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शब्दार्थ के दे० देवलोक ५० प्ररूपे गो० गौतम इ० यह म. मनुष्य लोकमें अ० अशोक वृक्षके वन स० सप्त ।
पर्णवन चं० चंपकवन चू, आम्रवन तितिलकवन ला० वृक्ष विशेष नि० वड के वन छ, छत्राहवन अ014 अशनवन स० शणकेवन अ० अलसीके वन कु० कुमुंभवन सि० सरसव के वन बं० वृक्ष विशेष नि.नित्य कु. कुसुम वाले मा० मंजरी ल० वेल थ० फूलजाति गु० लता गो० पत्रसमुह ज०समश्रेणी जु० युगल । नयेहुवे प० विशेष नमेहुवे मु० प्रगट पिं० लुम्ब मं० मांजर व• नवकुंपल ध० धारन करने वाले सि० शो
लाउयवणेइवा,निग्गोहवणेइवा,छत्तोहवणेइवा असणवणेइवा,सणवणेइवा,अयसिवणेइवा, कुसुंभवणेइवा, सिद्धत्थवणेइवा, बंधुजीववणेइवा; निच्चं कुसुमिय माइयलवइयथवइय गुलु
इय गोच्छिय जमालय जुवालय विणमिय पणमिय सुविभत्त पिंडिमंजरि वडिंगधरे, है सिरीए अतीव अतीव उवसोभेमाणे उवसोभेमाणे चिट्ठइ एवामेव तेसिं वाणमंतरायुगल वृक्ष के पुष्पों का भार से नमे हुवे, विशेष नमें हुवे, नविन कुंपल रूपी मुकुट को धारण करने वाले व बनलक्ष्मी से बहुत ही शोभनीक हैं वैभेही उन वाणव्यंतर देवता के देवलोक जानना. उस की
स्थिति जघन्य दश हजार वर्ष की उत्कृष्ट एक पल्योपम की जानना. वे देवलोक बहुत वाणव्यंतर देव 12व देवियों से व्याप्त, क्रीडा में आसक्त होनेसे उपरा उपर आच्छादे हुवे, परस्पर बहुत दूर तक खेलनेसे
पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र
488088>पहिला शतकका पहिला उद्देशा 80-8083809
भावार्थ