Book Title: Devchandraji ke Sahitya me se Sudhabindu
Author(s): Rushabhdasji Swami
Publisher: Z_Manidhari_Jinchandrasuri_Ashtam_Shatabdi_Smruti_Granth_012019.pdf
Catalog link: https://jainqq.org/explore/211176/1

JAIN EDUCATION INTERNATIONAL FOR PRIVATE AND PERSONAL USE ONLY
Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पूज्य श्रीमद् देवचंद्रजी के साहित्य में से सुधाबिन्दु [आत्मयोग साधक स्वामीजी श्री ऋषभदासजी ] चित्र विचित्र स्वभाववाले, विविध प्रकार के जड़ चेतन अतः प्राणियों को अपने साध्य बिन्दु की सिद्धि के लिये विश्व पदार्थों से परिपूर्ण इस विशाल विश्व का जब हम अवलो- के पदार्थ विज्ञान का प्रबोध प्राप्त करना अनिवार्य है। वह कन करते हैं और इस विश्वतंत्र का व्यवस्थित ढंग से शक्ति मानव में होने के कारण मानव अपनी महानन्द मुक्ति संचालन देखकर इसके अन्तस्तल में रहे प्रयोजन को सूक्ष्म- पद का अधिकारी माना गया है। दृष्टि से समझने के लिये प्रयत्न करते हैं तो सारा तन्त्र यद्यपि मानव जन्म की महत्ता को प्रत्येक दर्शन ने सकल जीवराशि के लिये स्वतन्त्र, स्व-पर निर बाध, सहज प्रधान स्थान दिया है परन्तु मानव जन्म की महत्ता का सुख को सिद्धि के चरम साध्य के उपलक्ष्य में परोपकार की रहस्य जैसा आईत्-दर्शन में प्रतिपादन किया गया है, वैसा प्रबल भूमिका पर निरन्तर श्रमशील हो, ऐसा भास हुए कहीं भी नजर नहीं आता । आर्हत् दर्शन में समस्त चराचर बिना नहीं रहता और इसके समर्थन में पूर्व महर्षियों के कई प्राणियों को तीन कक्षाओं में विभाजित किया गया है। श्लोक मिलते हैं। उदाहरणार्थ कितने ही प्राणी कर्म चेतना के वश हैं, कितने ही प्राणी परोपकाराय फलन्ति बृक्षाः, परोपकाराय वहन्ति नद्यः । कर्मफल चेतना के वश हैं और कितने ही ज्ञान चेतना के परोपकाराय दुहन्ति गाव:, परोपकाराय शतां विभूतयः ॥ वश हैं। तीसरी ज्ञान चेतना का विशेष विकास मानव वास्तव में गगन मंडल में सूर्य-चन्द्र-तारा-ग्रह जन्म में ही दृष्टिगोचर हो रहा है। आईत् दर्शन में ही नक्षत्र- को जगमगाती हुई ज्योति प्राणियों के प्रबोध प्राप्ति आत्मा के स्वभाव और विभाव धर्म का सर्वाङ्गसुन्दर के पथ में प्रोत्साहन देती हुई उनके प्राण-रक्षण के अमृत । प्रतिपादन है और इस उभय धर्म का अनुसन्धान करने के समान अनेक पोषक तत्वों को प्रदान कर रही है। पवन, लिये दो प्रकार की द्रव्याथिक और पर्यायाथिक दृष्टि का प्रकाश, पानी, अग्नि आदि भी प्राणियों के प्राण-रक्षण में बड़ा सुन्दर वर्णन है। स्वभाव से ही यह अनन्त ज्ञान, सम्पूर्ण सहायता कर रहे हैं और पर्वत, नदी, नाले, बन, दर्शन, चारित्र, अनन्त वीर्य और अनन्त सुख का स्वामी है उपवन, उद्यान, हरे हरियाले खेत प्राणियों के प्राणों का और अजर, अमूर्त, अगुरुलघु और अव्याबाध गुणों का अस्तित्व अबाधित रखने में बहुत अनुग्रह कर रहे हों, ऐसा निधान है। इसीलिये सतत् सुखाभिलाषी और उसकी दृष्टिगोचर हो रहा है। अगर नैसर्गिक नियंत्रण के पदार्थ प्राप्ति के हेतु पूर्ण प्रयत्नशील है परन्तु विश्वतन्त्र की वस्तुविज्ञान में ऐसी परोपकारपूर्ण प्रक्रिया न होती तो प्राणी स्थिति के विज्ञान का विकास न साधे वहाँ तक यह अपनी क्षण मात्र भी अपना अस्तित्व नहीं टिका सकते क्योंकि प्राणी मात्र सुख चाहते हैं, वह सुख भी सतत् चाहते हैं अज्ञानदशा में सुख के बदले दुख परम्परावद्धक सुखाभास और सम्पूर्ण सुख चाहते हैं। इसलिये प्राणी मात्र का यह के लिये प्रयास करता रहता है और उस भ्रांति में अपने एक सनातन सिद्ध सहज स्वभाव हो, ऐसा ज्ञात होता है। को चौरासी लाख जोवायोनि के नमर-जाल में फंसाता है Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ । ११४ । तथा जन्म मरण को भयानक भवाटवी में भटकता है, क्योकि इसकी आत्मप्रदेश रूप ज्ञान चेतना की विशेषता फिरता है। मस्तिष्क भाग में केंद्रित है। इसलिये यह सत्यानुसन्धान ___ विश्व यन्त्र का पदार्थ विज्ञान कितना ही परोपकार- करके अपने साध्य-सहजानन्द, सच्चिदानन्द स्वरूप को प्राप्त पूर्ण होने पर भी उसके गर्भ में रहे हुए परमानन्दकारी कर सकता है। तिर्यचों में तो, तिरछे स्वभाव के होने के परमार्थ को हरएक प्राप्त नहीं कर सकता और इसके कई कारण, ज्ञान का बहुत साधारण स्थिति में विकास होता है कारणों पर आर्हत् दर्शन में अनेक प्रकार से प्रकाश डाला क्योकि उनका मस्तिष्क तिरछा है । यह प्रत्यक्ष देखा जाता गया है। उसमें एक कारण यह भी बताया गया है कि यह है कि हाथी, घोड़े आदि का मस्तिष्क कितना ही बड़ा होने आत्मा उर्ध्वगमन स्वभाववाला है। जिस तरह अग्नि का पर भी, उनकी ज्ञान-चेतना बहुत सीमित है, इसलिये धुआँ उर्ध्वगामी होने से उसका उर्ध्वगमन कराने में कोई सत्य को साक्षात्कार करने के वे पात्र ही नहीं हैं। देव प्रयत्न की ज़रूरत नहीं है लेकिन इतर दिशाओं में गमन और नरक के जीव उर्ध्वगामी जरूर हैं परन्तु जन्मान्तरों के कराने में बड़ा प्रयत्न करना पड़ता है क्योंकि वह धुएं का विभाव धर्म में चाहे शुभ या अशुभ न्यूनाधिक मात्रा में विभाव है, स्वभाव नहीं है। इसी तरह आत्मा अपने प्रवृत्ति हुई है जिससे उनके सुख-दुःख की स्थिति उनके उर्ध्वगमन स्वभाव में सहज ही विकास साध सकता है जब हा विकास साध सकता है जब स्वाधीन नहीं है। अत: वे भी सत्य साधना को चरितार्थ कि अधोगमन एवं तिरछागमन में चेतन शक्ति का विकास करने में समर्थ नहीं हैं। केवल मानव जन्म में ही वैभाविक दुःसाध्य हो जाता है । आत्मा वनस्पतिकाय आदि स्थावर शक्ति समतुल मात्रा में विकसित न होने से इसको स्वाभामें अधोगामी [ Topsy Torby ] स्थिति में है, विक शक्ति साधने का सुन्दर प्रसंग है। इसीलिये मानव तियंच आदि त्रस में तिरछागामी (Oblique) स्थिति जन्म को अति दुर्लभ माना गया है और उसकी दुर्लभता के में है और नरक, देव और मनुष्य गति में उर्ध्वगमन (Per. दस सुन्दर दृष्टांत उत्तराध्ययन सूत्र में बड़े ढंग से दर्शाये pendicular) स्थिति में है। शास्त्रकार महर्षियों ने गये हैं। ऐसा सुन्दर वर्णन और कहीं नहीं मिलता। तीन चेतनाओं का वर्णन करके पहले ही खुलासा कर अब बात यह है कि हमें अपनी स्वाभाविक सच्चिदान द दिया है कि तिथंच गति, चाहे स्थावर में हो चाहे स्थिति को प्राप्त करने के लिये स्वभाव एवं विभाव के कार्य त्रस में हो, कर्म चेतना के वश है; नरक और देव कर्मफल कारण भावों पर खूब विश्लेषण करना नितान्त आवश्यक चेतना के वश है और मानव एक ही ऐसी गति है जिसमें है। आहत-दर्शन में उस विश्लेषण विश्व-विद्या का नाम ज्ञान चेतना-प्रधान है । वनस्पति आदि में उसकी अधोगमन द्रव्य गण-पर्याय का चिंतन है और यही आर्हत्-दर्शन का स्थिति होने से चेतना का बिल्कुल अल्प विकास नजर आता आदर्श ध्यान है, क्योंकि यह विश्वतंत्र इतना विचित्र एवं है क्योंकि उनकी जड़ और धड़ सब उल्टे हैं। यही कारण विज्ञानपूर्ण है कि इसमें कितने ही स्थूल-सूक्ष्म कारण हैं, है कि वृक्षों की शाखा-परिशाखाओं आदि ऊपर के भागों कितने ही उपादान-निमित्त कारण हैं और कितने ही मूर्त को काटने पर भी वे जीवन का अस्तित्व बनाये रखते हैं। अमूर्त कारण हैं । इसलिये आर्हत्-दर्शन में सर्वज्ञ बने बिना मानव के उर्ध्वगमन स्वभाव में विकसित होने से मस्तक के एवं केवलज्ञान प्राप्ति किये बिना कोई मुक्ति प्राप्त नहीं कर नाचे रहे हुए अधोभाग के अंगपात्रों को काटने पर भी वह सकता। इस विश्व-तत्र का संचालन जीव, अजीव दोनों जोवित रहता है व अपने जीवन का अस्तित्व टिका सकता पदार्थों के परस्पर संबंध से चलता है। इसलिये केवल Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जीव को अजर, अमर, अविनाशी, सच्चिदानन्द स्वरूप की द्रव्य-गुण पर्याय का जितना भी सूक्ष्म अध्ययन, अवलोकन, मान्यतावाले दर्शन ही जीव को मुक्तिधाम पर पहुँचाने चिंतन, मंथन और परिशीलन होगा, उतना ही सत्य का में सफल नहीं बन सकते । साथ में अजीव तत्व जो धर्म, साक्षात्कार एवं वस्तुस्थिति का भान होता जायगा । अधर्म, आकाश, काल और पुदगल हैं, उनके पूर्ण स्वरूप को समझे बिना छुटकारा नहीं है । यद्यपि दूसरे द्रव्य अपनी ग्रीष्म ऋतु को ताप से पीड़ित हाथी सरोवर के पंक गति, स्थिति, अवकाश, प्रवर्त्तना और परिणाम क्रिया में (कीचड़) की शीतलता को देखकर उसमें सुख की भ्रांति जीव के साथ सम्बन्धित है तथापि इनपर विशेष मंथन में विश्रांति लेने गया । उसे शीतलता का सुख अनुभव परिशीलन न भी होवे परन्तु पुद्गल का स्वरूप समझना जरूर हआ परन्तु उस कादव में ऐसा फंस गया कि वह फिर परम आवश्यक है क्योंकि पुद्गल और जीव परस्पर परि- बाहर नहीं आ सका। ग्रीष्म ऋतु के प्रचंड ताप से कीचड़ णामी द्रव्य हैं । एक दूसरे का परस्पर सम्बन्ध अलिप्त सूखता गया और हाथी को अपने प्राणों की आहुति देनी होने पर भी वे अपना प्रभाव परस्पर डाले बिना पड़ी। इसो तरह इस संसार का हाल है। इसलिये रहते नहीं। वैभाविक संबंध विकास मार्ग में कहाँ तक उपयोगी है और एक दर्पण के सामने काला पर्दा रख दिया जाय तो कहाँ तक निरुपयोगी है, इसका सम्यग-बोध प्राप्त न हो तो यद्यपि पर्दा और दर्पण पृथक है, फिर भी पर्दे की परछाया वही विकास विकार रूप बनकर विनाश की तरफ ले जाता दर्पण की निर्मलता को आवरित किये बिना रहती नहीं। इसी है। विश्वतंत्र के प्राणियों के लिए जीवन विकाश की तरह आत्मा के ऊपर पुदगल का आवरण क्या है. कैसे होता प्रक्रिया को जीव अपनी अज्ञान दशा में निरर्थक बना देता है, कैसे टिकता है और कैसे मिटता है. यह सब समझना है। विश्वतंत्र में कहो या आहेत ही पड़ेगा क्योंकि पुद्गल की भी कई वर्गणायें हैं । खासकर लोकस्थिति कहो या विज्ञान की भाषा में COSMIC औदारिक आदि आठ वर्गणाएँ जीव से बहुत सम्बन्धित हैं ORDER कहो, प्रत्येक पदार्थ अपने स्वाभाविक स्वरूप और इनमें भी कार्मण-वर्गणा, जो अति सूक्ष्म मानी जाती में अवस्थित रहने के लिये सदा प्रवृत्तिशील है। है, अपने परिणाम के असर द्वारा आत्मा को स्व-पर का अतः आईत्-दर्शन में सब बड़े तत्वों का परम तत्व भान तक भला देती है और यह जीव पर-परिणामी बन (Fulorum of the whole Universe) "उवन्नेइ जाता है। संज्ञा, कषाय, विषय-वासना, आशा, तृष्णा ये वा, विगमेइ वा, धुवेइ वा" माना है । अर्हन्त भगवंत धर्म सब पुद्गल-परिणामी होने पर भी जीव अपनी अज्ञान तीर्थ स्थापित करने के लिए अपनी अमृत देशना का मंगलादशा में इनको आत्मपरिणामी समझकर उनमें परिणमन चरण करते हैं तब ऐसा ही वर्णन है कि गणधर प्रश्न करते करता है और पुद्गल परिणामी बनकर चारों गतियों में हैं कि "भंते ! किं तत्तं ? किं तत्त ? उसके प्रत्युत्तर में परिभ्रमण करता है। अपने अनन्त प्राणों के संयोग-वियोग भगवन्त '' उवन्नेइ वा, विगमेइ वा धुवेइ वा" फरमाते हैं। के चक्कर में अरघट घटिका न्यायेन" अनादिकाल से संसार यही द्रव्य-गुण पर्याय की घटमाल को समझने का परमोसमुद्र के जन्म-मरण की तरंगों में गोते खाता रहता है। त्कृष्ट साधन है और नैसर्गिक नियंत्रण का सारा विश्व आ: पार्हत् दर्शा को परिभाषा में द्रव्य-गुण-पर्याय की विधान इसी विज्ञान को प्रकाश में लाने के लिये घटनाल में ही सारे संसार का चक्र चलता है। इसलिये नियोजित है। Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ । ११६ ] जो पुण्य-पवित्र आत्मा जन्म-जन्मान्तरों में अहिंसा में मुझे जब भिन्न-२ साहित्य का अवलोकन, अध्ययन, मनन संयम-तप का उत्तरोत्तर विकास साधते हुए केवलज्ञान को और परिशीलन करना पड़ा तब उसमें मुझे द्रव्यानुयोगी प्राप्त करके इस लोकालोक प्रकाशक-पूर्ण-विज्ञान प्रतिपादन महात्मा देवचन्द्रजी को 'आगमसार' आदि पुस्तकों का के अधिकारी बनते हैं, वे ही तीर्थकर कहलाते हैं। जीवों तथा उनके तत्वगभित स्तवनों आदि का अध्ययन करने का को तारने के लिये मार्गदर्शक आगमिक भाषा में वे महा- भी सौभाग्य प्राप्त हुआ, जिनमें से उपलब्ध बोध के लिये निमिक, महा-सार्थवाह, महा-माहण और महागोप इन महान उपकारी के उपकार का मैं अनन्त ऋणी हैं, और कहलाते हैं। उनका प्रवचन ही परमोत्कृष्ट धर्म एवं धर्मा- उन्हीं महापुरुष के दिव्य जीवन का यशोगान करने के नुशासन कहलाता है। इस विश्वतंत्र के विशिष्ट विज्ञान उपलक्ष में ही यह लेखनी उठाई है। यद्यपि ऊपर लेख की को प्रकाश में लाये बिना इसकी पदार्थ-व्यवस्था के परदे के मर्यादा के बाहर पूर्व-भमिका बहुत बन गई है, अतः मैं पीछे रहो हुई परोपकार की प्रक्रिया का परमार्थ रूप उनके विषय में अब क्या लिखू ? परन्तु यह कहावत प्रसिद्ध परमानन्द पद प्राणो प्राप्त करे, ऐसा जो गुप्त रहस्य रहा है कि राम के यशोगान में रावण को अनोखी कथनो इतनी हुआ है, उसकी पूर्ति हेतु केवल अर्हन्त भगवंत ही अधिकारी विस्तृत बताई कि राम की कथनी उससे भी विशेष विस्तृत है । अत: वे ही कार्य की सिद्धि के लिये कारण की सम्यग- करना आवश्यक समझा गया, परन्तु उस सूज्ञचिंतक ने तो सामग्री सर्जन करते हैं और उसमें स्वाभाविक वैभाविक एक ही वाक्य में कह दिया कि रावण अनेक विद्या, सिद्धि, धर्मक्षेत्र आदि साधन ऐसा सामग्री जितनी प्राणो को अपने ऋद्धि, वृद्धि, संपत्ति और शक्ति का स्वामो था परन्तु राम परमानन्द पथ की प्राप्ति के लिये चाहिये, उसकी पूर्ति करते की किसी शक्ति का वर्णन किए बिना यहो कहा कि राम ने हैं; अटल नियम है। इसलिये सारा विश्वतंत्र उनकी सेवा में रावण को पराजित किया। इससे सिद्ध हो गया कि राम प्रवृत्त है (The whole Cosmic order re- में रावण से भो अनेक विशिष्ट शक्तियाँ थीं। इसी तरह से mains at their service )। इसिलिये पदार्थ मैं भी यहाँ कहना चाहता हूं। व्यवस्था के विधान के मुताबिक उनके पंच कल्याणकों में आपके साहित्य में से मैं जो कुछ समझा हूँ, वह सागर देवेन्द्रों, सुरेन्द्रों का शुभागमन होता है और सामग्न की रूपी गागर में बतलाना चाहता हूँ कि अपने जोवन के पूर्ति करनेवाले प्रभु हैं, ऐसा संकेत करनेवाले अशोकवृक्षादि उत्थान के लिये, परमानन्द पद की प्राप्ति के लिये एवं अष्ट महाप्रा तिहार्य का प्रादुर्भाव होता है। प्राणियों को मुक्ति मंगल निकेतन का निवासी बनने के लिए तीन बातें हरएक प्रतिकूलता को पलायन करके सानुकूलता के साधन बहुत जरूरी हैं:जुटाने की विशिष्ट-विभूति जो चौंतीस अतिशयों के नाम (१) प्रभु की प्रभुता (२) समर्पणभाव (३) आशय की से प्रसिद्ध है, वह भी उनके स्वाधीन हो जाती है। विशुद्धि। इसलिये नैसर्गिक पदार्थ व्यवस्था के प्रमाणभत प्रति- उपरोक्त तीन बातें यदि ठीक तरह से समझी जावे तो निधि (The most bonafide representative) मानव सुखे-सुखे नरेन्द्र देवेन्द्र, सुरेन्द्र और अहमिन्द्रों की तीर्थकरों और उनके स्थापित तीर्थ की आराधना-प्रभावना अनुपम ऋद्धि समृद्धि की सरिता में सुख संपादन करता हो हमारे लिये परमोत्कृष्ट मंगल रूप एवं परम श्रेयस्कर हुआ सिद्धिधाम में पहुंच सकता है। इन बातों को समझे है। इसी आराधना-प्रभावना के यथार्थ बोध के उपलक्ष बिना जो प्रागो आनो परिमित प्रज्ञा व मर्यादित Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ । ११७ ] मेंधा पर आधार रखकर मुक्ति-मार्ग में प्रवास करता विश्व के विभु एवं प्रभु हैं। अतः ऐसे प्रभु को समर्पित होने है तो वह परमार्थ के बदले अनर्थ, धर्म के बदले में ही हमारा सर्वोदय है । इसलिये ऐसा शुद्ध आशय बनाकर बदले अधर्म, पुण्य के बदले पाप, उपकार के बदले अपकार, जो प्रभु का स्मरण करता है एवं उनको आज्ञा का पालन हित के बदले अहित, शुभ के बदले अशुभ और शुद्ध के करता है, वह परमानन्द पद को सुलभता से प्राप्त करता है बदले अशुद्ध आचरण करके पराभव स्थिति को प्राप्त कर क्योंकि वे आगे फरमाते हैं कि-- अपना अध: पतन किये बिना रहेगा नहीं। "शुभाशय थिर प्रभु उपयोगे, जो-समरे तुज नामजी । ___ जैसे निष्णात डाक्टर से संपर्क साधने के बाद अपने अव्याबाध अनन्तु पामे, परम अमृत सुखधामजी ॥" दिमागो दवाओं के झगड़े में पड़ना महामर्खता है तथा ऐसे ही भाव श्री सविधिनाथ भगवान के स्तवन में निष्णात डाक्टर के ऊपर निर्भर रहने में ही साध्य की सिद्धि मिलते हैं । है, उसो तरह पहले हमें प्रभु को प्रभुना को खूब समझना ___"प्रभु मुद्रा ने योग प्रभु प्रभुता लखे हो लाल चाहिये तभी समर्पण-भाव आयेगा और आशय को शुद्धि के द्रव्य तणे साधर्म्य स्वसंपति ओलखे हो लाल" लिये आतुरता विकसित होती जायगी और वह अपनी आगे जाते-जाते श्री महावीर स्वामी के स्तवन में तो आदर्श-भावना को सफल बना सकेगा। केवल आत्मज्ञान यहाँ तक कहते हैं किको अपनो मति-कल्पना को मान्यताय मानने ओर मनाने में 'तारजो बापजी विरुद निज राखवा, अपना ही नहीं, लेकिन अनेकों के उत्थान के बदले पतन में दास नों सेवना रखे जोसो" अपने शुष्क ज्ञान को उपकरण बनाने के बदले अधिकरण बनाने के समान है। इसलिये परम-पूज्य महात्मा श्रीमद् इस तरह से मझे तो इन तीन बातों पर श्री देवचन्द्र जो ___ के प्रति अपनो अत्मा में इतना सद्भाव है कि जिसके वर्णन का अपने स्तवनों में प्रशंसनीय प्रयत्न किया है। के लिये मेरे पास कोई शब्द नहीं है। श्रीशोतलनाथ प्रभु के स्तवन में आप फरमाते हैं कि - वेसे भी इनके रचना ग्रन्यों में नय, निक्षेप प्रमाण, "शीतल जोन प्रति प्रभुता प्रभु को, लक्षण, मार्गणा स्थान, गुणस्थान, द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव, मुझ थको कहो न जावेजो" पंच समवाय, औदायिक आदि पंच भाव, पंचाश्रव, पट क्योंकि सारा विश्व-विधान आपको आज्ञा के अधोन। द्रव्य, सप्त धर्म-क्षेत्र, अष्ट कर्म, अष्ट करण, नो तत्व, नौ पद हो गया है। आदि गहन विषयों का भी इतना सुन्दर और सरल ढंग से "द्रव्य, क्षेत्र ने काल, भाव, गुण, प्रतिपादन है कि सामान्य बुद्धिवाला भी अपना आत्मोत्थान राजनोति ए चार जी साध सकता है। संस्कृत, प्राकृत के प्रौढ़ विद्वान होते हुए त्रास बिना जड़ चेतन प्रभु को, भी आपने सारे आगमों का अमृत-रस राजस्थानी, गुजकोई न लोपे कारजो" राती, हिन्दो, व्रज भाषा में गद्य-पद्य में अपना साहित्य अर्थात् जड़ चेतन रूप षट् द्रव्य के द्वारा सारे विश्व- सर्जन करके बड़ा लोकोपयोगी बनाया जिसके लिये उनका तन्त्र का संचालन हो रहा है; ये सब आपको आज्ञा का जितना भी गुण गान गाया जावे, उसता ही थोड़ा है । लोप नहीं करते। मेरे कहने का आशय यह है कि आप ही वे बड़े आगम व्यवहारी, सच्चे अध्यात्म-मुख थे और Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ / 118 ] आईत्-दर्शन की मान्यतानुसार वे बड़े आत्म-योगी पुरुष धर्म शास्त्रों में टीटोडी के अंडे समुद्र में जाने से अपने चंचुथे, इसमें कोई शक नहीं। पात से समुद्र को खाली करने जैसा दृष्टान्त है। परन्तु श्रीमद् देवचन्द्रजी को साहित्य रचना में से प्रभु की टोटोडी के आत्म विश्वास ने गरूङजी को आकर्षित किया, प्रभुता, समर्पण भाव, आशय की विशुद्धि का आधार लेकर गरुड़जी के द्वारा विष्णु भगवान की कृपा हुई। उन्होंने ही मैं आत्म योग सरोवर में चंचुपात कर रहा हूँ। समुद्र उसके साध्य को सफल बनाया और समुद्र को अंडे वापस के प्रवास में जैसे प्रवहण ही आधार रूप है, इसी तरह से देकर क्षमा मांगनी पड़ी। ऐसे ही इस प्रभु की प्रभुता में इनके प्रवचन-रूपी प्रवहण, मेरो आत्म-योग-साधना में वह शक्ति रही हुई है जिनको कृपा एवं अनुग्रह से हमारा मेरे लिये पुष्टावलंबन रूप है। अगर यह आधार न मिला बेडापार हो सकता है। इसलिये दिन प्रति दिन प्रमु के होता तो इस भयानक भवसागर को पार करने का साहस प्रति दासत्व-भाव की वृद्धि करते जाना-यही मुक्ति द्वार भी नहीं होता, जैसे कि अपनी भुजा से समुद्र पार करने- तक पहुँचने का सरल उपाय है / "दासोऽहं" भाव अपने वाले को स्थिति होती है। वह कितना ही पराक्रम करके आप अप्रमत्त गुणस्थानकों में 'सोऽहं' भाव पर पहुंचायेगा प्रवहण बिना अपनी भुजा बल से थोड़ो प्रगति साधे परन्तु और अन्त में “सोऽहं" भाव भी वीतराग गुणस्थानकों में समुद्र की एक ही तरंग में वह शक्ति है कि वह उसका छूटकर ऐसी केवलज्ञान स्थिति में रहा हुआ अपने शुद्ध सारा पुरुषार्थ निष्फल बना सकती है। जिस तरह समुद्र सिद्धात्म स्वरूपस्थ "ह' "एगो मे सासओ अप्पा, नाण मच्छ, कच्छ, मगर आदि भयानक जंतुओं से भरा है, उसी दंसण संजुओ" स्व पर निराबाध सहजानन्द भाव सिद्ध स्वरूप तरह इस भवसागर में भी संज्ञा, कषाय, विषय वासना, को प्राप्त कर यगा / तृष्णा रूपी ऐसे भयानक जंतु भरे पड़े हैं और हम प्रभु के प्रवचन रूपी प्रवण को प्राप्त किये बिना उनसे बच ही नहीं इस प्रकार पूज्य श्रीमद् देवचन्द्रजी का मैं दिन रात सकते। बड़े बड़े पुरुषार्थी पूर्वधर पुरुष भी प्रगति के प्रवाह जितना भी गुण गाऊं, वह थोड़ा ही है परन्तु उनके दिव्य में से पड़कर निगोद तक पहँचे हैं तो मेरे जैसे पुरुषार्थहोन जीवन सम्बन्धी इस स्थान पर दो शब्द उनके प्रति मेरा अज्ञानी इस प्रवास में अपनो हो ज्ञान क्रिया के बल पर पूज्य भाव प्रदर्शित करने के लिये उल्लिखित किये हैं, इसमें कैसे विकास साध सकते हैं ? अत: इस अगम, अपार संसार मति मंदता के कारण कोई त्रुटि रही हो तो क्षमा को पार करने का मेरे जैसे पामर प्राणी का पुरुषार्थ, हिन्दू चाहता हूं। सुज्ञेषु किं बहुना ! - -