SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 103
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ प ध्ययन माप्त: नदि देवताप उपनो | आपिल्पोपमनी स्थित नई) | माहाविदेदनविषरं । । सिशसि ) ५) ||माणे देवतापवने चत्ता रिलिजनमाहिती मादा विदेदेवा से सिझिहेतिप निखेवोस // उपा सगदशां गनुं ।] त्री जो ) त्र्यध्ययन | संपूर्णः | ३ | प्रारंसी इंबई | चउघोग निरखे वो अदा समुदसा संतत्रियंत्रशयस मन्त्रं ॥ ३॥ बरवे वचनम |श्म निश्वइं| हेजंडू | तेलका लई | तेसमानइंविषई | वा पारसी नगरी || कोहनामा उद्यान | जिल एवं खलु ते का लेणं| तेणं सम एवं वारणार मीनयरी | कोहए चेत्तिए जिय सचुराजा | तिहांसुरा देव गाधापतिर । रुकिरी ने रा को ईशान बदिएकोडी सुमन डारी बई) as सहीत 'वीस सचुराया | सुरादे विगादावति महे जावयपरित एब हिरण कोडी उनि दाणप || बहिरा कोडि व्यापार नविषबई | | बहिरनी को डीनो घर वा घरो बालक चोला) बवर्ग) उत्ताउ | बहिरल कोडितो व हिपन सा७ । बहिरल कोडीन पविचर पडला बच दिक १०
SR No.650006
Book TitleUpasakadasanga Sutra
Original Sutra AuthorSudharmaswami
AuthorSomji Rishi
PublisherSurat
Publication Year1783
Total Pages202
LanguagePrakrit
ClassificationManuscript & agam_upasakdasha
File Size29 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy