SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 60
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ रतेनां स्वान समा स्टान ॥ जावतमा sas जीवनमा संयमनाप ज्यानापूर्वी परिसमाधिस्वान का समाय 11889135 हिधारणा में दवदवचा रिया विनवतिं त्रयमधियवारयः वित्तवति' इण्मधियवारियार्विनवति प्रतिरिक्त तिसाधुवाद कर रात्रिकपरिसावी आचार्यादिकने साथ विश्ते गुर्वादिकते उपघातमा का श्रोतका ६६ पर विपाकमवधारथिता। मात्मानं बोलता पसरविरोधात ६ समाधिकप श्रात्मानमात्र नादियादिक ते नाते सूतोपानी ॥ इलमा नारा करतेस जवइतेको वर्णवाद बोलतेष्ट बलाकिन मासिक कहीं 11011 निकितक कु रसद्यास पिए' राति शिय पवितासी घेरावघा घाइय' संकल हो का हर पिडिसंसए प्रतिरक तापारका गुणध मीस क इन ही ||११|| नव धिकरणकललगा मलादिकते पूर्व उत्प पानी पि जावई ॥१२॥ लुंगी परिजीवाल॥३॥ मर्यादाघकी धिकांशया पाटिया सनपाटला दिकसे दधिकपाश्रय राष करार कंकाकारजे सूरघनालोजी। सूर्य एवायमितः सात पाणी मोटा करागमन श्रोतागमे बाजयमायईसीसी के लड़कर आयकराव पश्रममास्वान ॥ 5) वा समसमाधिनां स्व नक घरातन नूना कलहानई। नई|| मादिदापण समाया || दारता सदति वा अधिकरणमा पांडे पातालवति पोरा गोग अधिकरणा स्वामित कहकर | १६|| कपनरम क तिहननर१॥ क्लीनदी का उदी रोख ॥ सरजस्कपा लियादः सचितरजय रहना देतीले वितस चितवन नजइ ||१४|| का स्वाध्यायक पहिले हरिने पावल्यप हरिका लिकयनादि कनसहर लेगिकालिक सवैकालिका दिकन सरोका एतदेवतां दिकइतिमासमा विस्वान विवदिया एंगोदीतानवति समररक या पार्य काल सायका र एया विसवति कलह करेंस मुनिसुतवासमार दी सधनुषाधा परिघाक २३॥१॥ विकार कंक करे सूरयमाण सोई एस गासमिते या विसवर्ति' मुद्दिते रहावी संघ इंजन नय
SR No.650013
Book TitleSamavayanga Sutra
Original Sutra AuthorSudharmaswami
AuthorHirsundar Muni
PublisherJaiselmer
Publication Year1699
Total Pages248
LanguagePrakrit
ClassificationManuscript & agam_samvayang
File Size130 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy