Book Title: Jain Agamo me Swadhyaya
Author(s): Hastimal Acharya
Publisher: Z_Jinvani_Acharya_Hastimalji_Vyaktitva_evam_Krutitva_Visheshank_003843.pdf
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ [ ३ ] जैन आगमों में स्वाध्याय सर्व विदित बात है कि स्वाध्याय के अभाव में बड़े से बड़ा साधन-सम्पन्न सम्प्रदाय भी सुरक्षित नहीं रह सकता । जैन शासन में स्वाध्याय का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है । स्वाध्याय ध्यान का महत्त्वपूर्ण अवलम्बन और श्रमण जीवन को अनुप्राणित करने वाला है। प्रत्येक श्रमण एवं श्रमणी की दिनचर्या में स्वाध्याय का प्रमुख स्थान है। चारों काल स्वाध्याय नहीं करने पर श्रमण को प्रतिक्रमण करना होता है । 'भगवती सूत्र' में गौतम स्वामी के प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रभु ने स्बाध्याय के पाँच प्रकार बतलाये हैं। १. वाचना, २. पृच्छना, २. पर्यटना, ४. अनुप्रेक्षा, ५. धर्मकथा । बिना पठन-पाठन के ज्ञान-वृद्धि नहीं होती, इसलिए सर्व प्रथम वाचना रखा गया है। दूसरे में पठित विषयों में शंकाओं का समाधान करने और ज्ञातव्य विषय को समझने हेतु पृच्छा होती है, यह स्वाध्याय का दूसरा भेद हैं। तीसरे में ज्ञात विषय को स्थिर करने हेतु परावर्तन-रूप स्वाध्याय होता है। परावर्तन उपयोग पूर्वक हो और स्वाध्यायी उसमें आनन्दानुभूति प्राप्त कर सके। एतदर्थ चौथे में अनुप्रेक्षा-चिंतन रूप स्वाध्याय बतलाया है । शास्त्रवाणी से प्राप्त ज्ञान के नवनीत को जनता में वितरण करने को धर्मकथा-रूप पाँचवाँ स्वाध्याय है । स्वाध्याय की व्याख्या में प्राचार्यों ने इस प्रकार विवेचन किया है __ अध्ययन' को अध्याय कहा है, सुन्दर उत्तम अध्याय ही स्वाध्याय है। अच्छी तरह मर्यादा-पूर्वक पढ़ना भी स्वाध्याय है। अच्छी तरह मर्यादा के साथअकाल को छोड़कर अथवा पौरुषी की अपेक्षा काल-अकाल का ध्यान रखकर पढ़ना स्वाध्याय कहलाता है। उपरोक्त वचन के अनुसार जिन प्ररूपित द्वादशांग-सूत्रवाणी को विद्वानों ने स्वाध्याय कहा है । इसी को 'सुयनारणं-सुज्झानो' पद से श्रुतज्ञान को स्वाध्याय से अभिन्न कहा है। १. अध्ययन अध्यायः शोभनोऽध्यायः स्वाध्यायः ।प्रा०। अथवा सुष्ठु आ मर्यादया अधयिते इति स्वाध्यायः । स्थ. २।। सुष्ठु प्रा-मर्यादया-कालवेला परिहरिण पौरुष्य पक्षेयावा अध्यायः-अध्ययनं स्वाध्यायः ।घ.३ अधि.। Jain Educationa International For Personal and Private Use Only Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ • २८८ • व्यक्तित्व एवं कृतित्व ___ स्व. याने आत्म गुण अथवा स्व-सिद्धान्त का जिससे ज्ञान हो, वैसे सद्ग्रंथों का पठन-पाठन भी स्वाध्याय कहा जाता है। स्वाख्याय योग्य श्रुत: श्रुतज्ञान के १४ और २० भेद भी किये गये हैं। परन्तु पठन-पाठन की दृष्टि से दो ही भेद उपयुक्त होते हैं-सम्यक्श्रुत और मिथ्याश्रुत । अनुयोग द्वार सूत्र में लौकिक और लोकोत्तर भेद से भी कथन किया गया है। अल्पज्ञ-छद्मस्थों के द्वारा स्वेच्छा से जिन ग्रन्थों की रचना की गई है उनको मिथ्याश्रुत या लौकिक श्रुत कहते हैं । लौकिक श्रुत एकान्त हितकरी नहीं होते । सरागियों की वाणी वीतराग वाणी के आश्रित होने पर ही सम्यक्श्रुत होकर पठनीय हो सकती है। रागादि दोष से दूषित होने के कारण वह शास्त्र अचूक मुक्तिमार्ग नहीं बता सकता । मुमुक्षु जीवों के लिए वीतराग वाणी या उसके अनुकूल छद्मस्थ वाणी भव-बन्धन काटने में समर्थ होती है । सरागियों के वचन दोषयुक्त होने के कारण कभी-कभी पाठक या श्रोता के मन मोह उत्पन्न कर उनको भवसागर में भटका देते हैं । वीतराग भाषित सम्यक्श्रुत में ये दोष नहीं होते हैं, क्योंकि काम, क्रोध, लोभादि विकारों के सम्पूर्ण क्षय से वीतराग निर्दोष है । निर्दोष वाणी श्रोताओं में भी उपशम रस का संचार करती है और अनादि संचित दोषों का उपशम करती है। इसलिए कहा है श्लोको वरं परम तत्त्ब-पथ-प्रकाशी, न ग्रंथ कोटि-पठनं जन-रंजनाय । संजीवनीति वरमौषध मेकमेव, व्यर्थ-श्रमस्य 'जननो न तु' मूल भारः ।। परमतत्त्व को प्रकाशित करने वाला एक भी श्लोक करोड़ों ग्रन्थों से अच्छा है, व्यर्थ का भार देने वाले मूलों के ढेर से संजीवनी का एक भी टुकड़ा अच्छा है । मोक्ष साधन के दुर्लभ चतुरंगों में इस प्रकार की धर्मश्रुति को दुर्लभ कहा गया है । मनुष्य तन पाकर भी हजारों लोकधर्म की श्रुति अनायास नहीं पाते, जिसको सुनकर जीव तप-शांति और अहिंसा भाव को प्राप्त करें, ऐसे सद्ग्रन्थों का श्रवण अत्यन्त दुर्लभ है । जैसे कि कहा है जं सुच्चा पड़िवज्जति, तवं खंति महिंसयं ।। उ० ३ ।। सम्यक् श्रुत धर्मकथा प्रधान होता है, वहाँ अर्थकथा और कामकथा को महत्त्व नहीं मिलता-आत्म स्वरूप का ज्ञान होने से सम्यक् श्रुत के द्वारा जीव को स्वरूपामिमुख गति करने को प्रेरणा मिलती है । अतः स्वरूप और आत्मगुण का अध्ययन होने से ही सम्यक्श्रुत का पठन-पाठन स्वाध्याय कहा गया है। Jain Educationa International For Personal and Private Use Only Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ • प्राचार्य श्री हस्तीमलजी म. सा. • २८९ स्वाध्याय और समाधि : चार प्रकार की समाधियों में श्रुत भी दूसरे नम्वर का समाधि-स्थान माना गया है। जैसे 'चत्ताणि विणय समाहिट्टाणा पन्नता । तंजहा-विणयसमाही, सुयसमाही सव समाही, आयार'समाही । शास्त्र ज्ञान के अध्ययन और परिशीलन से आत्मा को शारीरिक एवं मानसिक समाधि की प्राप्ति होती है । अतः अनेक प्रकार के समाधि स्थानों में 'श्रुत स्वाध्याय' को भी समाधि का एक कारण माना है। श्रुतवान ही तप और प्राचार की सम्यक् साधना कर पाता है। इसलिए 'श्रुत समाधि' के पश्चात् 'तप-समाधि' और 'आचार-समाधि' का उल्लेख किया गया है। श्रुत समाधि में जिज्ञासु शिष्य ने विनयपूर्वक गुरु से पृच्छा की कि शास्त्र क्यों पढ़े जायं ? और उनसे कौनसी समिति प्राप्त होती है ? उत्तर में प्राचार्य ने कहा-(१) श्रुत ज्ञान का लाभ होगा, इसलिए पढ़ो। (२) चित्त की चंचलता दूर होकर एकाग्रता प्राप्त होगी, इसलिए पढ़ो। (३) आत्मा को धर्म में स्थिर कर सकोगे, इसलिए पढ़ो। (४) स्वयं स्थिर होने पर दूसरों को स्थिर कर सकोगे, इसलिए पढ़ो । एकाग्रता प्राप्त होना ही समाधि है। तप में स्वाध्याय का स्थान : स्वाध्याय का मोक्ष मार्ग में प्रमुख स्थान है । श्रुताराधन का स्थान ज्ञान और तपस्या दोनों में आता है । बारह प्रकार के तप में स्वाध्याय चौथा अन्तरंग तप है, स्वाध्याय के द्वारा मन वौर वाणी का तप होता है। स्वाध्याय परमं तपः-मन के विकारों को शमन करने और धर्म-ध्यान का आलम्बन होने से स्वाध्याय परम तप है । अनशन आदि बाह्य तप शरीर से लक्षित होते हैं, पर स्वाध्याय अन्तरंग तप होने से लक्षित नहीं होता, अतः यह गुप्त तप है। शास्त्र का वाचन और शिक्षण क्यों ? ___ 'स्थाणांग सूत्र' में शास्त्र की वाचना क्यों करना और शिष्य को शास्त्र का शिक्षण क्यों लेना, इस पर विचार किया है । सूत्र की वाचना के पाँच कारण बतलाये हैं-(१) वाचना से श्रुत का संग्रह होगा। (२) शिष्य का उपकार होगा और श्रुतज्ञान से उपकृत होकर शिष्य भी प्रेम से सेवा करेगा। (३) ज्ञान के प्रतिबंधक कर्मों की श्रुत पाठ से निर्जरा होगी। अभ्यस्त श्रुत विशेष स्थिर होगा। (५) वाचना से सूत्र का विच्छेद भी नहीं होगा और अविच्छिन्न परम्परा Jain Educationa International For Personal and Private Use Only Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ • २६० से शास्त्र ज्ञान चलता रहेगा । जैसे कहा है – पंचाहें ठाणेहिं सुत्तंवाएज्जा, तंजहा १. संग्रहट्टयाए, २, उवग्गहट्टयाए, ३, निज्जरट्टयाए, ४. सुत्तेवामे पज्जवजाए भविस्सए - ५. सुत्तस्सवा प्रवोच्छित्तिनयट्टयाए । ठा० ।। व्यक्तित्व एवं कृतित्व सूत्र सीखने के भी पाँच कारण बतलाये हैं, जैसे - १. ज्ञान की वृद्धि के लिए २. सम्यग् दर्शन की शुद्धि और रक्षा के लिए ३. शास्त्र ज्ञान से चारित्र की निर्मलता रहेगी, इसलिए सूत्र सीखें ४. मिथ्यातत्त्व आदि के अभिनिवेश से छुटकारा पाने के लिए अर्थात् मिथ्यात्व प्रादि दोषों से मुक्त होने के लिए ५. यथावस्थित भावों का ज्ञान करने के लिए सूत्र सीखना चाहिए। कहा भी है- पंचहि - ठाणेहि सुत्तं सिक्खेज्जा, तंजहा - १ णाणट्टयाए - २ दंसणट्टयाए - ३ चरितट्टयाए ४ वग्गहविमोयणट्टयाए - ५ ग्रहवत्थंवा भाए जाणिस्सामित्ति कट्टू । स्वाध्याय के लिए आचार्यों ने अन्य हेतु भी दिये हैं- १. बुद्धि की निर्मलता, २ . प्रशस्त अध्यवसाय की प्राप्ति. ३. शासन रक्षा, ४, संशय निवृत्ति, ५. परवादियों के शंका का निरसन, ६. त्याग तप की वृद्धि व अतिचार शुद्धि आदि के लिए स्वाध्याय किया जाता है - तत्त्वार्थ राजवार्तिक । स्वाध्याय से लाभ : स्वाध्याय से ज्ञानावरणी कर्म का क्षय होता है । वाचना से ज्ञानावरण यदि कर्म की निर्जरा होती है और सूत्र की वाचना से प्रशतना टलती है । विधिपूर्वक शास्त्र की वाचना देने से श्रुतयान रूप तीर्थ धर्म का अवलम्बन करने से महती कर्म निर्जरा और महान् संसार का अन्त होता है । वाचना करने वाले को पृच्छना करनी पड़ती है । पृच्छना करने से सूत्र अर्थ और तदुभय त्रुटियाँ दूर होती और सूत्रादि की शुद्धि होती है तथा अध्ययन विषय की विविध आकांक्षाएँ, जो मन को अस्थिर करती हैं, कांक्षा मोहनीय के नाश से नष्ट हो जाती हैं । स्थिरीकरण के लिए पठित विषय का परावर्तन किया जाता है । परावर्तन से भूले हुए अक्षर याद होते और विशेष प्रकार के क्षयोपशम से पदानुसारी आदि व्यंजनलब्धि प्राप्त होती है । चितनरूप अनुप्रेक्षा भी स्वाध्याय है । चिन्तन से आयुकर्म को छोड़ सात कर्म प्रकृतियों को दृढ़ बन्धन से शिथिल बन्धन वाली करता है, दोर्घकाल की स्थिति को छोटी करता है और तीव्र रस को घटाकर मन्दरस करता है । बहुप्रदेशी प्रकृतियों को अल्प प्रदेश वाली कर देता एवं प्रयुकर्म कभी बांधता, कभी नहीं भी बांधता है । असात और कर्कश वेदनीय कर्म का उपचय नहीं करता । चिन्तन करने वाला अनादि-अनन्त, दीर्घमार्ग वाले चतुर्गत्तिक संसार कान्तार को अल्प समय में ही पार कर लेता है । Jain Educationa International For Personal and Private Use Only Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ • प्राचार्य श्री हस्तीमलजी म. सा. • २६१ धर्मकथा से कर्मों की निर्जरा होती और प्रभावशाली कथा से शासन की प्रभावना होती है । शासन की प्रभावना करने वाला भविष्य के लिए निरन्तर भद्ररूप शुभानुबन्धी कर्म का संचय करता है। श्रमण चर्या में स्वाध्याय : जिस प्रकार प्रतिलेखन, प्रमार्जन, प्रतिक्रमण, वैयावृत्यकरण और ध्यान नियत कर्म है, ऐसे स्वाध्याय भी श्रमण वर्ग का नियत कर्म है। सदाचारी अध्याय में कहा गया है कि प्रातःकाल प्रतिलेखन करके साधुगुरु से विनयपूर्वक यह पृच्छा करे- 'भगवन्' मुझे अब क्या करना चाहिये, वैयावच्च या स्वाध्याय जो करना हो उसके लिए आज्ञा चाहता हूँ । २६९ गुरुसेवा में नियुक्त करें तो बिना ग्लानि के सेवा करें जौर स्वाध्याय की अनुमति प्रदान करें तो सर्वदुःख मोचन स्वाध्याय करे ।उ०।२६।६-१०॥ आगे कहते हैं—“पढ़मं पोरिसि सज्जायं, बीयंझाणं झियायइ।" प्रथम प्रहर में स्वाध्याय करना और दूसरे में ध्यान अर्थात् अर्थ का चिन्तन करना, तीसरे प्रहर भिक्षा और चौथे पहर में फिर स्वाध्याय करना । ऐसा रात्रि के प्रथम, द्वितीय एवं चतुर्थ पहर के लिए समझना । केवल नियत कर्म बता के ही नहीं छोड़ा, किन्तु स्वाध्याय के समय स्वाध्याय नहीं करने के लिए प्रतिक्रमण में आयोजन भी किया गया है । जैस “पडिक्कमायि चाउक्कालं सज्झायस्स अकरण्याए।" आव०॥ चारों काल स्वाध्याय नहीं किया हो उसका प्रतिक्रमण करता हूँ। स्वाध्याय की विधि : साधुओं का अपना निराबाध स्वाध्याय होता रहे, इसके लिए स्वतन्त्र रूप से स्वाध्याय भूमि की गवेषणा करते और वहाँ विधिपूर्वक स्वाध्याय किया करते थे। शास्त्र-पाठ मंगल और देवाधिष्ठित माना गया है। इसके लिए उसका अध्ययन करने के पूर्व यह देख लेना आवश्यक है कि आस-पास कहीं अस्थि या कलेवर आदि तो नहीं है । यदि अस्वाध्याय की कोई वस्तु हो, तो उसे मर्यादित भूमि से बाहर डालकर गुरु को निवेदन कर देना चाहिए और फिर गुरुजी की आज्ञा पाकर उपयोगपूर्वक अध्ययन करना-यह सामान्य विधि है। प्राचीन समय में प्रथम पहर में सूत्र का स्वाध्याय और द्वितीय पहर में अर्थ का चिन्तन किया जाता था, इसलिए प्रथम सूत्र पौरुषी और दूसरी अर्थपौरुषी कही जाती थी। जैसा कि कहा है-“उत्सग्गेणं पढ़मा, दृग्घड़िया सुत्त पोरिसी भणिया। विइयाय अत्थ विसया, निद्दिट्ठा दिट्ठसमएहि" ।१। विधि Jain Educationa International For Personal and Private Use Only Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २६२ · पूर्वक श्रुत का आराधन करने के लिए आठ आचार बताये गये हैं - १. जिस शास्त्र का जो काल हो, उसको उसी समय पढ़ना कालाचार है । २. विनयपूर्वक गुरु को वंदन कर पढ़ना, विनयाचार है । ३. शास्त्र एवं ज्ञानदाता के प्रति बहुमान होना, बहुमानाचार है । ४. तप-प्रायंबिल या नीबी करके पढ़ना, उपधान आचार है । ५. शब्दों में ह्रस्व-दीर्घादि का शुद्ध प्राचरण करना, व्यंजनाचार हैं । ६. सम्यग् अर्थ की विचारणा, अर्थाचार है । ७. मूल एवं अर्थ दोनों का सम्यक् उच्चारण और प्ररूपण करना, तदुभयाचार है । कल्याणार्थियों को अकाल और अस्वाध्याय को बचाकर विधिपूर्वक स्वाध्याय करना चाहिए, यह उभय लोक में मंगलकारी है । व्यक्तित्व एवं कृतित्व श्रावक समाज और स्वाध्याय : श्रमण एवं श्रमणियों में तो आज भी शास्त्र वाचन होता है । हाँ, पूर्व की अपेक्षा अवश्य इस ओर रुचि घटी है और कई तो वर्तमान पत्र एवं साहित्य को ही स्वाध्याय मान चलते हैं, परन्तु श्रावक समाज इस ओर से प्रायः सर्वथा ही दूर है । बहुत से लोगों की यह धारणा है कि श्रावक को शास्त्र नहीं पढ़ना चाहिये और धर्म ग्रन्थ तथा सिद्धान्त विचार का पढ़ना-पढ़ाना साधुयों का काम है । ठीक है उनकी धारणा को भी आधार है, परन्तु उससे श्रावकों की सूत्र पाठ का निषेध नहीं होता । शास्त्र में सूत्र वाचना के लिए अधिकारी की चर्चा की गई है - वहाँ साधु-साध्वियों की अपेक्षा ही विचार किया है और गुरु शिष्य परम्परा से सुत्तागमे का अध्ययन साधु ही कर सकते थे । Jain Educationa International श्रावक लोग अधिकांश अर्थरूप आगम के अभ्यासी होते और गुरुमुख से सुनकर वे तत्त्व ज्ञान एवं सिद्धान्त के प्रमुख स्थानों को धारण कर लेते थे । सिलसिले से किसी शास्त्र को वाचने व पढ़ने का उन्हें अवसर नहीं मिलता । फिर भी विशिष्ट धारणा व मेघा शक्ति वाले श्रावक-श्राविका मूल व अर्थ के अच्छे जानकार हुआ करते थे । शास्त्र में उनके परिचय में 'लठ्ठा, गहियठ्ठा, पुच्छियठ्ठा, विणिच्छियठ्ठा' आदि कहा है, श्रावक परमार्थ को ग्रहण करने वाले और तत्त्वार्थ का निश्चय करने वाले होते । फिर उनको 'अभिगय, जीवा जीवा ...बन्ध मोक्ख कुसला' आदि पद से तत्त्वज्ञान में कुशल भी बताया है ।' भगवती सूत्र में वर्णित तुंगिया नगरी के श्रावक, राजगृदी का मंडूक और राजकुमारी जयन्ती आदि के उल्लेख स्पष्ट श्रावक-श्राविका समाज में शास्त्रीय ज्ञान को प्रमाणित करते हैं । पालित श्राबक के लिए तो स्वयं शास्त्रकार ने निग्रन्थ प्रवचन में 'कोविद' कहकर शास्त्र ज्ञान का पंडित बतलाया है । फिर ज्ञाता धर्म कथा में सुबुद्धि प्रधान का वर्णन आता है, उसने पुद्गल परिणति को समझा कर राजा जित शत्रु को जिन धर्मानुगामी बना दिया था । शास्त्र की मौलिक जान For Personal and Private Use Only Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ • प्राचार्य श्री हस्तीमलजी म. सा. कारी के बिना यह सब सम्भव नहीं हो सकता, इसलिए मानना चाहिये कि श्रावक भी स्वाध्यायशील होते थे। तुंगिया नगरी के श्रावकों की जानकारी तो मुनियों को भी प्रभावित करने बाली थी । साधुजन गुरुजनों से क्रमिक वाचना लेकर शास्त्र ग्रहण किया करते और श्रावक जन श्रवण परम्परा से प्रसंग प्रसंग पर सुने हुए प्रवचनों से संकलन कर ग्रहण करते थे। इस प्रकार प्रधानता से श्रावक समाज में अर्थागम और गौणरूप से सुत्तागम का ज्ञान भी किया जाता था, यह प्रायः निर्विवाद है। प्रतिक्रमण सूत्र में प्रतों की तरह ज्ञान के अतिचारों का उल्लेख है । यहाँ सूत्र, अर्थ और तदुमय रूप तीन आगम बताकर उनके १४ दोष बतलाये हैं, जो मूल सूत्र की अपेक्षा ही संगत हो सकते हैं । परम्परा की दृष्टि से मन्दिर मार्ग परम्परा और तेरहपंथ परम्परा में श्रावक के लिए सूत्र वाचन का निषेध था, परन्तु अब मुद्रण युग में शास्त्र इतने सुलभ हो गये हैं कि जैन ही नहीं, अजैन और विदेशीजनों को भी शास्त्र हस्तगत होने लगे, लोग काल अकाल की अपेक्षा किये बिना ही पढ़ने लगे। कई अजैन और विदेशी विद्वानों ने तो शास्त्र के अनुवाद भी कर डाले हैं। ऐसे समय में जैन गृहस्थों के लिए शास्त्र का पठन-पाठन विशेष आवश्यक हो गया है, जिससे वे अजैनों में सही स्थिति प्रस्तुत कर सकें। मध्यकाल के श्रावक मुनिजनों से प्राज्ञा लेकर कुछ शास्त्रों का वाचन करते और अर्थागम से शास्त्रों के पठन-पाठन और श्रवण में बड़ी श्रद्धा रखते थे। शास्त्र के अतिरिक्त थोकड़ों के द्वारा भी वे स्वाध्याय का लाभ लिया करते थे। परन्तु आज स्थिति ऐसी हो गई है कि व्याख्यान में भी शास्त्र श्रवण की रुचि वाले श्रोता ढूंढे भी नहीं मिल पाते । शिक्षित पीढ़ी को अन्य साहित्य पढ़ने का प्रेम है, पर धर्म शास्त्र का नाम आता है तो कोई कहता है महाराज भाषा समझ में नहीं आती, कोई बोलता है पढ़ें क्या, वर्णन में रोचकता नहीं है। इस प्रकार विदेशी विद्वान जहाँ प्राकृत का अध्ययन कर समझने का प्रयत्न करते हैं, वहाँ जैन गृहस्थ उस भाषा से ही अरुचि प्रदर्शित करें और पठन-पाठन के क्षेत्र में साधु साध्वियों को छोड़कर स्वयं उदासीन रहें, तो शास्त्रों का संरक्षण कैसे होगा? और भावी प्रजा में श्रुत का प्रचार-प्रसार किस बल पर चल सकेगा, विचार की बात है । वास्तव में यदि आपको जिनवाणी पर प्रीति और शासन रक्षा के लिए दर्द है तो स्वाध्याय को अधिक से अधिक अपनाइये। अर्थागम या शास्त्र पर के व्याख्यान ही पढ़िये, पर पढ़िये अवश्य । शास्त्रानुकूल आचार्यों के विचार और वैसे द्रव्यानुयोग तथा आध्यत्मिक ग्रन्थ भी पठनीय होते हैं। प्रतिदिन शास्त्र पठन की परिपाटी से समाजधर्म पुष्ट होता और शास्त्रीय ज्ञान की वृद्धि से श्रावक समाज धर्म साधन में रवाश्रयी बनता Jain Educationa International For Personal and Private Use Only Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ * 264 * व्यक्तित्व एवं कृतित्व है। साधु-साध्वियों के अभाव में भी वाचन की परम्परा रहने से धर्म स्थान सदा मुक्त द्वार रह सकता है / बिना साधुओं के आर्य समाज, ब्रह्म समाज और सिक्ख आदि अमूर्ति पूजक संघ स्वाध्याय से ही प्रगतिशील दिख रहे हैं / यह गृहस्थ समाज में धर्म शिक्षा के प्रसार का ही फल है। स्थानकवासी जैन समाज को तो साधुजनों के अतिरिक्त श्रुत स्वाध्याय का ही प्रमुख आधार है। अतः साधु संख्या की अल्पता और विशाल धार्मिक क्षेत्र को देखते हए यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होता कि श्रावक समाज ने स्वाध्याय का उचित प्रसार नहीं किया तो संघ का भबिष्य खतरे से खाली नहीं होगा। ज्ञाता धर्म कथा में नंदन मणियार का वर्णन आता है। भगवान महावीर का शिष्य होकर भी वह साधुओं के दर्शन नहीं होने से, सेवा और शिक्षा के अभाव से सम्यक्त्व पर्याप्त से गिर गया, सत्संग या स्वाध्याय के द्वारा धर्म शिक्षा मिलती रहती तो यह परिणाम नहीं आता और न उसे आर्त भाव में मरकर दुर्दुरयोनि में ही जाना पड़ता। वर्तमान के श्रावक समाज को इससे शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये। शास्त्र वाचन में योग्यता : षडावश्यक में सामायिक प्रतिक्रमण और जीवादि तत्त्वों की जानकारी तो सामान्य स्वाध्याय है, उसके लिए खास अधिकारी का प्रश्न नहीं होना पर विशिष्ट श्रुत को वाचना के लिए योग्यता का विचार किया गया है। शास्त्र पाठक में विनय, रस-विजय और शांत स्वभाव होना आवश्यक माना गया है / शास्त्रकारों का स्पष्ट आदेश है कि-अविनीत, रस लम्पट और कलह को शांत नहीं करने वाला शास्त्र वाचन के योग्य नहीं होता / जैसे कहा है-१. तोनो क प्पंति वाइत्तए-२. अविणीए विगह पडिवद्व-३. अवि उसवियपा हुड़े / स्थ० और वृह० / वाचना प्रेमी को प्रथम शास्त्र वाचना की भूमिका प्रदत करके फिर विद्वान मुनि या अनुभवी स्वाध्यायी के आदेशानुसार उत्तराध्ययन, आवश्यक सूत्र या उपासक दशा, दशाश्रुतकंन्थ आदि से वाचन प्रारम्भ करना चाहिए और शास्त्र के विचारों को शास्त्रकार की दृष्टि से अनुकूल ही ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिये / शास्त्र में कई ज्ञय विषय और अपवाद कथन भी आते हैं, वाचक को गम्भीरता से उनका पठन-पाठन करना चाहिये, तभी स्वाध्याय का सच्चा प्रानन्द अनुभव कर सकेंगे। 000 Jain Educationa international For Personal and Private Use Only