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________________ " सूर्यग याबीनई लागा सिहं । यावत् तेनी सेवा करी सई | पाडिहार पीढफल सिद्या संघारा प्रमुपनि मं । तिवारी) वि सामिजादपद्यो वासस्सामि पारदारियां ज्ञाव व निमन्नस्सामि ततेां क उपासंग हॉल इंवाइये। श्रमण सगवंत महावीरदेव || समोस्या || परषदा वांदवा यावी सेवा करवा ६१ | जावजलते समऐसगवंमदातीरे जावस मो सरिए | परिसानिया । जाद पद ? || सदालपुत्र गोसालानी | श्रावक ] | इहवी कमावासी जाधव कसां समाजे ||ति | तते एसेसद्दालपुत्ते या जीवी तो वासय् । इमी से कहाए | ल६ हे समाऐ | || निश्व | श्रम सगवंतमहावीरदेव | समोसरचा [तिहां] जाउं ) | श्रमण नगर्व नमहावी पर्ववतु | समणे सगर्वं महावीरे जाव विहरति । तंगचामि | समस गर्वमहा रन वानमुस्का | सेवासक्तिकरुं। एहविचारी नई | स्वान प्रायश्चितमंगलकक सजीव ६५ स्याए स्त्र पहि वारंवंदामि | जावपक वा सामि | एवं संपेदिति । एहाए जावपाय चिते। सुपा पबी करू कस्चु
SR No.650006
Book TitleUpasakadasanga Sutra
Original Sutra AuthorSudharmaswami
AuthorSomji Rishi
PublisherSurat
Publication Year1783
Total Pages202
LanguagePrakrit
ClassificationManuscript & agam_upasakdasha
File Size29 MB
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