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________________ उपासग एए || श्म कहिजं || निश्वशं हे देवाएं प्रिया | नकल्प ] | ॥ श्रावकनई] | मरलनांसिंघा יון यं पवंदयासी | नोख तु देवाएं प्पिया कप्पई) समलो वा सगस्म | पश्चिममारणं काधा मर्ववत् ससपा कदिन कल्पइंनडमे देदेवा एंत्रिया | | रेवली गावातिल ते नई निष्टवचन तिय जावप सातदि | जावदागरित्र) म्हे देवा गुपिया रेवगा दाव यवातून अनिष्ट | ५| वचन जेम्हे || कजिं | | तेमाटतुम्हे पचानक च्या लोबो तेहि लिपि वागरखेदि । वा गरिया । तं नंड मंष्यमाणस्लोए पवई | यधायोग्प । प्रायवित] [लीयन | तिवारी ते ] | सगवंल गौतम | | श्रमण || हिं जाद ऊ हा रिच पायचिपडिवजातिते से सगर्व गोयमे समएस्स ||तगवंत | माहावीर वचनतत करूं || विनय सहीत) सांस ली नई। तिधी नी सरीन 5|| लगवन महावीर स्तत्रियमहं दिए | पडिले २ तप डिनिरव मंति y
SR No.650006
Book TitleUpasakadasanga Sutra
Original Sutra AuthorSudharmaswami
AuthorSomji Rishi
PublisherSurat
Publication Year1783
Total Pages202
LanguagePrakrit
ClassificationManuscript & agam_upasakdasha
File Size29 MB
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