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________________ ज०वि० ११ जय विजय तुम तनुज दो । होसी तुमको दुःख कार हो भाई । ति कारण दोनों भणी । शीघ्र न्हखावो मार हो भाई । श्री ।। १२ बैरी और व्याधी अंकूर से | करनी तत्क्षिण नाश हो भाई । तो अगल बधे नहीं । यह नीति वचन विमास भाई | श्री || १३ || सत्य बात ये मान जे । करजे जो हित चहाय हो भाई । नहीं बश फिर है माहेरी । यों कही देवी जाय हो भाई । श्री ॥ १४ ॥ जाग्या तब ही भूपति । चिन्ता व्यापी अपार हो भाई । असंभव बात कैसे बणे । देव मिया न करे उचार ही भाई । श्री ।। १५ ।। कहे श्रीमति ने जगाय ने । स्वप्न तणो विरतंत हो भाई । श्रीमति कहे मुझ ने यदा । ये ही स्वप्न यावंत हो राजा । श्री ।। १६ ।। नृप कहे असंभव बात ये । दोनों कुंवर विनयवंत हो राणी । कुल भूषण द्वण विना । किम मुझ दुःख करंत हो राणी | श्री ॥ १७ ॥ राणी कहे हो नाथ जी । लोभ पाप को वाप हो राजा । होती आई अनादि से । जाणो छो शास्त्र ने आप हो राजा । श्री ॥ १८ ॥ स्नेह सगपण लोभी न गि । राज
SR No.600301
Book TitleSamyktotsav Jaysenam Vijaysen
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRupchandji Chagniramji Sancheti
Publication Year
Total Pages190
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size15 MB
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