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________________ विचार इस कि वजनानुपनेहरूपकर्म बाद वे ऊं के चाकरा 'कर्मव्यर -सीान सूर्यसनमुखरष्टिमाभइतना मकाया श्रावानादेह माहेश्वादनादिकना नश्लेश धरनोन इविव। बाह आणि वित्रता वा काममा हाउ पशिशिरमूरातिमुहस्त आया वातमाए श्राया माधक मनोहरजीवसंधिया परिणा प्रशका सर्वेशिम ते प्रध्यवसाय नेम्पातलस्यादिक क्इि निर्मलनि यत्पदा के साक मनकरी स्त्राव न विषी मनावविशेषेकरी मनना जावकरी माणस्तखालणं परिणाम साहिव साहिं लिसा दिविमुगाहिं श्राया केयाश ज्ञान नाव पजावा हारते ना यावर विना कररणहार जेकर्म स्पेकश्रयाश्रश्वसामु निद्ययन बार्यनको क्रयश ज्ञानावरणीयादिकका साया उपशान याने कराई। करिश्मान विष‍ वेला दाल इगवेषणाय शुरुमा विरूप यावर शिकाए कम्मा संखनु बनाम ईहा शह मय गावराण कारमा एस वारिचलद्वी वेनाव नेहाल बधि विशेष्यन विमर्या सम्पकका निवारण बाते बहुपरिक करना नेहवाल ऊप वैकि रूपक रिवासंबंधी अवधि दासे दिन नावारूप ज्ञाननाशक्ति कपनो॥ मर्यादा खी।। नानकरा नवा करा लबीउ दिलाएलडी समुपला तातासम्म उपरिघायए तापवारिश्राए उचिखलद्वीए हि सहित] ज्ञानते ग्रवधि र पशंकरी सम्यक जनलोकन विस्मयक कांपिल्यश्नगान ग्राहा शनाधिक ४७कारना एक ना शनरूपणी नवदि कामतानिकपने विवान ि एक सर्वधरष्ट नातिही. घरविहार हरपट सर्व जिम ।। मालद्वीप समुपसाए ऊविन्दावदेनं कंपिल्लागार घरसात श्राहारमा हारिति घरमयतम a के=
SR No.650017
Book TitleUvavai Sutra
Original Sutra AuthorSudharmaswami
AuthorKesharvijay
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages211
LanguagePrakrit
ClassificationManuscript & agam_aupapatik
File Size100 MB
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