________________ अम्बड चरित्रम् // 25 // यतः-भल्लां तां भल्लिमकरई जां भल्ला न मलंति / भल्लाने भल्ला मिलई भला किस्यु करंति // 13 // तावद् गर्जन्ति मातङ्गा वने मदनिरालसाः। लीलोल्लालितलाङ्गलो यावन्नायाति केसरी // 14 // द्वितीय आगात् रूपं परावर्त्य सोऽम्बडो भोज्यहेतवे / न वेत्ति हृदयास्फोटो योगी कमलकाञ्चनः // 15 // आदेशः यतः-आगतश्च गतश्चैव दृष्ट्वा सिंहपराक्रमम् / अकर्णहृदयो मुखों यो गतः पुनरागतः॥ जेह नहीं आपणों सान ते किम प्रीछइ परतणी / तेह सिरिमाथइ कान चावारां वानरीउ भणइ 1 // इक आपणी न सान अने प्रीच्छविउ प्रीच्छइ नहि / तेहु माथइकान विहिकोरि काणां किया ? // 16 // ईदृशं कौतुकं दृष्ट्वा प्रत्यक्षमागतोब्रवीत् / हे योगिन्नम्बडः सोऽहं रे रे कागिणि नागिणि ! // 17 // पश्याहमागतो भूयो मां करिष्यथ कुकुटम् / इति पञ्चारयन् योगिन कुत्र तेऽन्धारिका भवेत् // 18 // सा ग्रहीता मया योगिन् ! तत्च्छु त्वा हृदि खिद्यति। तस्योपरि चटित्वाथ वाहयेद् योगिरासभम् // 16 // / हत्वा हत्वा चपेटाभिः काष्ठेन कमलं खरम / अम्बडो वैरभावेन वारं वारं विडम्बयेत // 120 // स्वस्थीकृतोऽम्बडस्तत्र निपत्य हस्तपादयोः। लोकैरकथि हे सिद्ध ! शिक्षालग्नास्य मुच्यताम् // 21 // 9 // 25 // प्रसन्नश्वाम्बडो वापी-जलपानेन तन्त्रयम् / चक्रे सहजरूपेण कागी नागी च योगिराट् // 22 //