयवस्तु का जो विवरण उपलब्ध है, वह इतना अवश्य सूचित करता है कि ग्रन्थकार के सामने प्रश्नव्याकरण की कोई प्रति नहीं थी। उसने प्रश्नव्याकरण की विषयवस्तु के सम्बन्ध में जो विवरण दिया है, वह कल्पनाधित ही है। यद्यपि धवला में प्रश्नव्याकरण के सम्बन्ध में जो निमित्तशास्त्र से सम्बन्धित कुछ विवरण है, वह निश्चय ही यह बताता है कि ग्रन्थकार ने उसे अनुश्रुति के रूप में श्वेताम्बर या यापनीय परम्परा से प्राप्त किया होगा। धवला में वर्णित विषयवस्तुवाला कोई प्रश्नव्याकरण अस्तित्व से भी रहा होगा, यह कहना कठिन है ।
___ यद्यपि समवायांग का प्रश्नव्याकरण की विषयवस्तु सम्बन्धी विवरण स्थानांग की अपेक्षा परवर्ती काल का है, फिर भी इसमें कुछ तथ्य ऐसे अवश्य हैं जो हमारी इस धारणा को पुष्ट करते हैं कि प्रश्नव्याकरण की मूलभूत विषयवस्तु ऋषिभाषित, आचार्यभाषित और महावीरभाषित ही थी और जिसका अधिकांश भाग आज भी ऋषिभाषित आदि के रूप में सुरक्षित है । क्योंकि समवायांग में भी प्रश्नव्याकरण को विषयवस्तु को प्रत्येक बुद्धभाषित, आचार्यभाषित कहा गया है। स्थानांग में जहाँ ऋषिभाषित शब्द हैं, वहाँ समवायांग में प्रत्येक बुद्धभाषित शब्द है। यह स्पष्ट है कि ऋषिभाषित के प्रत्येक ऋषि को आगे चलकर जैनाचार्यों ने प्रत्येक बुद्ध के रूप में स्वीकार किया है । " हमारे कथन की पुष्टि का दूसरा आधार यह है कि समवायांग में प्रश्नव्याकरण के एक श्रुतस्कन्ध और ४५ अध्याय माने गये हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि समवायांग के प्रश्नव्याकरण की विषयवस्तु सम्बन्धी इस विवरण के लिखे जाने तक भी यह अवधारणा अचेतन रूप में अवश्य थी कि प्रश्नव्याकरण को विषयवस्तु प्रत्येक बुद्धों, धर्माचार्यों और महावीर के उपदेशों से निर्मित थो, यद्यपि इस काल तक ऋषिभाषित को उससे अलग कर दिया होगा और उसके ४५ अध्ययनों के स्थान पर नैमित्तशास्त्रसम्बन्धी विद्यायें समाविष्ट कर दी गई होंगी। यद्यपि निमित्तशास्त्र के विषय जोड़ने का हो ऐसा कुछ प्रयत्न सीमितरूप में स्थानांग प्रश्नव्याकरण सम्बन्धी विवरण लिखे जाने के पूर्व भी हुआ होगा। मेरी धारणा यह है कि प्रथम प्रश्नव्याकरण में निमित्तशास्त्र का विषय जुड़ा और फिर ऋषिभाषित वाला अंग अलग हुआ तथा बीच का कुछ काल ऐसा रहा जब वही विषयवस्तु दोनों में समानान्तर बनी रही।
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४०८ पं० जगन्मोहनलाल शास्त्री साधुवाद ग्रन्थ
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यहाँ हमें यह भी स्मरण रखना होगा कि जहाँ स्थानांग में प्रश्नव्याकरण के दस अध्ययन होने का उल्लेख है, वहाँ समवायांग में इसके ४५ उद्देशनकाल और नन्दी में ४५ अध्ययन होने का उल्लेख है - यह आकस्मिक नहीं है । यह उल्लेख प्रश्नव्याकरण और ऋषिभाषित के किसी साम्य का संकेतक है । वर्तमान प्रश्नव्याकरण में दस अध्ययन होना भी सप्रयोजन है - स्थानांग के पूर्व विवरण से संगति बैठाने के लिए ही ऐसा किया गया होगा । दस और पैंतालिस के इस विवाद को सुलझाने के दो ही विकल्प हैं -- प्रथम सम्भावना यह हो सकती है कि प्राचीन संस्करण में दस अध्याय रहे हों और उसके ऋषिभाषित वाले अध्याय के ४५ उद्देशक रहे हों अथवा मूल प्रश्नव्याकरण में वर्तमान ऋषिभासित के ४५ अध्याय ही हों क्योंकि इनमें भी ऋषिभाषित के साथ महावीरभाषित और आचार्यभाषित का समावेश तो हो ही जाता है । यह भी सम्भव है कि वर्तमान ऋषिभाषित के ४५ अध्यायों में से कुछ अध्याय ऋषिभाषित के अन्तर्गत और कुछ आचार्यभाषित एवं कुछ महावीरभाषित के अन्तर्गत उद्देशकों के रूप में वर्गीकृत हुए हों। महत्वपूर्ण यह है कि समवायांग में प्रश्नव्याकरण के ४५ अध्ययन न कहकर ४५ उद्देशनकाल कहा गया है, किन्तु प्रश्नव्याकरण से अलग करने के पश्चात् उन्हें एक ही ग्रन्थ के अन्तर्गत ४५ अध्यायों के रूप में रख दिया गया हो । एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि समवायांग में ऋषिभाषित के ४४ अध्ययन कहे गये हैं जबकि वर्तमान ऋषिभाषित में ४५ अध्ययन हैं । क्या वर्धमान नामक अध्ययन पहले इसमें परिगणित किया गया था या अन्य कोई कारण था, हम नहीं कह सकते। किसी ऋषि का उल्लेख नहीं है । साथ ही, यह अर्ध्याय चार्वाक का प्रतिपादन करता है। अतः इसे ऋषिभाषित में स्वीकार नहीं किया हो । समवायांग और नन्दीसूत्र के मूलपाठों में एक महत्वपूर्ण अन्तर है । नन्दीसूत्र में प्रश्नव्याकरण के ४५ अध्ययन हैं- ऐसा स्पष्ट पाठ है ।" जबकि समवायांग में ४५ अध्ययन - ऐसा पाठ होकर ४५ उद्देशन काल हैं, मात्र यही पाठ है । हो सकता है कि समवायांग के रचनाकल तक वे उद्देशक रहे हों, किन्तु आगे चलकर वे अध्ययन कहे जाने लगे हों । यदि समवायांग के कालतक ४५ अध्ययनों की अवधारणा होती, तो समवायांग उसका उल्लेख अवश्य करता, क्योंकि समवायांग में अन्य अंग --आगमों की चर्चा के प्रसङ्ग में अध्ययनों का स्पष्ट उल्लेख है ।
सम्मिलित नहीं था । इसे महावीरभाषित में यह भी सम्भव है कि उत्कटवादी अध्याय में
न
इस सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या निमित्तशास्त्र एवं चमत्कारिक विद्याओं से मुक्त कोई प्रश्नव्याकरण बना भी था या यह सब कल्पना उड़ाते हैं ? यह सत्य है कि प्रश्नव्याकरण की पद संख्या का समवायांग, नन्दी, नन्दिचूर्णी और धवला में जो उल्लेख है, वह काल्पनिक है । यद्यपि समवायांग और नन्दी प्रश्नव्याकरण के पदों की निश्चित संख्या नहीं देते हैं-मात्र संख्यात शत सहस्र - ऐसा उल्लेख करते हैं, किन्तु नन्दिचूर्णी एवं समवायांगवृति में उसके पदों की संख्या ९२१६००० और धवला ** में ९३१६००० में बतायी गयी है, जो मुझे तो काल्पनिक ही अधिक लगती है ।
मेरी अवधारणा यह है कि स्थानांग, समवायांग, नन्दी, तत्वार्थ राजवार्तिक, धवला एवं जयधवला में प्रश्नव्याकरण की विषयवस्तु का जिस रूप में उल्लेख है, वह पूर्णतः काल्पनिक चाहे न हो किन्तु उसमें सत्यांश कम और कल्पना का पुट अधिक है । यद्यपि निमित्तशास्त्र के विषय को लेकर कोई प्रश्नव्याकरण अवश्य बना होगा, फिर भी उसमें समवायांग और धवला में वर्णित समग्र विषयवस्तु एवं चामत्कारिक विधाएँ रही होंगी, यह कहना कठिन है ।
इसी सन्दर्भ में समवायांग के मूलपाठ 'अद्दागंगुट्टा बाहुअसिमणि खोमआइन्च भासियाणं '१७ के अर्थ के सम्बन्ध में भी यहाँ हमें पुनर्विचार करना होगा । कहीं उद्दांग, अंगुष्ठ, बाहु, असि, मणि, खोम, ( क्षोभ ) और आदित्य व्यक्ति या ऋषि तो नहीं है- क्योंकि इनके द्वारा भाषित कहने का क्या अर्थ है ? ऋषिभाषित में इनके उल्लेख हैं । आदित्य भी कोई ऋषि हो सकते हैं । केवल अंगुष्ठ, असि और मणि ये तीन नाम अवश्य ऐसे हैं, जिनके व्यक्ति होने की सम्भावना धूमिल है ।
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क्या प्रश्नव्याकरण की प्राचीन विषयवस्तु सुरक्षित है ?
यहाँ यह चर्चा भी महत्वपूर्ण है कि क्या प्रश्नव्याकरण के प्रथम और द्वितीय संस्करणों की विषयवस्तु पूर्णतः नष्ट हो गई है या वह आज भी पूर्णतः या अंशतः सुरक्षित है। मेरी दृष्टि में प्रश्नव्याकरण के प्रथम संस्करण में ऋषि आचार्यभाषित और महावीरभाषित के नाम से जो सामग्री थी, वह आज भी ऋषिभाषित, ज्ञाताधर्मकथा, सूत्रकृतांग एवं उत्तराध्ययन में बहुत कुछ सुरक्षित है। ऐसा लगता है कि ईस्वी सन् के पूर्व हो उस सामग्री को वहाँ से अलगकर इसि भातिवाद के नाम से स्वतन्त्रग्रन्थ के रूप में सुरक्षित कर लिया गया था। जैन परम्परा में ऐसे प्रयास अनेक बार हुए हैं जब चूला या पूलिका के रूप में ग्रन्थों में नवीन सामग्री जोड़ो जाती रही अथवा किसी ग्रन्थ की सामग्री को निकालकर उससे एक नया धन्य बना दिया। उदाहरण के रूप में, किसी समय निशीथ को आचारांग की चूला के रूप में जोड़ा गया, और कालान्तर में उसे वहाँ से अलग कर निशीष नामक नया ग्रन्थ ही बना दिया गया। इसी प्रकार आयारदशा (दशाश्रुतस्कन्ध) के आठवें अध्याय (पर्युपणकल्प) की सामग्री से कल्पसूत्र नामक एक नया ग्रन्थ ही बना दिया गया । अतः यह मानने में कोई आपत्ति नहीं है कि पहले प्रश्नव्याकरण में इसिभासियाई के अध्याय जुड़ते रहे हों और फिर अध्ययनों की सामग्री को वहाँ से अलग कर इतिभासियाई नामक स्वतन्त्र ग्रन्थ अस्तित्व में आया हो । मेरा यह कथन निराधार भी नहीं है । प्रथम तो, दोनों नामों का साम्य तो है ही । साथ ही, समवायांग में यह भी स्पष्ट उल्लेख है कि प्रश्नव्याकरण में स्वसमय और परसमय के प्रज्ञापक प्रत्येकबुद्धों के कथन है । इसिभासियाई के सम्बन्ध में यह स्पष्ट मान्यता है कि उसमें प्रत्येक बुद्धों के वचन हैं । मात्र यही नहीं, समवायांग स्वसमय एवं परसमय के प्रज्ञापक प्रत्येकबुद्ध का उल्लेख कर इसकी पुष्टि भी कर देता है कि वे प्रत्येकबुद्ध मात्र जैन परम्पराओं के नहीं हैं, अपितु अन्य परम्पराओं के भी हैं । इसिभासियाई में मंखलिगोसाल, देवनारद, असितदेवल, याज्ञवल्क्य उद्दालक आदि से सम्बन्धित अध्याय भी इसी तथ्य को सूचित करते हैं । मेरी दृष्टि में प्रश्नव्याकरण का प्राचीनतम अधिकांश भाग आज भी इसिभासियाई में तथा कुछ भाग सूत्रकृतांग, ज्ञाताधर्मकथा और उत्तराध्ययन के कुछ अध्यायों के रूप में सुरक्षित है । प्रश्नव्याकरण का इसिभासियाई वाला अंश वर्तमान इसिभा सियाई (ऋषिभाषित) में महावीरभाषियाई तथा आयरियाभारियाई का कुछ अंश उत्तराध्ययन के अध्ययनों में सुरक्षित है। ऋषिभाषित के तेतलिपुत्र नामक अध्याय की विषयसामग्री ज्ञाताधर्मकथा के तेतलिपुत्र नामक अध्याय में आज भी उपलब्ध ।
प्राचीन प्रश्नव्याकरण वर्तमान ऋषिभाषित और उत्तराध्ययन ४०९
उत्तराध्ययन के अनेक अध्याय प्रश्नव्याकरण के अंग थे—इसकी पुष्टि अनेक आधारों से की जा सकती हैं । सर्वप्रथम, उत्तराध्ययन नाम ही इस तथ्य को सूचित करता है कि यह किसी ग्रन्थ के उत्तर-अध्ययनों से बना हुआ ग्रन्थ है । इसका तात्पर्य है कि इसकी विषय सामग्री पूर्व में किसी ग्रन्थ का उत्तरवर्ती अंश रही होगी । इसी तथ्य की पुष्टि का दूसरा किन्तु सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण यह है कि उत्तराध्ययन निर्युक्ति गाथा ४ में इस बात का स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि उत्तराध्ययन का कुछ भाग अंग साहित्य से लिया गया है। उत्तराध्ययन नियुक्ति की इस गाथा का तात्पर्य यह है कि "बन्धन और मुक्ति से सम्बन्धित जिनभाषित और प्रत्येक कुछ सम्वादरूप इसके कुछ अध्ययन अंग प्रन्थों से लिये गये हैं"। नियुक्तिकार का यह कथन तीन मुख्य बातों पर प्रकाश डालता है। प्रथम तो यह कि उत्तराध्ययन के जो ३६ अध्ययन हैं, उनमें कुछ जिनभाषित (महावीरभाषित) और कुछ प्रत्येक बुद्धों के सम्वाद रूप है तथा अंग साहित्य से लिये गये हैं। अब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि वह अंग ग्रन्थ कौन सा था, जिससे उत्तराध्ययन के ये भाग लिये गये ? कुछ आचार्यों ने दृष्टिवाद से इसके परिषह आदि अध्यायों को लिये जाने की कल्पना की है किन्तु मेरी दृष्टि में इसका कोई आधार नहीं है। इसकी सामग्री उग्री ग्रन्थ से ली जा सकती है जिसमें महावीरभाषित और प्रत्येकबुद्धिभाषित विषयवस्तु हो | इस प्रकार विषयवस्तु प्रश्नव्याकरण की ही थी । अतः उससे ही इन्हें लिया गया होगा । यह बात निर्विवाद रूप से स्वीकार की जा सकती है कि चाहे उत्तराध्ययन के समस्त अध्ययन तो नहीं, किन्तु कुछ अध्ययन तो अवश्य ही महावीर
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४१० पं० जगन्मोहनलाल शास्त्री साधुवाद ग्रन्थ
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भाषित हैं। एक बार हम उत्तराध्ययन के छत्तीसवें अध्ययन एवं उसके अन्त में दी हुई उस गाथा को, जिसमें उसका महावीरभाषित होना स्वीकार किया गया है, परवर्ती एवं प्रक्षिप्त मान भी लें, किन्तु उसके अठारहवें अध्ययन की गाथा २४, जो न केवल इसी गाथा के समरूप है, अपितु भाषा की दृष्टि से भी उसकी अपेक्षा प्राचीन लगती है। प्रक्षिप्त नहीं कही जा सकती। यदि उत्तराध्ययन के कुछ अध्ययन जिनभाषित एवं कुछ प्रत्येकबुद्धों के सम्वादरूप है, तो हमें यह देखना होगा कि वे किस अङ्ग ग्रन्थ के भाग हो सकते हैं। प्रश्नव्याकरण की प्राचीन विषयवस्तु का निर्देश करते हुए स्थानांग, समवायांग और नन्दीसूत्र में उसके अध्यायों को महावीरभाषित एवं प्रत्येकबुद्धभाषित कहा गया है । इससे यही सिद्ध होता है कि उत्तराध्ययन के अनेक अध्याय पूर्व में प्रश्नव्याकरण के अंश रहे हैं। उत्तराध्ययन के अध्यायों के वक्ता के रूप में देखें, तो स्पष्ट रूप से उनमें नभिपव्वजा, कापिलीय, संजयीय आदि जैसे कई अध्ययन प्रत्येकबुद्धों के सम्बादरूप मिलते हैं जबकि विनयसुत्त, परिषह-विभक्ति, संस्कृत, अकामभरणीय, क्षुल्लक-निग्रंथीय, दुमपत्रक, बहुश्रुतपूजा जैसे कुछ अध्याय महावीरभाषित हैं और केसी-गौतमीय, गद्दमीय आदि कुछ अध्याय आचार्यभाषित कहे जा सकते हैं । अतः प्रश्नव्याकरण के प्राचीन संस्कार की विषयसामग्री से इन उत्तराध्ययन के अनेक अध्यायों का निर्माण हुआ है।
___ यद्यपि समवायांग एवं नन्दीसूत्र में उत्तराध्ययन का नाम आया है, किन्तु स्थानांग में कहीं भी उत्तराध्ययन का नामोल्लेख नहीं है। यहो ऐसा प्रथम ग्रन्थ है जो जैन आगम साहित्य के प्राचीनतम स्वरूप को सूचना देता है । मुझे ऐसा लगता है कि स्थानांग में प्रस्तुत जैन साहित्य विवरण के पूर्व तक उत्तराध्ययन एक स्वतन्त्र ग्रन्थ के रूप में अस्तित्व में नहीं आया था, अपितु वह प्रश्नव्याकरण के एक भाग के रूप में था।
पुनः उत्तराध्ययन का महावीरभाषित होना उसे प्रश्नव्याकरण के ही अधोन मानने से ही सिद्ध हो सकता है। उत्तराध्ययन की विषयवस्तु का निर्देश करते हुए भी कहा गया है कि ३६ अपृष्ठ का व्याख्यान करने के पश्चात ३७वें प्रधान नामक अध्ययन का वर्णन करते हुए भगवान् परिनिर्वाण को प्राप्त हुए। प्रश्नव्याकरण के विषयवस्तु की चर्चा करते हुए उसमें पृष्ठ, अपृष्ठ और पृष्ठापृष्ठ का विरोध होना बताया गया है । इससे भी यह सिद्ध होता है कि प्रश्नव्याकरण और उत्तराध्ययन को समरूपता है और उत्तराध्ययन में अपृष्ठ प्रश्नों का व्याकरण हैं ।
____ हम यह भी सुस्पष्ट रूप से बता चुके हैं, कि पूर्व में ऋषिभाषित हो प्रश्नव्याकरण का एक भाग था । ऋषिपत को परवर्ती आचार्यों ने प्रत्येकबुद्धभाषित कहा है। उत्तराध्ययन के भी कुछ अध्ययनों को प्रत्येकबुद्धभाषित कहा गया है । इसका तात्पर्य यह है कि उत्तराध्ययन एवं ऋषिभाषित एक दूसरे से निकट रूप से सम्बन्धित थे और किसी एक ही ग्रन्य के भाग थे। हरिभद्र (८वों शती) आवश्यक नियुक्ति को वृत्ति (८५) में ऋषिभाषित और उत्तराध्ययन को एक मानते है। तेरहवों शताब्दी तक भो जैन आचार्यों में ऐसी धारणा चली आ रही थी कि ऋषिभाषित का समावेश उत्तराध्ययन में हो जाता है। जिनप्रभसूरि की चौदहवों सदी की विधिमार्गप्रपा में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि कुछ आचार्यों के मत में ऋषिभाषित का अन्तर्भाव उत्तराध्ययन में हो जाता है। यदि हम उत्तराध्ययन और ऋषिभाषित को समग्र रूप में एक ग्रन्थ मानें, तो ऐसा लगता है कि उस ग्रन्थ का पूर्ववर्ती भाग ऋषिभाषित और उत्तरभाग उत्तराध्ययन कहा जाता था।
यह तो हुई प्रश्नव्याकरण के प्राचीनतम प्रथम संस्करण की बात । अब यह विचार करना है कि प्रश्नव्याकरण के निमित्तशास्त्र प्रधान दूसरे संस्करण की क्या स्थिति हो सकती है-क्या वह भी किसी रूप में सुरक्षित है ? मेरी
में वह भी पूर्णतया विलुप्त नहीं हुआ है, अपितु मात्र हुआ यह है कि उसे प्रश्नव्याकरण से पृथक् कर उसके स्थान र आश्रवद्वार और संवरद्वार नामक नई विषयवस्तु डाल दी गई है। श्री अगर चन्दजी नाहटा ने जिनवाणी. दिसम्बर १९८० में प्रकाशित अपने लेख में प्रश्नव्याकरण नामक कुछ अन्य ग्रन्थों का संकेत किया है । 'प्रश्नव्याकरणाख्य जयपायड' के नाम से एक ग्रन्थ मुनि जिनविजयजी सिंधी जैन ग्रन्थमाला ने ग्रन्थ क्रमांक ४३ में सम्बत २०१५ में प्रकाशित किया
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है । यह ग्रन्थ एक प्राचीन ताडपत्रीय प्रति के आधार पर प्रकाशित किया गया है। ताड़पत्रीय प्रति खरतरगच्छ के आचार्यशाखा के ज्ञानभण्डार, जैसलमेर से प्राप्त हुई थी और यह विक्रम सम्बत् १३३६ की लिखी हुई थी। ग्रन्थ मूलतः प्राकृत भाषा में है और उसमें ३७८ गाथाएं हैं। उसके साथ संस्कृत टीका भी है। यह प्रकाशित ग्रन्थ पार्श्वनाथ विद्याश्रम, वाराणसी के पुस्तकालय में है। ग्रन्थ का विषय निमित्तशास्त्र से सम्बन्धित है। इसी प्रकार, जिनरत्नकोश में भी शान्तिनाथ भण्डार खम्भात में उपलब्ध जयपाहड़ प्रश्नव्याकरण नामक ग्रन्थ की सूचना उपलब्ध होती है।" यद्यपि इसकी गाथा संख्या २२८ बताई गई है। एक अन्य प्रश्नव्याकरण नामक ग्रन्थ की सूचना हमें नेपाल के महाराजा की लायब्रेरी से प्राप्त होती है। श्री अगरचन्दजी नाहटा की सूचना के अनुसार इस ग्रन्थ की प्रतिलिपि तेरापन्थ धर्मसंघ के युवाचार्य मुनि श्री नाथमलजो ने प्राप्त कर ली है। इस लेख के प्रकाशन के पूर्व श्री जौहरीमलजी पारख, रावटी, जोधपुर के सौजन्य से इस ग्रन्थ की फोटो कापी पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संस्थान को प्राप्त हो गई है। इसे अभी पूरा पढ़ा तो नहीं जा सका है, किन्तु तुलनात्मक दृष्टि से देखने पर ज्ञात हुआ कि इसको मूलगाथाएँ तो सिन्धो जैन ग्रन्थमाला के अन्तर्गत प्रकाशित कृति के समान ही हैं, किन्तु टीका भिन्न है। इसकी एक अन्य फोटोकापी लालाभाई दलपतभाई भारतीय संस्कृति विद्या मंदिर, अहमदाबाद से भी प्राप्त हुई है। एक अन्य प्रश्नव्याकरण की सूचना हमें पाटन ज्ञान भण्डार की सूची से प्राप्त होती है। यह ग्रन्थ भी चूड़ामणि नामक टीका के साथ है और टीका का ग्रन्थांक २३०० श्लोक परिमाण बताया गया है। यह प्रति भी काफी पुरानी हो सकती है।"
इन सब आधारों से ऐसा लगता है कि प्रश्नव्याकरण का निमित्रशास्त्र से सम्बन्धित संस्करण भी पूरी तरह विलुप्त नहीं हुआ होगा अपितु उसे उससे अलग करके सुरक्षित कर लिया गया है। यदि कोई विद्वान् इन सब ग्रन्थों को लेकर उनकी विषयवस्तु को समवायांग, नन्दोसूत्र एवं धवला में प्रश्नव्याकरण की उल्लिखित विषयसामग्री के साथ मिलन करें, तो यह पता चल सकेगा कि प्रश्नव्याकरण नामक जो अन्य ग्रन्थ उपलब्ध है, वे प्रश्नव्याकरण के द्वितीय संस्करण का ही अंश है या अन्य है। यह भी सम्भव है कि समवायांग और नन्दी के रचनाकाल में प्रश्नव्याकरण नामक कई ग्रन्थ वाचना-भेद से प्रचलित हों और उनमें उन सभी विषयवस्तु का समाहित किया गया हो। इस मान्यता का एक आधार यह है कि ऋषिभाषित, समवायांग, नन्दी एवं अनुयोगद्वार में 'वागरणगंथा' एवं 'पण्हावागरणाई-ऐसे बहुवचन प्रयोग मिलते हैं । इससे ऐसा लगता है कि इस काल में वाचनाभेद से या अन्य रूप से अनेक प्रश्नव्याकरण रहे होंगे।
___ इन प्रश्नव्याकरणों की संस्कृत टीका सहित ताड़पत्रीय प्रतियाँ मिलना इस बात की अवश्य सूचक है कि ईसा को ४-५वीं शती में ये ग्रन्थ अस्तित्व में थे क्योंकि ९-१०वीं शताब्दी में जब इनकी टोकाएँ लिखी गई, तो उससे पूर्व भी ये ग्रन्थ अपने मूल रूप में रहे होंगे।
सम्भवतः ईसा की लगभग २.३ री सदी में प्रश्नव्याकरण में निमित्तशास्त्र सम्बन्धी सामग्री जोडी गई हो और फिर उसमें से ऋषिभाषित का हिस्सा अलग किया गया और उसे विशिष्ट रूप से एक निमित्तशास्त्र का ग्रन्थ बना दिया गया। पुनः लगभग सातवीं सदी में यह निमित्त शास्त्र वाला हिस्सा अलग किया गया और उसके स्थान पर पांच आश्रव तथा पांच संवरद्वार वाला वर्तमान संस्करण रखा गया। प्रश्नव्याकरण के पूर्व के दो संस्करण भी, चाहे उससे पृथक कर दिये गये हों, किन्तु वे ऋषिभाषित, उत्तराध्ययन और प्रश्नव्याकरण नाम अन्य निमित्तशास्त्र के ग्रन्थों के रूप में अपना अस्तित्व रख रहे हैं । आशा है, इस सम्बन्ध में विद्वद्वर्ग आगे और मन्थन करके किसी निष्कर्ष पर पहुँचेगा। प्रश्नव्याकरण और ऋषिभाषित को विषयवस्तु को समरूपता का प्रमाण
ऋषिभाषित और प्राचीन प्रश्नव्याकरण की विषयवस्तुओं की एकरूपता का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रमाण हमें ऋषिभाषित के पावं नामक इकतीसवें अध्ययन में मिल जाता है। इसमें पाश्व की दार्शनिक अवधारणाओं की चर्चा है। इस चर्चा के प्रसंग में ग्रन्थाकार ने स्पष्ट रूप से यह उल्लेख किया है कि व्याकरणप्रभृति ग्रन्थों में समाहित इस
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अध्ययन का एक दुसरा पाठ भी मिलता है। इसका तात्पर्य तो यह है कि ऋषिभाषित की विषयवस्तु प्रश्नव्याकरण में भी समाहित थी। यद्यपि यह एक विवादास्पद प्रश्न होगा कि प्रश्न व्याकरण की विषयवस्तु से ऋषिभाषित का निर्माण हुआ या ऋषिभाषित को विषयवस्तु से प्रश्नव्याकरण का। लेकिन यह सुस्पष्ट है कि किसी समय प्रश्नव्याकरण और ऋषिभाषित की विषयवस्तु समान थी और उनमें कुछ पाठान्तर भी थे । अतः वर्तमान ऋषिभाषित में प्राचीन प्रश्नव्याकरण की विषयवस्तु का होना निविवाद रूप से सिद्ध हो जाता है। साथ ही, यह भी सिद्ध हो जाता है कि मूल प्रश्नव्याकरण में पाच आदि प्राचीन अर्हत् ऋषियों के दार्शनिक विचार एवं उपदेश निहित थे। प्रश्नव्याकरण और जयपायड को विषयवस्तु की आंशिक समानता
'प्रश्नव्याकरणाख्य जयपायड' नामक ग्रन्थ की विषयसामग्री निमित्तशास्त्र से सम्बन्धित है । पुनः उसमें कर्ता ने तीसरी गाथा में 'पण्हं जयपायड वोच्छं' कहकर प्रश्नव्याकरण और जयपायड को समरूपता को स्पष्ट किया है। प्रस्तुत ग्रन्थ की इसी गाथा की टीका से ग्रन्थ की विषयवस्तु को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि इसमें 'नष्टमुष्टिचिन्तालामालामसुखदुःखजीवनमरण' आदि सम्बन्धी प्रश्न है। इस उल्लेख से ऐसा लगता है कि धवलाकार ने प्रश्नव्याकरण को विषयवस्तु का जिस रूप में उल्लेख किया है, उसकी इससे बहत कुछ समानता है।" प्रस्तत ग्रन्थ के
निविभाग प्रकरण, नष्टिका चक्र, संख्या प्रमाण, लाभ प्रकरण, अस्त्रविभाग प्रकरण आदि ऐसे हैं जिनकी विषयवस्तु समवायांग में प्रश्नव्याकरण के वणित विषयों से यत्किञ्चित् साम्य रखती है ।२२ दुर्भाग्य यह है कि प्रकाशित होते हुए भी विद्वानों को इस ग्रन्थ की जानकारी नहीं है । यह जैन निमित्तशास्त्र का प्राचीन एवं प्रमुख ग्रन्थ है ।
ग्रन्थ की भाषा को देखकर सामान्यतया यह अनुमान किया जा सकता है कि यह ईस्वी सन् की चौथीपाँचवी शताब्दी की हो सकती है। ग्रन्थ के लिए प्रयुक्त पायड या पाहड़ शब्द के भो यह फलित होता है कि यह ग्रन्थ लगभग पाँचवीं शताब्दी के आसपास को रचना होना चाहिए, क्योंकि कसायपाहुड़ एवं कुन्दकुन्द के पाहुड़ग्रन्थ इसी कालावधि के कुछ पूर्व को रचनाएं हैं । सूर्य प्रज्ञप्ति में भी विषयों का वर्गीकरण पाहुड़ों के रूप में हुआ है । अतः यह सम्भावना हो सकती है कि जयपायड़ प्रश्नव्याकरण के द्वितीय संस्करण का कोई रूप हो, यद्यपि इस सम्बन्ध में अन्तिम रुप से तभी कुछ कहा जा सकता है कि जब प्रश्नव्याकरण के नाम से मिलने वाली सभी रचनाएँ हमारे समक्ष उपस्थित हों और इनका प्रमाणिक रूप से अध्ययन किया जाये । विषय-सामग्री में परिवर्तन क्यों ?
यद्यपि यहाँ यह प्रश्न स्वाभाविकरूप से उठता है कि प्रथम ऋषिभाषित, आचार्यभाषित, महावीरभाषित आदि भाग को हटाकर इसमें निमित्तशास्त्र सम्बन्धी विवरण रखना और फिर निमित्तशास्त्र सम्बन्धी विवरण हटाकर आश्रवद्वार और संवरद्वार सम्बन्धी विवरण रखना-यह सब क्यों हुआ? सर्वप्रथम ऋषिभाषित आदि भाग क्यों हटाया गया ? मेरी दृष्टि में इसका कारण यह है कि ऋषिभाषित में अधिकांशतः अजैन परम्परा के ऋषियों के उपदेश एवं विचार संकलित थे । इसके पठन-पाठन से एक उदार दृष्टिकोण का विकास तो होता था किन्तु जैनधर्म संघ के प्रति अटट श्रद्धा खण्डित होती थी तथा परिणामस्वरूप संघीय व्यवस्था के लिए अपेक्षित धार्मिक कट्टरता और आस्था टिक नहीं पाती थी। इससे धर्मसंघ को खतरा था। पुनः यह युग चमत्कारों द्वारा लोगों को अपने धर्मसंघ के प्रति आकर्षित करने और उनकी धार्मिक श्रद्धा को दृढ़ करने का था, चुकि तत्कालीन जैन परम्परा के साहित्य में अतः उसे जोड़ना जरूरी था। समवायांग में प्रश्नव्याकरण सम्बन्धी जो विवरण उपलब्ध है, पुष्टि होती है-उपमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि लोगों को जिन प्रवचन में स्थित करने के लिए, उनकी मति को विस्मित करने के लिए सर्वज्ञ के वचनों में विश्वास उत्पन्न करने के लिए इसमें-महाप्रश्नविद्या, मनःप्रश्नविद्या, देव-प्रयोग
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आदि का उल्लेख किया गया है। यद्यपि यह आश्चर्यजनक है कि एक और निमित्तशास्त्र को पापसूत्र कहा गया-किन्तु संघहित के लिए, दूसरी ओर, उसे अंग आगम में सम्मिलित कर लिया गया। अतः प्रश्नव्याकरण की विषयवस्तु में परिवर्तन करने का दोहरा लाभ था-एक और अन्यतीथिक ऋषियों के वचनों को उससे अलग किया जा सकता था, दूसरी ओर उसमें निमित्तशास्त्र सम्बन्धी नई सामग्री जोड़ कर उसकी प्रमाणिकता को भी सिद्ध किया जा सकता था। किन्तु जब परवर्ती आचार्यों ने इसका दुरुपयोग होते देखा होगा और मुनिवर्ग को साधना से विरत होकर इन्हीं नैमित्तिक विद्याओं की उपासना में रत देखा होगा, तो उन्होंने यह नैमित्तिक विद्याओं से युक्त विवरण उससे अलग कर उसमें पांच आश्रवद्वार और पांच संवरद्वार वाला विवरण रख दिया। प्रश्नव्याकरण के टीकाकार अभयदेव एवं ज्ञानविमल ने भी विषय परिवर्तन के लिए यही तर्क स्वीकार किया है ।२३
प्रश्नव्याकरण की प्राचीन विषयवस्तु कब उससे अलग कर दी गई और उसके स्थान पर पांच आश्रवद्वार और पांच संवरद्वार रूप नवीन विषय रख दी गई, यह प्रश्न भी विचारणीय है ? अभयदेव सूरि ने अपनी स्थानांग और समवायांग की टीका में भी यह स्पष्ट निर्देश किया है कि वर्तमान प्रश्नव्याकरण में इनमें सूचित विषयवस्तु उपलब्ध नहीं है।" मात्र यही नहीं, उन्होंने पांच-पांच आश्रवद्वार और पांच संवरद्वार वाले वर्तमान में उपलब्ध प्रश्नव्याकरण ही टीका लिखी है। अत: वर्तमान संस्करण की निम्नतम सोम अभयदेव के काल (१०८० ई०) से पूर्ववर्ती होना चाहिए। पुनः अभयदेव ने प्रश्नव्याकरण में एक श्रुतस्कन्ध है या दो श्रुतस्कन्ध हैं, इस समस्या को उठाते हुए अपनी वृत्ति की पूर्वपीठिका में से अपने पूर्ववर्ती आचार्य का मत उधृत करते हुए उसे अस्वीकार किया है और यह भी कहा है कि यह दो श्रुतस्कन्धों की मान्यता रूढ़ नहीं है। सम्भवतः उन्होंने अपना एक श्रुतस्कन्ध सम्बन्धी मत समवायांग और नन्दी के आधार पर बनाया हो। इसका अर्थ यह भी है कि अभयदेव के पूर्व भी प्रश्नव्याकरण के वर्तमान संस्करण पर प्राकृत भाषा में हो कोई व्याख्या लिखी गई थी जिसमें दो श्रुतस्कन्ध की मान्यता को पुष्ट किया गया था। उसका काल अभयदेव से २-३ शताब्दी पूर्व अर्थात् ईसा की ८वीं शताब्दी के लगभग अवश्य रहा होगा। पुनः आचार्य जिनदासगणि महत्तर ने नन्दीसूत्र पर ६७६ ई० में अपनी चूणि समाप्त की थी। उस चूणि में उन्होंने प्रश्नव्याकरण में पंचसंवरादि की व्याख्या होने का स्पष्ट निर्देश किया है। इससे भी यह सिद्ध हो जाता है कि ६७६ ई० के पूर्व प्रश्नव्याकरण का पंच संवरद्वारों से युक्त संस्करण प्रसार में आ गया था, अर्थात् आगमों के लेखनकाल के पश्चात् लगभग सौ वर्ष की अवधि में वर्तमान प्रश्नव्याकरण अस्तित्व में अवश्य आ गया था। प्रस्तुत प्रश्नव्याकरण की प्रथम गाथा, जिसमें 'वोच्छामि' कहकर ग्रन्थ के कथन का निश्चय सूचित किया है कि रचना शेष सभी अंग आगमों के कथन से बिलकुल भिन्न है। यह पांचवों-छठी सदी में रचित ग्रन्थों की प्रथम प्राक्कथन गाथा के समान ही है । अतः प्रस्तुत प्रश्नव्याकरण का रचनाकाल ईसा की छठी सदी माना जा सकता है।
इस प्रकार हम कह सकते है कि प्रश्नव्याकरण का वह प्राचीनतम संस्करण है, जिसमें उसकी विषयवस्तु ऋषिभाषित की विषयवस्तु के समरूप थीं और वह लगभग ईसा पूर्व तीसरी सदी की रचना होगी। फिर ईसा की दूसरीसदी में उसमें निमित्तशास्त्र सम्बन्धी विवरण जुड़े जिनकी सूचना उसके स्थानांग के विवरण से मिलती है। इसके पश्चात ईसा की चौथी शताब्दी में ऋषिभाषित आदि भाग अलग किये गये और उसे निमित्तशास्त्र का ग्रन्थ बना दिया, समवायांग का विवरण इसका साक्षी है । इस काल में प्रश्नव्याकरण के नाम से वाचनाभेद से अनेक ग्रन्थ अस्तित्व में थे, ऐसी भी सचना हमें आगम साहित्य से मिल जाती है। लगभग ईसा की छठी सदी के उत्तरार्द्ध में इन ग्रन्थों के स्थान पर वर्तमान प्रश्नव्याकरणसूत्र का आश्रय एवं संवर के विवेचन से युक्त वह संस्करण अस्तित्व में आया है जो वर्तमान में हमें उपलब्ध है। इस सम्बन्ध में अभी विशेष एवं निर्णायक शोध की आवश्यकता है।
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________________ 414 60 जगन्मोहनलाल शास्त्री साधुवाद ग्रन्थ [खण्ड सन्दर्भ: 1. समवायांगसूत्र, 546 / 2. इसीभासियाई 31 / 3. स्थानांगसूत्र, 10 / 116 / 4. समवायांगसूत्र, 546-549 / 5. नन्दीसूत्र, 54 / 6. तत्वार्थवातिक 1120 ( पृष्ठ 73-74) / 7. धवला, पुस्तक 1, भाग 1, पृष्ठ 107-8 / 8. इसिभासियाई, अध्याय 31 / 9. स्थानांग, 9 स्थान / 10. इसिभासियाई, पठमा संगहीणी गाथा, 1 / 11. समवायांगसूत्र, 44 / 258 / 12. नन्दीसूत्र, 54 / 13. (क) नन्दीचूर्णि। 13. (ख) समवायांगवृत्ति / 14. धवला, भाग 1, पृ० 104 / 15. समवायांग, 547 / 16. समवायांग, 547 / 17. प्रश्नव्याकरण जयप्राभृत, (ग्रन्थ० 228), जैन ग्रन्थावली, पृ० 355 / (अ) चूड़ामणिवृत्ति (ग्रन्थ 2300), पाटन कैटलोग भाग 1 पृ० 8 / (ब) लीलावती टीका, पाटन कैटलोग भाग 1 पृ० 8 एवं इन्ट्रोडक्शन पृ० 60 / (स) प्रदर्शनज्योतिवृत्ति, पाटन कैटलोग भाग 1 पृष्ठ 8 एवं इन्ट्रोडक्शन पृष्ठ 60 / बृहद्वृत्तटिप्पणिका ( जैन साहित्य संशोधक, पूना 1925 क्रमांक 560), जैन ग्रन्थावली पृ० 355, जिनरत्नकोश पृ० 274 / 18. जिनरत्नकोश, पृ० 274 / 19. इसिभासियाई, अध्याय 31 / 20. प्रश्नव्याकरणाख्यं जयपाहडनाम निमित्तशास्त्रम् 3 / 21. (अ) प्रश्नव्याकरणाख्यं जयपाहुडनाम निमित्तशास्त्रम्, टीका / 21. (ब) धवला, भाग 1, पृ० 107-8 / 22. देखें-प्रकरण 14, 17, 21, 38, प्रश्नव्याकरणाख्यं जयपाहुडनाम निमित्तशास्त्र / 23. (अ) प्रश्नव्याकरण वृत्ति (अभयदेव), प्रारम्भ / (ब) प्रश्नव्याकरण टोका (ज्ञानविमल), प्रारम्भ / 24. (अ) प्रश्नव्याकरण वृत्ति (अभयदेव), प्रारम्भ / (ब) प्रश्नव्याकरण टोका (ज्ञानविमल), प्रारम्भ / 25. (अ) नन्दीचूणि (प्राकृत-टेक्स्ट-सोसायटी)। (ब) पाठान्तर, नन्दो चूणि (ऋषभदेव केशरीमल, रतलाम)। 26. णंदीसुतं चूर्णि, पृ० 69 /