Page #1
--------------------------------------------------------------------------
________________
: ५६६ : श्री जैन दिवाकरजी महाराज की गुरु-परम्परा श्री जैन दिवाकर- स्मृति-ग्रन्थ
श्री जैन दिवाकरजी महाराज की गुरु-परम्परा
* मधुरवक्ता श्री मूलमुनि जी
दर्शन, सिद्धान्त तथा विचार की दृष्टि से जैन-परम्परा अनादि है, शाश्वत है। किन्तु व्यक्ति की दृष्टि से प्रत्येक परम्परा का आदिसूत्र भी होता है। वर्तमान उत्सर्पिणी में जैन श्रमण परम्परा के आदिकर्ता तीर्थंकर भगवान श्री ऋषभदेव माने गये है । इन्हीं की पवित्र परम्परा में २४वें तीर्थंकर श्रमण भगवान महावीर थे। वर्तमान में विश्व में जहाँ भी जैन श्रमण या श्रावक विद्यमान है, उन सबके परमाराध्य - पुरुष भगवान महावीर हैं तथा अभी सभी श्रमण महावीरवंशीय कहलाते हैं ।
भगवान महावीर के पट्ट शिष्य थे सुधर्मा स्वामी । वर्तमान पट्टावली ( गुरु परम्परा ) की गणना उन्हीं के क्रम से की जाती है। सुधर्मा स्वामी के पश्चात् कुछ सौ वर्ष के बाद गुरु-परम्परा में शाखा प्रशाखाएँ निकलनी प्रारम्भ हुई जो आज तक भी निकलती जा रही हैं ।
श्री स्थानकवासी मान्यता के अनुसार भगवान महावीर निर्वाण के एक हजार वर्ष बाद श्रमण परम्परा में क्रमशः शिथिलता बढ़ती गई। आचार-विचार की से शुद्धता हटकर श्रमणवर्ग भौतिक सुख-सुविधा यश-वैभव की ओर मुड़ गया । लगभग १६वीं शताब्दी में वीर लोंका शाह ने आचार क्रांति का बिगुल बजाया जिससे प्रेरणा पाकर भाणाजी ऋषि ने पुनः शुद्ध-श्रमण परम्परा की विच्छिन्न कड़ी को जोड़ा। हमारी गणना के अनुसार भाणाजी ऋषि भगवान महावीर के ६२वें पाट पर होते हैं । उनके पश्चात् शुद्ध श्रमण परम्परा में ७२ वें पाट पर (हमारी परम्परा के अनुसार ) श्री दौलतरामजी स्वामी हुए। श्री दौलतरामजी स्वामी से गुरुदेव श्री चौथमलजी महाराज तक की परम्परा का वर्णन यहाँ प्रस्तुत है । इस परम्परा-पट्टावली में संभवत: अन्य परम्परा (गुर्वावली) वालों का मतभेद भी हो सकता है, हमने अपनी गुरु-अनुश्रुति के अनुसार यहाँ उल्लेख किया है ।
पूज्य श्री दौलतरामजी महाराज
पूज्य श्री दौलतरामजी महाराज ने लगभग १३ वर्ष की अल्पायु में ही फाल्गुन शुक्ला ५ को दीक्षा ली थी। आप काला पीपल ग्राम के बघेरवाल जाति के थे । पूज्य श्री दौलतरामजी महाराज पूज्यश्री हुक्मीचन्दजी महाराज दादा गुरु 1
आप अत्यन्त ही समर्थ विद्वान् एवं सूत्र सिद्धान्त के पारगामी थे । इनका विचरण क्षेत्र कोटा, बूंदी, मेवाड़, मालवा आदि था । आप एक बार विचरते हुए देहली पधारे। वहाँ के शास्त्रज्ञ श्रावक श्री दलपतसिंहजी से शास्त्रों का अध्ययन करने की जिज्ञासा प्रकट की । श्री दलपतसिंहजी ने कहा कि वे ' दसवैका लिकसूत्र' का अध्ययन करायेंगे। इस पर आपने अन्य शास्त्रों का अध्ययन कराने का भी अनुरोध किया । किन्तु श्री दलपतसिंहजी सहमत नहीं हुए। जब आप वहाँ से विहार करके अलवर पहुँचे तब आपके मन में विचार आया कि आखिर श्री दलपतसिंहजी ने 'दसर्वकालिकसूत्र' पर ही विशेष बल क्यों दिया ? इसमें अवश्य कोई रहस्य होना चाहिए। आप पुनः देहली पधारे और श्री दलपतसिंहजी से कहा, आप जो चाहें सो पढ़ाएँ। मुझे कोई आपत्ति नहीं है । इस प्रकार आपने श्री दलपतसिंहजी से "दसर्वकालिकसूत्र" के साथ-साथ अन्य ३२ सूत्रों का अध्ययन भी किया । उनके असाधारण ज्ञान-सम्पत्ति की प्रशंसा पूज्य श्री अजरामरजी महाराज ने सुनी । पूज्य श्री अजरामरजी स्वामी का आगमतेर ज्ञान भी बहुत बढ़ा-चढ़ा था। फिर भी आगम-ज्ञान प्राप्त
9
Page #2
--------------------------------------------------------------------------
________________
| श्री जैन दिवाकर-स्मृति-ग्रन्थ ||
चिन्तन के विविध बिन्दु : ५७० :
करने को आपको पूज्य श्री दौलतरामजी महाराज के पास ज्ञान-अभ्यास करने की इच्छा हई । इस इच्छा को ध्यान में रखकर लीमड़ी श्रीसंघ ने एक विशेष व्यक्ति के साथ पूज्य श्री दौलतरामजी महाराज की सेवा में तत्सम्बन्धी प्रार्थना-पत्र भेजा।
आचार्य प्रवर श्री दौलतरामजी महाराज उस समय कोटा-बूंदी की तरफ बिराजते थे। उन्होंने इस प्रार्थना को सहर्ष स्वीकार कर काठियावाड़ लीमड़ी की ओर विहार कर दिया। वह व्यक्ति भी महाराजश्री के साथ अहमदाबाद तक रहा। वह वहां से श्रीसंघ को बधाई देने और महाराज श्री के पधारने का शुभ सन्देश देने को लीमड़ी पहुँच गया। उस समय लीमड़ी श्रीसंघ के आनन्द का पार न रहा । श्रीसंघ ने उस व्यक्ति को १२५०) रु० भेंट किये।
पूज्य श्री दौलतरामजी महाराज के लीमड़ी पधारने पर श्रीसंघ ने भाव-भीना स्वागत किया।
पूज्य श्री अजरामरजी स्वामी पूज्य श्री दौलतरामजी महाराज से सूत्र-सिद्धान्त का रहस्य समझने लगे।
"समकितसार' के कर्ता पंडित मुनि श्री जेठमलजी महाराज जो मारवाड़ के पूज्य श्री अमरसिंहजी महाराज के सम्प्रदाय के थे, उन दिनों पालनपुर विराजते थे, वे भी शास्त्र अध्ययनार्थ लीमड़ी पधारे।
भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय के साधुओं में उस समय कितना पारस्परिक स्नेह था तथा उनमें ज्ञानपिपासा कितनी तीव्र थी यह उपरोक्त प्रसंग से स्पष्ट होता है।
पूज्य श्री दौलतरामजी महाराज ने बहुत समय तक विचरण कर पूज्य श्री अजरामरजी स्वामी को सूत्र-ज्ञान दिया।
पूज्य श्री दौलतरामजी महाराज के आग्रह से पूज्य श्री अजरामरजी महाराज ने जयपुर में एक चातुर्मास उनके साथ किया था।
पूज्य श्री दौलतरामजी महाराज के चार शिष्य प्रसिद्ध थे--(१) श्री गणेशरामजी, (२) श्री गोविन्दरामजी, (३) श्री लालचन्दजी, (४) श्री राजारामजी। उनमें भी पूज्य श्री लालचन्दजी महाराज विशेष प्रसिद्ध थे। पूज्य श्री लालचन्दजी महाराज
पुज्य श्री दौलतरामजी महाराज के पट्टधर पूज्य श्री लालचन्दजी महाराज अन्तरड़ी ग्राम के निवासी तथा सिलावट जाति के थे। वे एक कुशल चित्रकार थे। एक बार पूज्य श्री लालचन्दजी महाराज चित्र बनाते हुए अन्यत्र चले गये। उनकी चित्र सर्जन की सामग्री (रंग तुलिका आदि) कक्ष में ज्यों की त्यों खुली रखी थी। संयोग से एक मक्खी रंग में फंस गई और तड़प-तड़प कर मर गई । लौटने पर श्री लालचन्दजी महाराज ने उसे देखा और बड़े दुःखी हए, आपको वहीं वैराग्य उत्पन्न हो गया।
सौभाग्य से अन्तरड़ी में पूज्य श्री दौलतरामजी महाराज पधारे थे । आप उनके पास पहुंचे और दीक्षित होने का विचार प्रकट किया। इस तरह पूज्य श्री दौलतरामजी महाराज ने इन्हें दीक्षा दी और जैन-सम्प्रदाय को एक सुयोग्य रत्न मिला । कालान्तर में आप ही पूज्य श्री दौलतरामजी महाराज के पदाधिकारी हुए। आपकी उपस्थिति में ही उन दिनों कोटा सम्प्रदाय में २७
Page #3
--------------------------------------------------------------------------
________________
: ५७१ : श्री जैन दिवाकरजी महाराज की गुरु-परम्पारा श्री जैन दिवाकर स्मृति-ग्रन्थ
पंडित मुनिराज प्रसिद्ध हुए। ये विद्वान् पंडितगण जैन समाज की गौरव-गाथा का विस्तार चारों दिशाओं में कर रहे थे।
पूज्य श्री लालचन्दजी महाराज के नौ शिष्यों में से पूज्य श्री हुक्मीचन्दजी महाराज सुप्रसिद्ध हैं। आचार्य श्री हुक्मीचन्दजी महाराज
आपका जन्म टोंक के पास टोडा (रायसी) जयपुर स्टेट में हुआ था। आप एक सुसम्पन्न ओसवाल चपलोत गौत्रीय थे ।
एक समय पूज्य श्री लालचन्दजी महाराज का बंदी में शुभागमन हुआ। गृह कार्यवश श्री हुक्मीचन्दजी का भी बूंदी में आना हो गया। पूज्य श्री लालचन्दजी महाराज का वैराग्योत्पादक उपदेश श्रवण कर सं० १८७६ में मृगसर के शुक्ल पक्ष में आपने प्रबल वैराग्य से दीक्षा धारण की। तत्पश्चात् एक महान् धर्मवीर के रूप में पूज्यश्री हुक्मीचन्दजी महाराज रत्नत्रय की आराधना में जुट गए।
आपकी व्याख्या शैली शब्दाडम्बर से रहित सरल तथा वैराग्य से ओत-प्रोत भव्य जीवों के हृदय को सीधे छूने वाली थी। आपके हस्ताक्षर भी अति सुन्दर थे । आज भी आपके द्वारा लिखित शास्त्र निम्बाहेड़ा के ग्रन्थालय में सुरक्षित हैं। साथ ही १६ सूत्रों की हस्तलिखित प्रतियाँ अन्यत्र विद्यमान हैं।
आपने निरन्तर २१ वर्षों तक बेले-बेले (छठ) तप किया था। आप केवल एक ही चद्दर का सदा उपयोग करते थे चाहे भयंकर शीत हो या ग्रीष्मऋतु । आप प्रतिदिन दो सौ "नमोत्थुणं" का स्मरण जीवन-पर्यन्त करते रहे। आपने मिष्ठान्न तथा तली हई चीजों का जीवन-पर्यन्त के लिए त्याग कर दिया था, केवल १३ द्रव्य रखकर शेष सभी द्रव्यों का आजीवन के लिए त्याग किया था । आप नींद बहुत ही कम लेते थे। आपने अपने गुरुजी से धर्म-प्रचार हेतु आज्ञा प्राप्त कर हाड़ोती प्रान्त मेवाड़ मालवा आदि के अनेक गांवों में भ्रमण करते हुए धर्म-प्रचार किया।
आपके धर्म-प्रचार से श्रीसंघों में आशातीत धर्म-ध्यान एवं तपोन्नति हुई तथा पूज्यश्री के उच्चकोटि के आचार-विचार के प्रति जनगण सश्रद्धा नतमस्तक हो उठा । आपके स्पर्शमात्र से रामपुरा के एक कुष्टी का कुष्ठ रोग तिरोहित हो गया। इसी प्रकार एक दीक्षार्थिनी की हथकड़ियां भी आपके दर्शनों से टूट गईं। आपके तपोबल से नाथद्वारा के व्याख्यानस्थल पर नम से रुपयों की वर्षा हुई थी।
आपके गुरु पूज्य श्री लालचन्दजी महाराज ने अपने व्याख्यान में कहा था कि हक्मीचन्दजी तो साक्षात् चौथे आरे के नमूने हैं । ये एक पवित्र आत्मा व उत्तम साधु तथा अद्भुत क्षमा के मंडार हैं।'
पूज्य श्री हुक्मीचन्दजी महाराज ने साधुओं के नियमों-उपनियमों में शास्त्रानुसार बहुत सुधार किये। आपने एवं आपके साथी मुनि श्री शिवलालजी महाराज ने वि० सं० १६०७ में बीकानेर में ठाणा ४ से चातुर्मास किया । आपके प्रभाव से महान् धर्मोन्नति हुई । आपके उपदेश से ४ दीक्षार्थी तैयार हुए। दीक्षा के समय पांच नाई आए किन्तु दीक्षार्थी चार ही थे । अतः पाँचवां नाई निराश हुआ। उस समय एक भाई तत्काल तैयार होकर बोला, "ले भाई नाई, निराश मत हो, मैं दीक्षा लेने को तैयार हैं।" इस प्रकार पाँच दीक्षाएँ एक साथ एक ही दिन में हुई।
Page #4
--------------------------------------------------------------------------
________________
श्री जैन दिवाकर स्मृति ग्रन्थ
इस चातुर्मास के पश्चात् ही आप ६ ठाणा बन गए। पूज्य श्री हुक्मीचन्दजी महाराज ने चार ही संघ की साक्षी से श्री शिवलालजी महाराज को आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया। उनके लिए यह विरद सुशोभित होता है— 'क्रियोद्धारक प्रातः स्मरणीय पूज्य श्री हुक्मीचन्दजी महाराज ।
चिन्तन के विविध बिन्दु ५७२
इस तरह लगभग ३० वर्ष ५ मास तक शुद्ध संयम का परिपालन कर विक्रम सं० १९१७ बैसाख शुक्ल ५ मंगलवार को जावद में आपका संधारा समाधि पूर्वक स्वर्गवास हुआ।
जैन दिवाकर प्रसिद्ध वक्ता श्री चौथमलजी महाराज ने एक पद्य में आपके विषय में कथन किया है कि आप आउष्टक विमान में देवपने उत्पन्न होकर महाविदेह क्षेत्र में राज्य वंश में बलदेव की पदवी प्राप्त कर मोक्ष में पधारेंगे। जैन दिवाकरजी महाराज ने परम्परा से सुना था कि पूज्य श्री के देवलोक होने के बाद उनके पात्र पर स्वर्णाक्षरों में यह सब लिखा हुआ था जो बाद में मिट गया ।
पूज्य श्री शिवलालजी महाराज
पूज्य श्री दौलतरामजी महाराज के जिन चार प्रसिद्ध शिष्यों का ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, उनमें श्री गोविन्दरामजी महाराज भी थे, जिनके शिष्य श्री दयालजी महाराज थे। श्री दयालजी के ही शिष्य श्री शिवलालजी महाराज थे । आपकी दीक्षा रतलाम में वि० सं० १८६१
में हुई थी। आपका जन्मस्थान धामनिया ( नीमच ) मध्य प्रदेश था।
आप भी पूज्य श्री हुक्मीचन्दजी महाराज की तरह की शास्त्र मर्मज्ञ, स्वाध्यायी, आचारविचार में महान् निष्ठावान तथा परम श्रद्धावान थे । आपने लगातार ३२ वर्ष तक एकान्तर उपवास किया था। आप केवल तपस्वी ही नहीं, अपितु पूर्ण विद्वान् स्व-पर मत के पूर्ण ज्ञाता व समर्थ उपदेशक थे । आप भक्ति भरे जीवनस्पर्शी उपदेशात्मक कवित्त व भजन आदि की रचना भी करते थे।
आप पूज्य श्री हुक्मीचन्दजी म० के साथ ही विचरण करते थे। कोई जिज्ञासु यदि पूज्य हुक्मीचन्दजी महाराज से प्रश्न करता तो उसका उत्तर प्रायः आप ही दिया करते थे । इसका कारण पूज्य श्री हुक्मीचन्दजी महाराज की मौनावस्था में रहने की प्रवृत्ति थी ।
जब पूज्य श्री हुक्मीचन्दजी महाराज का सन्त समुदाय अत्यधिक सन्तों से कहा कि हे सन्तों ! मुनि शिवलालजी हो आप सबके आचार्य हैं। ने पूज्य श्री हुक्मीचन्दजी महाराज का आदेश शिरोवार्य किया और महाराज को अपना आचार्य मान लिया। आपको आचार्य पद सं० दिया गया ।
बढ़ गया तब उन्होंने इस प्रकार सभी सन्तों उन्होंने श्री शिवलालजी १९०७ में बीकानेर में
काल में
पूज्य श्री शिवलालजी महाराज ने भी जैन समाज व शासन का समुत्थान किया । वर्तमान 'पूज्य श्री हुक्मीचन्दजी महाराज के सम्प्रदाय के जितने भी मुनि व सन्त हैं सब आप ही के शिष्य प्रशिष्य परिवार में हैं। आप ही कुलाचार्य भी है।
पूज्य श्री हुक्मीचन्दजी महाराज ने शिष्य बनाने के त्याग कर लिए थे अतएव जो शिष्य बने वह पूज्य श्री शिवलालजी महाराज के बने ।
Page #5
--------------------------------------------------------------------------
________________
: ५७३ : श्री जैन दिवाकरजी महाराज की गुरुपरम्परा श्री जैन दिवाकर स्मृति ग्रन्थ
पूज्य श्री शिवलालजी महाराज
श्री हर्षचन्द्र जी महाराज
श्री राजमलजी महाराज ( आपका शिष्य परिवार वर्तमान में बहुत विस्तृत है)
आचार्य श्री उदयसागरजी महाराज
आचार्य श्री चौथमलजी महाराज
आचार्य श्री मन्नालालजी महाराज
आचार्य श्री खूबचन्दजी महाराज
आचार्य श्री सहसमलजी महाराज
पूज्यश्री हुक्मीचन्दजी महाराज के समय में अर्थात् विक्रम सं० १८७८ कंजार्डा गाँव में दयारामजी भंडारी के घर में पुत्र रत्न का जन्म हुआ । जिनका नाम रत्नचन्द रखा गया । बालक की शिक्षा के पश्चात् इन्हीं रतनचन्दजी का इन्दौर रियासत में बड़कुआ निवासी गुलराजजी पटवारी की सुपुत्री राजकुंवर के साथ विवाह सम्बन्ध हुआ ।
श्री चतुर्भुजजी महाराज
श्री लालचन्दजी महाराज
श्री केवलचन्दजी महाराज (बड़े)
श्री केवलचन्दजी महाराज (छोटे)
श्री रतनचन्दजी महाराज
( आपके लगभग २७ शिष्य - प्रशिष्य हुए )
पूज्य श्री मन्नालालजी महाराज
वि. सं० १९०३ में प्रथम पुत्र उत्पन्न हुआ । जिसका नाम जवाहरलाल रखा गया । वि० सं० १९०२ आषाढ़ शुक्ला चतुर्थी में द्वितीय पुत्र उत्पन्न हुआ जिनका नाम हीरालाल रखा गया और वि०सं० १६१२ भाद्रपद शुक्ला छठ सोमवार को तृतीय पुत्र उत्पन्न हुआ जिनका नाम नन्दलाल
रखा गया ।
सं० १९१४ विद्वद्वर मुनिश्री राजमल जी महाराज का शिष्य मंडली सहित कंजार्डा में पधारना हुआ। उनकी अमृत वाणी सुनकर रतनचन्दजी को वैराग्य जागृत हुआ। उन्होंने दीक्षा लेने का विचार अपनी पत्नी राजकुँवर और साले देवीचन्दजी के सामने रखे । अनेक उत्तर प्रत्युत्तर होने के पश्चात् ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी सं० १९९४ के पवित्र दिन राजमलजी महाराज के पास श्री रतनचन्दजी व श्री देवीचन्द जी दोनों ने संयम स्वीकार किया । इन दोनों के संयम के समय मगनमलजी सोनी और हीरालालजी पटवा को भी वैराग्य उत्पन्न हो गया था ।
दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात् दोनों मुनियों ने पूज्य श्री हुक्मीचन्दजी महाराज की सम्प्र दाय के अपने गुरुश्री राजमलजी महाराज से जैनागम तथा आत्मबोध का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया ।
विक्रम सं० १६१६ को भावी पूज्य पं० मुनि श्री चौथमलजी महाराज अपने शिष्य समुदाय के साथ कंजार्डा पधारे। जिनका सारगर्भित प्रवचन सुनकर जवाहरलालजी के हृदय में गहरा प्रभाव पड़ा। जिन्होंने जीवनपर्यन्त ब्रह्मचर्य व्रत स्वीकार किया ।
उनकी मातेश्वरी को इस प्रत्याख्यान का पता लगा, तब पुत्र को भांति-भांति से समझाया।
Page #6
--------------------------------------------------------------------------
________________
श्री जैन दिवाकर-स्मृति-ग्रन्थ ॥
चिन्तन के विविध बिन्दु : ५७४ :
परन्तु उन्होंने अपना दीक्षा का विचार पक्का कर लिया। विक्रम सं० १९२० में भावी पूज्य श्री चौथमलजी महाराज और मुनिश्री रतनचन्दजी महाराज का चातुर्मास फलौदी मारवाड़ में था। तब कंजार्डा का श्रीसंघ पहुँचकर मुनिश्री से निवेदन किया कि चातुर्मास के पश्चात् आप विहार कंजार्डा की तरफ कराने की कृपा करें। कारण श्री रतनचन्दजी महाराज का शेष सारा कुटुम्ब दीक्षा ग्रहण करने वाला है । मुनिश्री ने विनती स्वीकार की। चातुर्मास के पश्चात् विहार करते हए कंजार्डी पधारे। उन पधारने वाले मुनिराजों में श्रीमद जैनाचार्य शिवलालजी महाराज, श्री राजमलजी महाराज, भावी पूज्य श्री चौथमलजी महाराज, श्री रतनचन्दजी महाराज और श्री देवीचन्दजी महाराज आदि आठ मुनिराज थे। इनके अतिरिक्त श्री रंगूजी महासतीजी महाराज श्री नवला जी महासतीजी महाराज और श्री ब्रजजी महासती जी महाराज का शुभ आगमन भी कंर्जाडा में हुआ।
पौष शुक्ला छठ सं० १९२० के पवित्र दिन श्रीमती राजकंवर बाई ने अपने तीनों पुत्रों (जवाहरलालजी, हीरालालजी नन्दलालजी) को दीक्षा दिलवाई । और स्वयं भी दीक्षित हो गई। पूज्य श्री ने राजकवर बाई को दीक्षा देकर महासतीजी श्री नवलाजी महाराज की शिष्या घोषित की।
इसी प्रकार मुनि जवाहरलालजी महाराज को मुनि श्री रतनचन्दजी के शिष्य और मुनिश्री हीरालालजी महाराज, मुनिश्री नन्दलालजी महाराज को, मुनिश्री जवाहरलालजी महाराज के शिष्य घोषित किये।
जैसेविद्वद्वर पं० श्री राजमलजी महाराज के शिष्य
श्री रतनचन्दजी महाराज
श्री जवाहरलालजी महाराज
श्री हीरालालजी महाराज
श्री नन्दलालजी महाराज
मुनिश्री माणकचन्दजी महाराज मुनिश्री चेनरामजी महाराज मुनिश्री लक्ष्मीचन्दजी महाराज
आगे की शिष्य-परम्परा संलग्न चार्ट में देखें।
Page #7
--------------------------------------------------------------------------
________________
परमश्रद्धेय विद्वद्वर श्रीराजमलजी महाराज की शिष्य-परम्परा
श्री रतनचन्दजी महाराज
(आपके प्रमुख शिष्य) गुरु श्री जवाहरलालजी महाराज
कविवर श्री हीरालालजी म० श्री चैनरामजी म० वादीमानमर्दक श्री नन्दलालजी म० श्री लक्ष्मीचन्दजी म० श्री माणकचन्दजी म०
पं० श्रीदेवीलालजीम० श्री साकर | त० बड़े हजारी- श्री गुलाब- श्री मूलचन्द श्री रायचन्द- पू० श्री खूब-श्री नरसिंह श्री मन्ना-| मेवाड़ भूषण । चन्दजी म०, मलजी म० चन्दजी म० जी म० । जी म० चन्दजी म० दासजी म० लालजी म० श्री प्रतापमलजी म० पू० श्री सहसमल जैन दिवाकर श्री चौथमल छोटे हजारी- श्री शोभा- तपस्वी श्रीमया- श्री भगवान श्री भोप त० छोटेलाल श्री नाथूलाल श्री लक्ष्मीचन्द जी म० जी म० (आपके ३२ शिष्य) मलजी म. लालजी म० चन्दजी म० जो म० जी म. जी म. जी मै० जी म० सेवाभावी श्री बड़े नाथूलालजी म० तपस्वी श्री छोटे चम्पालालजी म० । तपस्वी श्री छबलालजी म. प्रवर्तक श्री हीरालालजी म० | मालवरत्न उपाध्याय श्री हजारी- श्री हरकचन्द
तपस्वी श्री दीपचन्दजी म० मधुर व्याख्यानी तपस्वी श्री कस्तुरचन्दजी म० । मलजी म० । जी म०
नवीन मुनिजी म० श्रीचन्दनमुनिजी म० श्रीवृद्धिचन्दजी म०
सलाहकार श्री श्री सुखलाल श्री राजमल
केसरीमलजी म० जी म. जी म० श्री शोभालाल श्री मिश्रीलालजी म० बालकवि श्री सुभाषमुनिजी म.
जी म०
श्री नगराजी म० कवि श्री रंगभजनान्दो श्री नानकरामजी म० तपस्वी श्री लाभचन्दजी म०
पं० श्री ईश्वर लालजी म० मुनिजी म०
श्री अरुणमुनिजी म.
श्री सुरेशमुनिजी म० -
Page #8
--------------------------------------------------------------------------
________________ जगतवल्लभ जैनदिवाकर प्रसिद्धवक्ता श्री चौथमलजी म० के शिष्य-प्रशिष्य स्वा० श्री इन्दरमल त० श्री मोहनलाल जी म० श्री हुक्मीचन्दजी म० श्री कजोड़ी (बड़ा) मलजी म० पं० श्री शंकर- श्री किशन लालजी म. लालजी म० श्री भैरुलालजी म० श्री रतन लालजी म. श्री नन्दलाल- श्री हुक्मीचन्दजी जी म०म० (छोटा) जी म० उपाध्याय श्री प्यार- कविश्री चम्पालालजी म० कविश्री केवल- तपस्वी श्री विजयराजजी म० त० श्री बसन्तीचन्दजी म० चन्दजी म० लालजी म० श्री सागरमलजी म० श्री ताराचन्दजी म० / प्रवर्तक श्री वृद्धिचन्दजी म०, सेवाभावी श्री सन्तोषचन्दजी म० प्र वर्तक श्री मगनलालजी म० तपस्वी श्री नेमीचन्दजी म० श्री दिनेश मुनिजी म० / / तपस्वी मंगलचन्दजी म० तपस्वी श्री गौरीलालजी म. तपस्वी श्री विमल तपस्वी सागर- अवधानी श्री अशोक / मुनिजी म० पं 0 श्री भगवती मुनिजी म० मलजी म० मुनिजी म० तपस्वी श्री मेघ सेवाभावी श्री सुदर्शन श्री वीरेन्द्र मुनिजी म० राजजी म० मुनिजी म. मधुरवक्ता श्री मूलचन्दजी म० व्याख्यानी श्री ऋषभ मुनिजी म० मधुर गायक श्री प्रमोद मुनिजी म० पं० श्री वर्द्धमान जी म०, श्री मन्नालालजी, म० त० श्री वक्तावरमलजी म०, श्रीगणेश मुनिजी म०, तपस्वी श्री पन्नालालजी म०, पं० श्री उदय मुनिजी म०