Page #1
--------------------------------------------------------------------------
________________
December - 2003
११९
नेम-राजुल लेख
सं. डो. रसीला कडीआ
प्रस्तुत कृतिनी नकल ला.द.भा.विद्यामन्दिर, अमदावादना त्रूटक हस्तप्रत परथी करी छे. आ माटे हुं उपलब्ध करावनार श्री लक्ष्मणभाई भोजक तथा संस्थानो आभार मानुं छु.
नव भवनी प्रीतिने, मात्र जीवदयाथी प्रेराईने, छांडी जनार श्री नेमिकुमार (जैनोना २३मा तीर्थंकर) अने राजुलने विषय बनावी जैनोमां घj साहित्य रचायुं छे. अहीं पत्र स्वरूपे आ रचना बनी छे, नेमकुमारे रथ पाछो वाळ्यो छे. मनना ओरता मनमां ज रही जतां, राजुल कफोडी परिस्थितिमां मूकाई छे. जे व्यक्ति तोरणेथी ज पाछी फरी छे, तेने पत्र केवी रीते लखवो? लखे तो पहोंचाडाय केवी रीते ? पण पुराणी प्रीतनुं जोर एवं छे के लग्नना मांडवे तरछोडायेली, समाजमां आबरू गुमावेली कन्या पत्र लख्या विना रही शकती नथी. सूनी शय्या विरहनी वेदनाने भडकावे छे. अनेक विनवणीओ, पोतार्नु एकनिष्ठपणुं अने एकने मूकी जे बीजी करे छे ते आखरे छेह आपनारु छे एम जणावी, संसारना तबक्का दर्शावे छे अने कहे छे के वृद्धावस्थामां व्रत अने योग थाय. पत्र-कागळने मित्र बनाववा कहे छे अने अंते कवि कहे छे के आवा राजुल नेम शिवपुर-मोक्षनगरीमां मळ्या त्यारे ज तेना मननी आश पूरी थाय छे. आम अतिसुंदर भावोथी गूंथेल आ रचना नेम राजुलविषयक साहित्यमा उमेरारूप छे.
अंते कविओ पोताना गुरु श्रीविनयविजय उपाध्यायना उल्लेख साथे पोतानुं रूपविजय नाम जणाव्युं छे. रचनावर्ष कृतिना संपूर्णतासूचक वाक्य पछी आपवामां आव्युं छे ते प्रमाणे आ कृति संवत १८५६, मार्गशीर्ष सुदि ८ ना रोज लखाई छे.
-xस्वस्ति श्री रैवतगिरें, वाह्ना नेमजी जीवन प्राण रे लेख लखुं हुं से करी ? राणी राजुल चतुर सुजाण ॥१॥
Page #2
--------------------------------------------------------------------------
________________
१२०
अनुसंधान-२६
वाला घर आवज्यो, माहरा जीवन जादवराया, वार म लावज्यो वली जे होय वेधक जोण, तस संभलावज्यो, वली जे होय चतुर सुजाण, तेहनें जणावज्यो ॥२॥ आंकणी खेमकूसल वरते ईहां, वली जपतां प्रभुजीनुं नाम रे साहिबजी सुख शाता तणो, मुंने लखज्यो लेख अनाम ॥३॥ साव सोवन कागल करूं, वाला अक्षर रेण रचंत रे मणी मांणीक लेखण जडु, हुं तो प्रीउगुण प्रेम लखंत ॥४॥ वा० तोरणथी पाछा वळ्या, तेहनें कागल लखु केही रीत रे पण नवी रहे मन माहरु पण साले पूरण प्रीत ५ वा० ।। दिवस जिम तिम निगमुं, वाह्रा रयणी वरस हजार रे जो होवे मन मलवा तणो, तो वहिली करज्यो सार ॥६ वा० ॥ नवयोवन प्रीउ घर महि, वाह्ला वसवू ते दुरिजन पास रे। बोलें बोलें रे दाखवे, वाहला उंडी मरम वीश्वास ॥७ वा० ॥ सहू को रमेरे नीज मालीये, वाहला कामनी कंतसु हेज रे थर थर ध्रुजे मुझ देहडी, वाह्ला माहरी सुनी सेज विसेस ॥ ८ वा० ।। वीती हसे ते जाणस्ये, वाहला विरहनी वेदन पूर रे चतुर चित्तमां समझसे, स्युं जाणे मूरख भूर ॥९ वा०॥ पतंग रंग दीसे भलो, वाहला न ष(ख)मे तावड रीठ रे फाटे पण फीटे नहें, हुं तो वारी चोलमजीठ ॥१० वा० ॥ उत्तम जनसुं प्रीतडी, जिम जलमां ते तेलनी धाररे वीजा पोहोरनी छांहडी, ते तो वड जिम विस्तार ||११ वा०॥ दूर थकी पण सांभली, तिणे मन मलवा तणो थाय रे वालेसरू मुझ विनती, जिहां तिहां कही न जाय रे ॥१२ वा० ।।
Page #3
--------------------------------------------------------------------------
________________ December - 2003 121 एक मलें ने बीजो मले, मन मानहिं न सनेह रे लीधा ते मुकी जे करे, ते तो आष(ख)रे आपे छेह // 12 वा० // जे मन मेंहें मली रह्या, उत्तम ओपम तास रे जोज्यो ते पूर्व प्रीतडी, तेहनी जगमां रही सुवास !14 वा० / / षा(खा)वा पीवा पहेरवा, वाहला मनगमता सणगार रे भरयोवन प्रीउ घर नहीं, तेहनों एले गयो अवतार // 15 वा० / / बालपणेरे विद्या भणे रे, भरयोवन भोगवे भोग रे वृधपणे रे व्रत आदरे, ते तो अवीचल पाले व्योग (योग) // 16 वा०॥ कागल जग भलें सरजीओ, वाहला साधो ते मीत्र कहाय रे मननां रे दुःख मांडी ल, ते तो आंसुडे जल जाय // 17 वा० // लेख लाषी(खी)णो राजुल लख्यो, वाह्ला नेमजी गुण अभीरामरे अक्षरे अक्षर वांचज्यो, माहरी कोडाकोडी सलाम // 18 वा० // नेम राजूल सीवपूर मल्यां, पूगी ते मननी आस रे श्रीविनयवीजय उवझायनो, शिष्य रूपविजय उल्लास // 19 वा० इति श्री नेम-राजूल लेख संपूर्ण सं. 1856 मार्गशीर्ष सुदि 8 बुधे ल० अघरां शब्दोनी यादी : हेज = हेत, प्रीत भूर = भूरि-घणो चोलमजीठ = घेरा लाल रंगनी वनस्पति / लाल रंगनुं वस्त्र तावड = तडको ओपम = उपमा, सरखामणी हुंसे = होशे